डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के 21वां दीक्षांत समारोह के अवसर पर उपराष्ट्रपति के संबोधन का मूल पाठ
नमस्कार, आप सभी को मेरा अभिवादन!
मेरे प्रिय विद्यार्थियों, आप अमृत काल के दौरान उन मानवीय संसाधनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो हमारे भारत को 2047 तक लेकर जाएंगे। आप सभी 2047 के निर्माता और योद्धा हैं, वह ऐसा समय होगा जब देश अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा। मैं वास्तव में इस उत्कृष्ट संस्थान के इक्कीसवें दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनने और इस दीक्षांत समारोह को संबोधित करने के लिए स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
मित्रों, देश के उपराष्ट्रपति का पद भार संभालने के बाद देश के इस हिस्से की यह मेरी तीसरी यात्रा है। ये सभी हमेशा से प्रसन्नता पाने और खुशी को संजोने के क्षण रहे हैं, इसलिए यह यात्रा महत्वपूर्ण है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र के आठ राज्य वास्तव में भारत के लिए “अष्टलक्ष्मी” की तरह हैं; उनकी सहभागिता, भागीदारी और योगदान के बिना भारत अधूरा ही रहेगा।
डिब्रूगढ़, असम की खूबसूरत सांस्कृतिक और वाणिज्यिक राजधानी है। यह कई उल्लेखनीय बुद्धिजीवियों, साहित्यिक गतिविधियों, सांस्कृतिक एवं सार्वजनिक शख्सियतों का घर रहा है, जैसे राज्यसभा में मेरे सम्मानित सहयोगी और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई और उदार एवं शिष्ट व्यक्तित्व के धनी श्री सर्बानंद सोनोवाल जी। निःसंदेह इस तरह का व्यवहार प्रामाणिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति को दर्शाता है।
इस साल, हमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। सुश्री हेमोप्रोवा चुटिया, श्री हेम चंद्र गोस्वामी और श्री रामकुइवांगबे जेने जैसे नाम हैं, जिन्हें इस वर्ष उनके विशेष योगदान के लिए पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। पहले एक समय था जब पद्म पुरस्कार दो श्रेणियों में दिए जाते थे: एक संरक्षण के माध्यम से और दूसरा विशिष्टता द्वारा। पिछले कुछ वर्षों में इस व्यवस्था को बदल दिया गया है। पद्म पुरस्कार अब केवल योग्य लोगों को ही दिए जाते हैं और जिस क्षण उनके बारे में घोषणा की जाती है, तो हर कोई इससे प्रसन्न होता है कि सही व्यक्ति को पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन सब को बहुत-बहुत बधाई है।
आज जब मैं अपने देश के इस हिस्से में हूं, तो मैं बड़े गर्व के साथ कामरूप के राजा पृथु जलापेश्वर के वीर शौर्य का स्मरण करता हूं, जिन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय के विध्वंसक बख्तियार खिलजी को पराजित किया था और साथ ही हम महान अहोम योद्धा लचित बरफुकन को भी गर्व और सम्मान के साथ याद करते हैं, जिन्होंने सरायघाट के प्रसिद्ध युद्ध में मुगल सेनाओं को नाकों चने चबवा दिए थे।
मित्रों, आपके विश्वविद्यालय का आदर्श वाक्य जो भगवत गीता से लिया गया है, बहुत उपयुक्त और महत्वपूर्ण है, “नियम कुरु कर्मः” अर्थात क्या आप अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। भगवत गीता में हमें जो सिखाया गया है, यदि हम इसे उससे आगे ले जाएं तो “कर्म ही आपकी पूजा है; प्रतिफल आपकी चिंता का विषय नहीं है”। वास्तव में यह हमें एक अलग ही अंतर्दृष्टिपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है कि हमें भारतीय होने पर सर्वदा और हमेशा गर्व करना चाहिए।
