राजनीतिक पृष्ठभूमि और वर्तमान सियासी परिदृश्य
बिहार की राजनीति सदैव जटिल और बहुआयामी रही है। जाति समीकरण, गठबंधन राजनीति, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, विकास एवं लोकसंतुष्टि — ये सभी मिलकर चुनावी माहौल को आकार देते हैं।
Nitish कुमार इस राज्य की राजनीति में दो दशकों से अधिक समय से सक्रिय हैं — कई बार सत्ता बदली, गठबंधन बदले, विरोधी और सहयोगी दलों के साथ तरह-तरह के समीकरण बनाये गए।
2024 में ही Nitish कुमार ने महोघातबंधन (INDIA ब्लॉक) को छोड़कर एनडीए (BJP‑लक्ष्य गठबंधन) में वापसी की।
इस कदम से यह संकेत गया कि उनकी सियासी बाज़ीगरी अभी भी ज़िंदा है — वे अवसर और गठबंधन दोनों को तुलते-तुलते स्वीकार करते हैं।
अब, 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच, राजनीतिक सर्वेक्षण संस्थाएँ, पंडित-मीडिया और रणनीतिकार सक्रिय हो उठे हैं। ऐसे समय में Axis My India के प्रदीप गुप्ता ने जो बयान दिए हैं, वे न सिर्फ मीडिया में सुर्खियाँ बने हैं, बल्कि यह संकेत भी देते हैं कि चुनाव बहुत तंग मुकाबले में हो सकता है।
प्रदीप गुप्ता का मुख्य कथन: “Only common denominator is Nitish Kumar”
प्रदीप गुप्ता ने ANI को दिए इंटरव्यू में कहा:
“Bihar is a state where it is difficult to analyse even after the voting is done … but the only common denominator is Nitish Kumar, who has been there for 20 years.”
उनका यह कथन चयनित शब्दों में महत्वपूर्ण है:
“Only common denominator” — यानी, चुनाव के तमाम मतदाताओं, गठबंधनों, मुद्दों और तरह-तरह की प्रतिस्पर्धा के बीच, जब सबको मिलाकर देखा जाए तो एक ऐसा नाम जो सबसे अधिक निरंतर दिखाई देता है — वह Nitish कुमार का है।
यह बयान यह संकेत देता है कि, चाहे कितनी भी जन-विपरीत लहर आए, विरोधी कितने भी घनिष्ठ हों — जनता के लिए विकल्प का प्रश्न सबसे बड़ा रहेगा — “Nitish का विकल्प कौन?”
गुप्ता ने आगे कहा:
“Last time, both NDA and the INDIA bloc had 37 per cent vote share each, but RJD+ won 110 seats while NDA got 125 seats.”
“Anti-incumbency … In Bihar, it is very different.”
यानी, वोट प्रतिशत की बात करें तो पिछली बार वोट शेयर लगभग बराबर था, लेकिन सीटों का आरक्षण और गठबंधनों की सीट विभाजन ने दिशा तय की।
“कांटे की टक्कर” की संभावना: गुप्ता का संकेत और विश्लेषण
प्रदीप गुप्ता ने यह नहीं कहा कि नीतीश “भगवान” हैं या उनकी हार असंभव है। बल्कि, उनका तर्क यह है कि मुकाबला बहुत कड़ा होगा। उनके कुछ अन्य बिंदु:
BJP को वैकल्पिक विकल्प बताया
उन्होंने कहा कि बीजेपी, JD(U) और RJD दोनों के बीच एक विकल्प बन सकती है — या कम-से-कम समर्थकों की दृष्टि में विकल्प हो सकती है।“Supporters want them to come to power”: वह कह रहे हैं कि बीजेपी समर्थक यह चाहेंगे कि पार्टी अकेले इतनी ताकत हासिल करे कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उसका दबदबा दिखे।

“चेहरा” की बहस
गुप्ता ने कहा कि बीजेपी का एकमात्र चेहरा नरेंद्र मोदी है। वह पूछते हैं कि बिहार में बीजेपी के भीतर क्या कोई अलग सीएम चेहरा है या नहीं।
राजनीति में यह महत्वपूर्ण बिंदु है — जब किसी गठबंधन में एक बड़ा नेता (यहाँ मोदी) सबको ऊपर छा जाए, तो स्थानीय चेहरा पीछे रह जाता है। यह कुछ राज्यों में देखा भी गया है।जाति समीकरण और मुस्लिम–यादव गठजोड़
