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बहु तुम ये मकान दहेज में नहीं लाई थी….

धीरे-धीरे कदमों से चलती हुई तरुणा जी अपने घर की तरफ बढ़ रही थीं। उन्हें इस तरह लँगड़ाते हुए देखकर पड़ोस में रहने वाली सुमन जी ने कहा,
” अरे भाभी जी! क्या हुआ? लगता है आपके घुटनों में दर्द ज्यादा है?”
” हां बुढ़ापे का शरीर है, दर्द तो यूं ही चलता रहता है। दवाइयां लानी थीं इसलिए निकल कर गई थी वरना घर पर आराम ही कर रही थी”
” तो आप अकेले क्यों गई थीं दवाई लेने? अजीत को ले जातीं”
सुमन जी की बात सुनकर तरुणा जी चुप हो गईं। आखिर कहतीं भी तो क्या कि बेटा उनके साथ नहीं जाता। पर सुमन जी को तो उनके घर की सारी रामायण पता थी इसलिए उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा और चुप हो गईं। आखिर बोल बोलकर क्या किसी के दर्द को कुरेदना।
तरुणा जी वैसे ही लँगड़ाते हुए अपने घर की तरफ बढ़ गईं। तरुणा जी जैसे ही घर में घुसीं देखा तो उनके कमरे का सामान ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट हो रहा था। एक पल के लिए वो तो सोच में पड़ गईं, पर फिर बोलीं,
” अरे मेरा सामान ऊपर कहाँ शिफ्ट कर रहे हो? मेरा कमरा तो नीचे है ना”
” है नहीं, था मम्मी जी। हमें उस कमरे की बहुत जरूरत थी। इस कारण से आपका कमरा ऊपर शिफ्ट कर रहे हैं”
” पर मेरे घुटनों में दर्द रहता है। यूँ सीढ़ियाँ ऊपर नीचे चढ़ना नहीं कर सकती बार-बार”
” यूँ बाहर घूम कर आने में आपके घुटने में दर्द नहीं होता। ऊपर नीचे होने में ही दर्द होता है। सब बहाने हैं, रहने दीजिए। आपको ऊपर वाले कमरे में ही जाना पड़ेगा”
” पर बहू में घूमने नहीं गई थी। मेरी दवाइयां खत्म हो गई थीं। मैं तो अपने घुटनों के लिए दवाई लेने गई थी”
” देखिए मम्मी जी, मेरी बहन आ रही है। पूरे दो साल का कोर्स है तो दो साल तक वो यही रहेगी और उसे कमरे की जरूरत पड़ेगी इसलिए आपका कमरा खाली कर रहे हैं”
“अरे तो उसे ऊपर वाला कमरा दे दो। वो तो जवान है, आराम से ऊपर रह सकती है। मना थोड़ी ना कर रही हूं”
” मेरी बहन उस छोटे से कमरे में रहेगी? मायके में मेरी भी कोई इज्जत है। और आप मुझे मना करने वाली कौन होती हैं? घर हमारा है। घर का खर्चा हम उठा रहे हैं। हमारा डिसीजन हम किसे कहाँ रखते हैं? ऊपर वाले कमरे से इतनी ही दिक्कत है तो आप बाहर वाले कमरे में रह जाइए। हमें कोई एतराज नहीं है”बहू एकता ने बड़ी बेरुखी से साथ कहा।
सुनकर तरूणा जी की आंखों में आंसू आ गए। बेटा अजीत सामने ही था लेकिन वो तो बुत बना खड़ा तमाशा देख रहा था। एक बार भी उसने एकता को टोका तक नहीं। और बाहर वाला कमरा? वो तो स्टोर रूम था। मतलब अब तरुणा जी की ये हैसियत रह गई। बहु कबाड़ की तरह तरुणा जी को स्टोर रूम में रहने के लिए कह रही थी और नालायक बेटा सामने खड़ा था लेकिन वो कुछ कह नहीं रहा था।
जबसे तरुणा जी के पति गए हैं तब से बेटे बहू घर के सर्वे सर्वा बन गए हैं। माना कि घर में खर्चा करते हैं पर इसका मतलब यह नहीं कि मां के स्वाभिमान को ही कुचल दें जबकि मकान अभी भी उन्हीं के नाम था। अपनी बहू की जबान से ज्यादा तरुणा जी को उनके बेटे की चुप्पी चुभ रही थी। आखिर बर्दाश्त के बाहर हो गया तो वो बोल पड़ी,
” बहु जब तुमने मेरा कमरा लिया था ये कहकर की मम्मी जी हमें बड़े कमरे की जरूरत है, तब मैंने कुछ नहीं कहा। यह सोचकर चुप रह गई थी कि बेटे बहु को क्या तकलीफ देना। दोनों मेरे अपने ही तो हैं। लेकिन आज, तुम मुझे स्टोर रूम में रहने को कह रही हो”
” शुक्र मनाइए कि स्टोर रूम में रहने को कह रही हूं, वृद्धा आश्रम में नहीं भेज रही हूँ। एक तो हमारा ही खाती हो, ऊपर से हमें ही सुना रही हो”
” बस करो बहु। बहुत बोल लिया तुमने। यह घर आज भी मेरा है। तुम यह मकान अपने दहेज में नहीं लाई थी। और हाँ, चुपचाप अपना कमरा भी खाली करो। मैं अपने कमरे में वापस शिफ्ट हो रही हूं”
” अच्छा, घर का खर्चा हम कर रहे तो आपकी दो बातें क्यों सुनें?”
” आज के बाद करने की जरूरत नहीं है। अगर इस घर में रहना है तो किराया दो। अन्यथा घर खाली करके चले जाओ। मैं किराएदार रख लूंगी। मेरे घर का खर्च मैं खुद निकाल लूँगी”
” मम्मी तुम अपने बेटे को इस घर से निकलने के लिए कह रही हो?”
” वाह बेटा! इतनी देर से तेरी बीवी जब मेरी बेइज्जती किए जा रही थी। मुझे वृद्धाश्रम छोड़कर आने की बात कर रही थी, तब तुझे सुनाई तक नहीं दे रहा था। और मैंने तुम लोगों से किराया क्या देने को कह दिया, तुम्हें सुनाई देने लगा। मुझे कुछ नहीं सुनना। अब तक यही सोचती रही कि काश एक दिन तुम लोग मुझे समझोगे पर वो दिन कभी नहीं आया। शायद मुझे अकेले रहने से डर लगता था। पर अब नहीं, अब यूँ बेइज्जत होकर साथ रहने से अच्छा है स्वाभिमान के साथ अकेली ही रहूँ। अब जो भी निर्णय लेना है फटाफट लो और कमरा खाली करो। बस”
ये सब सुनकर बेटा बहु की हालत खराब हो गई। इतनी जल्दी कहां जाएंगे? दोनों फटाफट मां के पैरों में पड़ गए,
” हमें माफ कर दो मम्मी। प्लीज हमारे साथ ऐसा मत करो”पर तरुणा जी ने मन पक्का कर लिया था। वे झुकने को तैयार नहीं हुईं। निरादर की दो रोटी से तो स्वाभिमान की एक रोटी भली। और भला काश के इंतजार में जिंदगी क्यों बितानी?
और आखिरकार अजीत और एकता उसी घर में ऊपर वाले दो कमरों में शिफ्ट हुए और आज भी उसका किराया दे रहे हैं। जबकि नीचे का वो एक कमरा किसी और को तरुणा जी ने किराए पर दे दिया। रही बात एकता की बहन की तो वह हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई कर रही है।