हमें अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों और प्रवीणताओं पर सदैव गर्व करना चाहिए। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि आपका विश्वविद्यालय इस क्षेत्र की भाषाई विविधता तथा इसकी साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण के लिए एक प्रमुख केंद्र बिंदु के रूप में उभरा है।
अपनी भाषा को संजो कर रखना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें हजारों वर्षों में मिली है और भारत सरकार इस दिशा में बहुत कुछ कर रही है। विश्वविद्यालय द्वारा किया गया कार्य हमारी संस्कृति में समाहित मूल्यों का उदाहरण है। बोडो, ताई और अन्य भाषाओं के पाठ्यक्रमों पर ध्यान देना सराहनीय पहल है।
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन परफार्मिंग आर्ट्स का नाम आधुनिक भारत के सबसे शानदार सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक भारत रत्न से सम्मानित डॉ. भूपेन हजारिका के नाम पर रखा गया है, जो बहुत ही उचित निर्णय है। उनका नाम हमें एक अलग तरह की सोच में लेकर जाता है। देश का सबसे लंबा सड़क पुल असम में है और इसका नाम भी दिग्गज व्यक्तित्व के भूपेन हजारिका के नाम पर भूपेन हजारिका सेतु रखा गया है।
एक और शानदार उपलब्धि यह है कि डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय को जी20 यूनिवर्सिटी कनेक्ट कार्यक्रम की मेजबानी करने और इसमें भाग लेने के लिए देश में उच्च शिक्षा के चुनिंदा 76 संस्थानों में से एक के रूप में चुना गया है। मित्रों, यह हम सभी के लिए अत्यधिक गर्व का क्षण है और समझा जा सकता है कि इस पहल से देश की वैश्विक छवि में क्या वृद्धि हुई है। भारत जी20 शिखर सम्मेलन का अध्यक्ष है और देश भर में आयोजित हो रहे अलग-अलग कार्यक्रमों के माध्यम इसकी मेजबानी हर जगह देखी जा सकती है तथा इसका प्रभाव भी समझा जा रहा है। यह विश्वविद्यालय उसका केंद्र भी है।
दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों, उनके शिक्षकों और उनके माता-पिता के जीवन का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह एक पारितोषिक है, एक कड़ी मेहनत से अर्जित की गई उपलब्धि है, जो आपको व्यापक बाहरी दुनिया में एक पग भरने और एक छलांग लगाने का अवसर देती है। यह एक बेहतरीन टर्निंग पॉइंट है; इस महान विश्वविद्यालय के छात्र होने के बाद से अब आप पूर्व छात्र होने का दर्जा प्राप्त करेंगे। सामाजिक परिवर्तन लाने में आपको बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। आप ऐसे समय में अपना करियर शुरू कर रहे हैं जब प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है, अवसर बहुत बड़े हैं और चुनौतियां काफी कठिन हैं। जैसा कि मैं अपनी युवावस्था को याद करता हूं, कुछ ऐसा जो उस समय मेरे पास नहीं था; वह अब अनुपस्थित नहीं है। आज सरकार की अपनी सफल और सकारात्मक नीतियों के कारण एक ऐसे इकोसिस्टम का उदय हुआ है, जहां हर युवा अब अपनी क्षमता एवं प्रतिभा को अधिकतम सीमा तक उजागर करने का अधिकारी है। आपके पास एक अच्छा विचार होना चाहिए, फिर उस विचार को क्रियान्वित करने के लिए आपको सिस्टम का पूरा सहयोग मिलेगा।
कोविड महामारी मानवता के लिए एक बड़ी चुनौती थी। तनावपूर्ण कालखंड थे; इस अवधि के दौरान भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
हम निवेश और अवसरों के अनुकूल वैश्विक गंतव्य बन गए हैं। सितंबर 2022 में हमें पांचवीं सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ। सोने पर सुहागा जैसा बिल्कुल और भला क्या हो सकता था? ऐसा करने में, हमने अपने पूर्व औपनिवेशिक स्वामी को भी पीछे छोड़ दिया जो एक बड़ी उपलब्धि है। यह सचमुच में हमारे दूरदर्शी नेतृत्व और हमारे लोगों की कड़ी मेहनत के लिए एक पुरस्कार की तरह है।
