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आपने कविता लेखन कब और कैसे शुरू किया ?
1983 – 84 में लिखना आरंभ किया। कवि होने या कहाने की कथा भी अजीब है। मेरे त‍ीन साथी थे सहरसा में राजेश आशिक,अच्‍युतानंद कर्ण औरशैली। जब मैं बीए पोलिटिकल सायंस का छात्र था तो यही संगी थे। ये तीनों कविताएं करते थे अपने जाने में। मैं देखता कि इनकी क्षणिकाएं व लघुकथाएं उस समय के दैनिक प्रदीप, आर्यावर्त में छपती हैं और ये सीना फुलाए घूमते हैं तो मैंने भी अखबार देखना शुरू किया। फिर जो वे लिखते थे उसे देख सोचा यही है कविता करना तो मैंने भी कुछ वैसा ही लिखकर भेज दिया अखबारों में। और यह मजेदार रहा कि मेरी पहली ही लघुकथा प्रदीप में छपी और उसके पारिश्रमिक के रूप में पंद्रह रूपये का मनिआर्डर भी आया पटना से। तो आज से पच्‍चीस साल पहले इस पहली रचना पर मिले पारिश्रमिक ने जैसे मेरे भीतर लिखने की इस क्रिया को लेकर एक बदलाव ला दिया।

आज भी हर तरह के बदलावों के बावजूद कविता के प्रति समाज में लोगों का प्रेम कम नहीं हुआ है इसकी क्या वजह आपको प्रतीत होती है ?

कम शब्दों में बात कहने की कला कविता है, इसलिए आज भी लोकप्रिय है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि अज्ञेय के बाद हिंदी कविता लेखन को नागार्जुन ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है ?

कम या ज्यादा की बात नहीं की जा सकती। दोनों का अलग प्रभावक्षेत्र है। नागार्जुन जन में ज्यादा लोकप्रिय हैं और अज्ञेय अभिजन में।

अपने समय और समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं को आज की कविता कितनी बखूबी प्रकट कर पा रही है . ? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हिंदी कविता लेखन का यह दौर अनेकानेक संकटों से परिपूर्ण है ?

हमेशा की तरह कविता अपना काम कर रही है। कोई संकट नहीं है।

अपने बचपन घर – परिवार और पढायी लिखाई के बारे में बताएँ ?

पिता बचपन में रामायण,गीता आदि के हिस्‍से याद कराया करते थे। फिर दिनकर की किताब ‘चक्रवाल’, मुक्तिबोध की ‘भूरि भूरि खाक धूल’, कविता के नये प्रतिमान आदि उनकी टेबल पर रखे होते थे जिन्‍हें पढते हुए लगता है कविता की समझ आई और फिर उस समझ को प्रकट करने की ईच्‍छा से कविता का आरंभ हुआ होगा।
यूं जब कवि कहाने लगा तो पिता चाहते थे कि चिकित्‍सक होउं। पर नंबर इंटर साइंस में चारसौबीस आए। दो साल केवल गांव घूमा सिनेमा देखा सोन के बालू में लोटा, बगीचा घूमा। पिता ने बाद में पूछा तो टका सा जवाब दे दिया कि जिंदगी भर पढाते रहेरामचरितमानस,दिनकर का चक्रवाल,गीता के स्थितप्रज्ञ के लक्षण तो डाक्‍टर कहां से बन जाउं। बाद में होमियोपैथी पढी अपनी रूची से जी भर तो लगा पिता की दबी ईच्‍छा को पूरी कर रहा होउं इस तरह।

अपने प्रिय लेखकों – कवियों के बारे में बताएं

शमशेर, मुक्तिबोध, आलोक धन्वा, विष्णु खरे, विष्णु नागर, विजय कुमार, लीलाधर मंडलोई, नरेश सक्सेना आदि कवि प्रिय हैं। इनकी कविताओं को लोगों को सुनाना अच्छा लगता है।

साहित्य में आलोचना की उपस्थिति आपको कितनी सार्थक और निरर्थक प्रतीत होती है

आलोचक की भूमिका हमेशा रचनाकार के बाद की दूसरे स्तर की होती है।

आलोचना में साहित्य विषयक सम्यक चिंतन का अभाव क्यों होता दिखायी दे रहा है ?

लोगो में सहनशीलता के अभाव के चलते ऐसा हो रहा। नई आभासी दुनिया में आलोचना की जगह कम होती दिख रही।

जीवन-वृत्त
नाम: कुमार मुकुल (अमरेन्‍द्र कुमार)
पिता: श्री गंगा प्रसाद सिंह
जन्म: 2-5-1966
शिक्षा: एम ए ( राजनीति विज्ञान )
पेशा: पत्रकारिता
कार्यानुभव:
1994 से 2015 के बीच हिन्दी की आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं अमर उजाला, देशबन्‍धु, पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रभात खबर,कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस आदि में संवाददाता, उपसंपादक, संपादकीय प्रभारी, फीचर संपादक व स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।
2005 से 2007 के बीच द्वैमासिक साहित्यिक लघु पत्रिका ‘सम्प्रति पथ’ का दो वर्षों तक संपादन।
2007 से 2011 त्रैमासिक ‘मनोवेद’ में कार्यकारी संपादक।
2011 से 2012 तक आकाशवाणी में ‘को-आर्डिनेटर’।
जनवरी 2012 में कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस आगरा में फीचर संपादक।
अक्‍टूबर 2012 से नवंबर 2014 तक दैनिक कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस में स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।
2015 दिल्‍ली के दैनिक देशबन्‍धु में स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।
2015 से राजस्‍थान पत्रिका जयपुर में कंटेंट स्‍ट्रेटेजिस्ट।
कृतियां: पुस्‍तकें
2000 ‘परिदृश्‍य के भीतर’
2006 ‘ग्‍यारह सितंबर और अन्‍य कविताएं’ शीर्षक कविता संग्रह।
2012 ‘डा लोहिया और उनका जीवन-दर्शन’।
2012 अंधेरे में कविता के रंग – काव्‍यालोचना।
2014 – हिन्‍दी की कविता : प्रतिनिधि स्‍वर, के पांच कवियों में शामिल।
2015 में सोनूबीती-एक ब्‍लड कैंसर सर्वाइवर की कहानी।
2016 – एक उर्सुला होती है, कविता संग्रह।
सम्‍मान:
2000 में ‘परिदृश्‍य के भीतर’ के लिए पटना पुस्‍तक मेले का ‘विद्यापति सम्‍मान।
अनुदान – 2006 ‘ग्‍यारह सितंबर और अन्‍य कविताएं’ पुस्‍तक के प्रकाशन के लिए दिल्‍ली हिंदी अकादमी द्वारा।
अन्य:
वसुधा, हंस,पाखी, कथादेश, इंडिया टुडे, सहारा समय, समकालीन तीसरी दुनिया, जनपथ, जनमत, समकालीन सृजन, देशज, शुक्रवार, आउटलुक, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, कादम्बिनी, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, अक्सर, प्रथम प्रवक्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक – सामाजिक विषयों पर नियमित लेखन।
कुछ विश्‍वकविताओं का अंग्रेजी से हिन्‍दी अनुवाद, प्रकाशन।
संपर्क:
मो – 8769942898