बेटा, तुम्हारे लिए लड़की पसंद कर रहे हैं… अब तक तो तुम्हें ये छूट दे रखी थी
कि कोई पसंद है तो बता दो, पर तुमने कभी किसी का ज़िक्र ही नहीं किया। अब हमें एक लड़की पसंद आ रही है, तेरी ताई जी के रिश्ते में है। देखा-सुना परिवार है। बस एक बार तू भी आकर मिल ले… बातें कर लें, फिर हम शादी पक्की कर देंगे।” सुभद्रा जी ने बेटे अनिकेत से कहा।
“क्या माँ, अभी कोई उम्र है शादी की? मुझे कुछ दिन चैन से तो रहने दो। देखा नहीं है, भैया कितने उतावले थे ब्याह को। सुंदर सुशील कन्या कहकर तुम चारू भाभी को घर ले आई, फिर क्या हुआ, भूल गई हो क्या? पहले सब पता कर लो, फिर ही मैं शादी के लिए सोचूँगा। अभी ऑफिस में हूँ, काम ख़त्म कर लेने दो।” अनिकेत ने कहकर फ़ोन रख दिया।
“ये लड़का भी ना… यहाँ रहता तो कान खींच कर मना लेती, पर रहता भी इतना दूर है, कुछ कर नहीं सकती।” सुभद्रा जी मन ही मन भुनभुनाई।
“क्या हुआ श्रीमती जी, क्या कहा बेटे ने?” परितोष जी ने पूछा।
“क्या बोलेगा, बड़े भाई की शादी की बात छेड़कर मेरा मुँह बंद करवा दिया।” सुभद्रा जी बोलीं।
“वैसे सुभद्रा, बेटा बोल तो सही ही रहा है। हम रिश्तेदारों की सोचकर रिश्ता जोड़ तो लेते हैं, पर बाद में गच्चा खाकर समझ आता है। एक बार ना कर देते तो आज इतने रिश्ते ख़राब तो नहीं होते।” परितोष जी ने सुभद्रा जी के हाथ पर सांत्वना का हाथ रखकर कहा।
सुभद्रा जी बातें सुनकर अतीत में चली गईं—
कितने जतन से बड़े बेटे का ब्याह किया था। उनकी ननद ने अपने ससुराल में रिश्ता तय करवा दिया था। सुंदर, सुशील और दुनिया जहान के गुणों की खान बताकर ननद शादी तय करवाने के बाद सबसे वाहवाही लेती रहती थी, पर शादी के बाद समझ आया कि लड़की चारू इतनी नकचढ़ी थी कि ससुराल में किसी को कुछ ना समझती। पैसे वाले परिवार ने सुभद्रा और परितोष जी के ना-ना करने के बाद भी चारू के नाम एक कोठी दे दी और सभी सुविधाओं से उसे सम्पन्न करवा दिया।
चारू और साकेत हर वीकेंड पर वहाँ जाकर मस्ती करते। साकेत की जॉब अच्छी-खासी थी, पर ससुराल वालों ने उसे बिज़नेस के इतने बड़े सपने दिखाए। फिर चारू साकेत के कान भरने लगी और दोनों परिवार वालों को दुखी कर अलग हो गए। फिर चारू ने आना ही बंद कर दिया। साकेत कुछ समय तक आता रहा, फिर बाद में वो भी परिवार से अलग हो अपनी अलग दुनिया में रम गया। परितोष जी और सुभद्रा जी का हँसता परिवार एकदम से बर्बाद हो गया। ननद से रिश्ते खट्टे हुए सो अलग। ऐसे में अनिकेत के लिए फिर से परिवार में पहचान की लड़की के लिए हाँ कहना… उन्हें लगने लगा जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। पहले सब पता करेंगे, तब ही कुछ सोच कर बोल सकते हैं।
“सुनिए जी, हम जेठानी जी से मोहलत माँग लेते हैं। इस बार बेटे के ब्याह में गच्चा नहीं खाना।” सुभद्रा जी इस बार किसी कठोर फ़ैसले को अंजाम देने के लिए खुद को तैयार करते हुए बोलीं, “अगर लड़की और उसका परिवार नहीं जमा, तो ना करने में सकुचाना नहीं है।”
दोस्तों, बहुत बार ऐसा होता है कि शादी के मामले में लड़के और लड़की का परिवार गच्चा खा जाता है। शायद इसे ही किस्मत कहते हैं।
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