साथियों, मौजूदा दशक के अंत तक भारत तीसरी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बन जाएगा और यह इसलिए भी हो सकता है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में हमारे पास सरकार का एक नया मंत्र है “न्यूनतम सरकार और अधिक शासन”, हालांकि पहले इसका उल्टा होता था।
एक समय था जब इस देश के एक अन्य तरह के प्रधानमंत्री थे और उन्नीस सौ अस्सी के दशक में उनके बयान से यह परिलक्षित होता है कि लाभार्थियों को दी जाने वाली 85% सहायता गायब हो जाती है, यह उन तक पूरी नहीं पहुंचती है। आज प्रत्यक्ष लाभ अंतरण हो रहा है और लीकेज को 100 फीसदी बंद कर दिया गया है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि पहले दूरदर्शी योजना बनाकर और फिर मानव संसाधन के क्रियान्वयन से हासिल की गई है।
एक ऐसा भी दौर था जब सत्ता के गलियारों को सत्ता के मध्यस्थ से पोषित किया जाता था, तब बिचौलियों की संस्था फलती-फूलती थी और उनके पीछे कोई पारदर्शिता तथा जवाबदेही नहीं होती थी। वर्तमान में सत्ता के गलियारों को इन सभी दुष्ट तत्वों से मुक्त कर दिया गया है और संस्था का अतिरिक्त-कानूनी उत्तोलन गायब हो गया है। वास्तव में, सत्ता के मध्यस्थ , संपर्क एजेंटों और बिचौलियों के इस उद्योग का सफाया हो गया है।
मित्रों आज के दिन जब आपको मेहनत का फल मिल गया है और आप बड़े क्षेत्र में कदम रख रहे हैं; तो मैं आपको बता सकता हूं कि सबसे अच्छा गुरु प्रतिस्पर्धा है, प्रतियोगिता से बड़ा गुरु नहीं हो सकता है और सबसे घातक दुश्मन भय है यानी कि हार या असफलता का डर। आप शिक्षा के एक पाठ के रूप में इसे मुझसे ग्रहण करें, कभी तनाव न लें, कभी दबाव न होने दें, सकारात्मकता के साथ सभी चुनौतियों का सामना करें। अपनी ऊर्जा को बाहर निकालें। आप सबको मेरी यही सलाह है कि अलग-अलग चीजों को आजमाएं। अपरंपरागत कार्य करने का प्रयास करें। किसी विचार को अपने मन में घर करने की अनुमति न दें, जिस क्षण आप किसी विचार को कार्य में बदले बिना कोई स्थान देते हैं, तो वास्तव में आप समाज में कोई योगदान नहीं दे पा रहे हैं।
जिन लोगों ने बड़े-बड़े मुकाम और उपलब्धियां हासिल की हैं, वे कई बार असफल हुए हैं। आपको इस डर को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए। प्रगति नवाचार से आती है। अच्छे विचार तभी सामने आ सकते हैं, जब आप लीक से हटकर सोचेंगे।
साथियों, मैं तीन साल तक पश्चिम बंगाल राज्य में राज्यपाल रहा हूं। मैं व्यक्तिगत रूप से उस परिवर्तनकारी बदलाव को देख रहा हूं जो पूर्वोत्तर में हो रहा है। 1991 में हमारे पास “लुक ईस्ट” नीति थी और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद हमारे पास “एक्ट ईस्ट” नीति है।
वर्ष 2014 भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था। लंबे समय तक देश के पास गठबंधन वाला शासन था और इसके 3 दशकों के अंतराल के बाद हमारे पास एक दलीय सरकार था। मैं 1989 में संसद के लिए चुना गया था तो मैं एक केंद्रीय मंत्री था। हम एक दर्जन से ज्यादा पार्टियों की सरकार चला रहे थे। मैं इसके दुष्परिणाम जानता हूं और जनता के एक महत्वपूर्ण फैसले ने भारत को एक ऐसे राष्ट्र में बदल दिया है, जिसे विश्व अब गौर से देखता है तथा दुनिया भारत का सम्मान करती है। मानवता की आवाज का 1/6 भाग कभी भी इतना स्पष्ट नहीं था जितना कि वर्तमान में है। लेकिन इस हिस्से में जो विकास हुआ है वह महत्वपूर्ण है और बहुत विशाल है।
एनसीईआरटी हमारे इतिहास और हमारे स्वतंत्रता संग्राम में इस क्षेत्र के गुमनाम नायकों के योगदान को शामिल करने के लिए सराहनीय रूप से पाठ्यक्रम सामग्री तैयार कर रहा है।
हम उन्हें लगभग भूल चुके थे। आप देश के किसी भी हिस्से में जाओगे तो वीरों के बारे में जानोगे; हमें आजादी का अमृत महोत्सव में उनके योगदान को पहचानने की जरूरत है। इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) ने पूर्वोत्तर के गुमनाम स्वाधीनता सेनानियों पर व्याख्यान की एक श्रृंखला आयोजित की है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र अब भौतिक, सामाजिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे में अपनी चौतरफा प्रगति के कारण अवसरों की भूमि के रूप में उभर रहा है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए पीएम डेवलपमेंट इनिशिएटिव फंड इंफ्रास्ट्रक्चर कन्वर्जेंस के साथ अच्छे परिणाम दे रहा है।
पिछले नौ वर्षों में सड़क संपर्क सुविधा की 375 परियोजनाओं का शुभारंभ किया गया है। ऐतिहासिक बोगीबील रेल-सह-सड़क पुल का उद्घाटन कुछ साल पहले ही किया गया था।
मैं बिना किसी विरोध के कह सकता हूं कि अब आप दुनिया के किसी भी भाग में चले जाइए, लेकिन पूर्वोत्तर के इस हिस्से में जिस प्रकार की संस्कृति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, तरह-तरह के पेड़-पौधे और जीव-जंतु, भिन्न-भिन्न प्रकार के पार्क एवं अभ्यारण्य, अलग-अलग तरह के धार्मिक स्थल हमारे पास हैं, वे हमारे पास दुनिया में और कहीं नहीं है। रेल कनेक्टिविटी में लगातार वृद्धि और हवाई अड्डों के नेटवर्क के बढ़ने से यह क्षेत्र बाकी देशवासियों के लिए प्रभावी तरीके से सामने आ रहा है। आज जब देश के इस हिस्से में यात्रा करने की बात आती है तो रेल कनेक्टिविटी के अलावा जो बदलाव आया है, उसे देखिए तथा समझिये। हवाई अड्डों की संख्या 9 से 17 हो गई है। यह सब कुछ इस क्षेत्र के विकास के लिए शुभ संकेत है और हमारे समावेशी विकास का द्योतक है।
मैं स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र, शिक्षा क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकार के बीच सहयोग की बहुत प्रशंसा एवं सराहना करता हूं। पिछले साल, राज्य में सात कैंसर अस्पताल खोले गए और प्रधानमंत्री द्वारा पूरे असम में सात नए कैंसर अस्पतालों की आधारशिला रखी गई।
मैं इस समाज में समानता, प्रगति और विकास लाने के लिए शिक्षा को सबसे प्रभावी परिवर्तनकारी तंत्र के रूप में मानता हूं। लोगों के शिक्षित होने से सामाजिक परिस्थितियों को कोई नहीं बदल सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाए तो आईआईटी गुवाहाटी में विज्ञान एवं गणित की शिक्षा में उत्कृष्टता केंद्र सहित पिछले नौ वर्षों में पूर्वोत्तर क्षेत्र में उच्च शिक्षा के 190 नए संस्थान स्थापित किए गए हैं।
युवाओं के लिए अब नए मार्ग बन रहे हैं तथा परिदृश्य उपलब्ध हो रहे हैं, जो पहले कभी नहीं थे, ऐसा इसलिए भी है कि वे अपनी ऊर्जा को उजागर कर सकें और अन्य युवाओं को बढ़ावा दे सकें। आपकी “ईशान उदय” छात्रवृत्ति योजना बहुत मददगार है और इसी तरह से 190 नए कौशल विकास संस्थान स्थापित किए गए हैं।
पूरी दुनिया में भारत की पहचान उसके कुशल मानव संसाधन के लिए हो रही है। यह हमारे डीएनए के लिए सम्मान है कि हम भारतीय लोग बहुत तेजी से कौशल सीखते हैं। लेकिन अगर सरकार ऐसी संस्थाओं के साथ आगे आती है तब विकास अंकगणितीय नहीं होता बल्कि यह ज्यामितीय होता है।
मैं कुछ विश्वसनीय उपलब्धियों की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं। आज पूरी दुनिया में हमें कोई प्रशंसा की नजर से तो कोई ईर्ष्या की नजर से देख रहा है। यह ग्रह पर सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में लोकतंत्र की जननी और बहुत कार्यात्मक लोकतंत्र राष्ट्र है, भारत की उपलब्धियों को समझें। 99.9 प्रतिशत वयस्क भारतीयों के पास एक डिजिटल आईडी- आधार है, जो सभी के लिए उपलब्ध है और मुफ्त है। यह आम लोगों के जीवन में परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ है। नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल रोमर इसे “दुनिया में बौद्धिक रूप से सबसे प्रभावशाली आईडी कार्यक्रम” के रूप में वर्णित करते हैं। जब देश की प्रशंसा करने की बात आती है तो जो लोग देश से बाहर होते हैं वे अपना होमवर्क करते हैं और जब हमारे देश को बदनाम करने तथा नीचा दिखाने की बात आती है तो यह लोगों का एक नैरेटिव बन जाता है।
जन धन खातों, आधार संख्या और मोबाइल टेलीफोनी की जेएएम त्रिमूर्ति ने बिना किसी बिचौलिए के लाभार्थी खातों में सीधे बैंक हस्तांतरण को संभव बना दिया है। पीएम किसान सम्मान निधि के तहत अब तक 11 करोड़ भारतीय किसानों को 2.25 लाख करोड़ रुपए मिल चुके हैं। उन्हें बिल भुगतान के लिए अब कहां लंबा इंतजार करना पड़ता है? पासपोर्ट से लेकर राशन कार्ड तक, रोजगार के लिए आवेदन करने तक, आपको अपने गांव से बाहर जाने की जरूरत नहीं है। प्रौद्योगिकी आपके द्वार पर उपलब्ध है।
डिजिटल भुगतान लेनदेन, साल 2022 में 1.5 ट्रिलियन डॉलर की राशि के साथ अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में संयुक्त लेनदेन से चार गुना से अधिक रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, भारत ने “विश्व स्तरीय डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा” विकसित किया है। हम एक ऐसा देश हैं जहां पर अब 700 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और हम चीन तथा अमरीका की खपत को पार कर चुके हैं।
हमारे स्टार्टअप तथा यूनिकॉर्न्स हमें बहुत गौरवान्वित करते हैं। मुद्रा योजना ने न केवल नौकरी तलाशने वाले बल्कि नौकरी देने वाले बनने के उद्देश्य से भी हर किसी के लिए एक नया अवसर उपलब्ध कराया है। इसकी शुरुआत के बाद से अब तक 23 लाख करोड़ रुपये से अधिक मुद्रा ऋण दिए गए हैं और इस योजना के लाभान्वितों में करीब 70% महिला उद्यमी हैं। यह जानकर बहुत खुशी हुई कि जब माननीय राज्यपाल विद्यार्थियों को उनकी सफलता की डिग्री से सम्मानित कर रहे थे, तो मैंने संख्या की जांच नहीं की, लेकिन हमारी लड़कियां शायद लड़कों से आगे निकल गईं। इनकी संख्या अधिक थी।
2020-21 के दौरान केवल असम में 6.8 लाख उद्यमियों ने मुद्रा योजना के तहत 4500 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लिया। जब हम 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएंगे, तो ये उपलब्धियां हमें विश्व में सही स्थान प्राप्त करने में मदद करेंगी।
मुझे आपसे जाना चाहूंगा कि जब सब कुछ ठीक चल रहा है तो हममें से कुछ लोग हमारे लोकतंत्र की निंदा क्यों करते हैं, क्यों देश के अंदर तथा बाहर हममें से कुछ लोग जबरन बेवजह की बात करते हैं और कहते हैं कि इस देश में लोकतांत्रिक मूल्य नहीं हैं। मैं विश्वास के साथ और विरोधाभास के डर से यह कहने की हिम्मत करता हूं कि भारत आज के समय में पृथ्वी पर सबसे जीवंत तथा कार्यात्मक लोकतंत्र है।
दुनिया का कोई भी देश गांवों, नगर पालिकाओं, राज्यों और संसद के लिए एक संवैधानिक लोकतांत्रिक तंत्र होने का दावा नहीं कर सकता है। मैं विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों और मीडिया से अपील करता हूं कि उन्हें इस देश के राजदूत के रूप में कार्य करना होगा, उन्हें हमारे राष्ट्रवाद में विश्वास करना होगा और उन्हें ही इस नैरेटिव को समाप्त करना होगा। हम उनका समर्थन नहीं कर सकते जो देश और विदेश में हमारे विकास पथ तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को कलंकित करते रहते हैं।
राज्यसभा के सभापति के रूप में आज मैं जानता हूं कि हमारे देश में उपलब्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी तरह की चुप्पी के अधीन नहीं है। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें अपनी राय बदल लेने की आवश्यकता है।
बाहर के कुछ विश्वविद्यालयों से इस तरह की झूठी कहानियां निकल रही हैं। अमरीका में कुछ विश्वविद्यालयों में केवल भारतीय छात्र ही हैं जो अपने देश की आलोचना करते हैं। आपको दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा जहां एक संकाय सदस्य, एक देश का छात्र अपने राष्ट्र के बाहर अपने ही देश की आलोचना करता है।
आपको ऐसा राजनेता नहीं मिलेगा जो हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को धूमिल करने के लिए दुनिया भर में घूमे। यह भारतीय संस्कृति नहीं है।
नरसिम्हा राव जी द्वारा भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया था। हमें अपनी मातृभूमि में विश्वास करना होगा और अपने राष्ट्रवाद की उदारता को सम्मान करना होगा। जिम्मेदारी आप सब पर है और आपको ही कोई रास्ता निकालना होगा ताकि इस तरह के हानिकारक व भयावह बयानों को कोई स्थान न ही दिया जाए।
संसद और शिक्षण संस्थान मंदिर के सामान हैं। संसद संवाद, वाद-विवाद, विचार-विमर्श और चर्चा का स्थान है न कि व्यवधान एवं अशांति को फैलाने का।
हम एक राजनीतिक उपकरण के रूप में गड़बड़ी को हथियार कैसे बना सकते हैं? हम इन स्थानों को इतना प्रदूषित कैसे होने दे सकते हैं? मेरे नौजवान साथियों, संविधान सभा ने भारत का संविधान तीन साल में बनाया और उन तीन वर्षों में उन्होंने बहुत ही संवेदनशील मुद्दों पर बहस की, कुछ ऐसे विषय भी थे जो बहुत विभाजनकारी, बहुत जटिल और पेचीदा माने जा सकते थे। लेकिन उस समय कोई व्यवधान और अशांति नहीं थी। सबका सहयोग का रवैया रहा था न कि टकराव का।
मैं बुद्धिजीवियों और मीडिया से आह्वान करता हूं कि यह अमृत काल में समय है और हम एक इकोसिस्टम बनाने में मदद कर सकते हैं ताकि हमारे सांसद हमारे संविधान के निर्माताओं की भावना और उसके सार के प्रति सकारात्मक कार्रवाई करें।
मुझे कोई संदेह नहीं है दोस्तों कि इस विश्वविद्यालय से बाहर निकलने के बाद आप सामाजिक विकास में योगदान देंगे, लेकिन दो चीजें कभी न भूलें। एक तो हमेशा अपने शिक्षकों का सम्मान करे क्योंकि अच्छे गुरु की सहायता के बिना कोई भी शिक्षा एक अच्छे इंसान के रूप में फलदायी नहीं हो सकती।
दूसरा, अपने विश्वविद्यालय को कभी न भूलें, विश्वविद्यालय के कल्याण के लिए आप जिस भी रूप में योगदान कर सकते हैं, अवश्य करें। एक स्वप्न देखें, लेकिन उस सपने को केवल अपने दिमाग में ही न रहने दें।
सपने को दिमाग के साथ खड़े नहीं रहने देना चाहिए, बल्कि सपने को साकार करना होता है।
मैं माननीय कुलाधिपति और कुलपति से यह आग्रह करता हूं कि हमें पूर्व छात्रों की ऊर्जा का दोहन करने की आवश्यकता है। वे बहुत बड़ा अंतर ला सकते हैं। मैं पूर्व छात्रों के परिसंघ के एक विचार की कल्पना कर रहा हूं, जो देश के कल्याण के लिए एक मेरुदंडीय वैचारिक मंच का गठन करेगा।
यदि आप अपने विश्वविद्यालय को ही लें, तो इसमें उल्लेखनीय पूर्व छात्र हैं तो क्या उनसे कोई विन्यास किया गया है, क्या किसी संरचना को विकसित किया गया है।
यह मेरे लिए सुखद अनुभव है। मैं माननीय माननीय कुलाधिपति और कुलपति का आभारी हूं और साथ ही माननीय मुख्यमंत्री के प्रति विशेष आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने न केवल इस राज्य की मेरी यात्रा को यादगार बनाया, बल्कि उन्होंने दार्जिलिंग में मेरे एक निमंत्रण को स्वीकार भी दिया।
मेरी तरफ से आप सभी को बधाई।