बिहार में जाति का प्रभाव हमेशा से बहुत गहरा रहा है। गुप्ता ने कहा कि मुस्लिम–यादव (M-Y) समीकरण लगभग 31–32% है, और RJD की मजबूती इसी से आती है।
इस समीकरण को तोड़ने या उसके सामने वैकल्पिक प्रस्ताव देना चुनौतिपूर्ण होगा।प्रशांत किशोर की भूमिका
उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर इस बार कुछ सीटें जीत सकते हैं, लेकिन पूरी सत्ताधारी ताकत बनना मुश्किल है।
यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक रणनीति एवं सर्वेक्षण क्षेत्र में प्रशांत किशोर की सक्रियता चर्चा में है।गठबंधन परिवर्तन, अनिश्चितता और प्रतिक्रिया
गुप्ता ने संकेत दिया कि नीतीश कुमार ने समय-समय पर अपने गठबंधन बदले हैं — इस गति से जनता में यह प्रश्न उत्पन्न हो जाता है कि वे कितना भरोसा दिला सकते हैं।
जब कोई नेता बार-बार गठबंधन बदलता है, तो विपक्ष इसे आचरित तौर पर “अपव्यवहार” या “राजनीतिक चापलूसी” कहता है।
इन बिंदुओं से मिलकर गुप्ता का संकेत स्पष्ट है: यह चुनाव आसान नहीं होगा, और Nitish कुमार को पूरी ताकत झोंकनी पड़ेगी।
Nitish कुमार की रणनीतिक चुनौतियाँ व संभावनाएँ
प्रदीप गुप्ता के विश्लेषण को ध्यान में रखते हुए, आगे विश्लेषण करते हैं कि Nitish कुमार की स्थिति क्या है — उनकी रणनीति, कमजोरियाँ और अवसर:

चुनौतियाँ
गठबंधन की विश्वसनीयता
बार-बार बदलते समीकरण से समर्थकों के मन में शंका बैठ सकती है — “यह गठबंधन कितनी देर तक टिकेगा?”।
किसी भी गठबंधन टूटने की स्थिति में, Nitish का राजनीतिक साख प्रभावित हो सकती है।“विकल्प कौन?” सवाल
गुप्ता ने स्वयं कहा — अगर जनता विकल्प तलाशे तो वह किसे देखे? RJD, BJP या प्रशांत किशोर?
यदि विपक्ष एक मजबूत विकल्प खड़ा कर ले, तो Nitish को कठोर मुकाबला करना पड़ेगा।जनविरोध/अत्यधिक क्षेत्रीय दबाव
यदि जनता यह महसूस करे कि पिछले कार्यकालों में विकास नहीं हुआ या वादे अधूरे रहे — तो विरोध की लहर बन सकती है।
जाति-आधारित मांगें, क्षेत्रीय असंतोष, स्थानीय नेतृत्व की नाराज़गी — ये सब चुनावी जोखिम बढ़ाते हैं।चुनावी दबाव और चुनावी लॉजिक
बिहार की राजनीति में, विकल्प बदलने या बंटवारे की संभावनाएँ बहुत अधिक होती हैं।
यदि सीटों में बंटवारा हुआ, या प्रमुख उम्मीदवार वफार्दार नहीं चले — तो नुकसान हो सकता है।मीडिया, सर्वेक्षण और सार्वजनिक धारणा
सर्वेक्षणों में कमजोर रिपोर्टें, मीडिया में आलोचना या “टर्नअउट” में गिरावट — ये तमाम दबाव हैं।
गुप्ता जैसे पंडितों की टिप्पणियाँ जनता और दलों दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।
संभावनाएँ एवं ताकत
लगातार उपस्थिति एवं अनुभव
Nitish कुमार की राजनीतिक उपस्थिति लंबे समय से है। जनता उन्हें जानती है, कई बार उन्होंने मुकाबले जीते हैं।
“Only common denominator” कहने में ही एक ताकत है — कि उन्होंने बिहार की राजनीति में टिके रहने की क्षमता दिखाई है।सामुहिक पहचान और ब्रांड
उनका “सुशासन” और “विकास” का ब्रांड अब जनस्वीकृति के रूप में कुछ लोगों में है।
यदि यह छवि जनता पर प्रभावी हो, तो यह विरोधी दावों को कमजोर कर सकती है।गठबंधन संभावनाएँ और सीट बंटवारा
यदि गठबंधन संतुलित और संतुष्टिप्रद हो — सीटों का समुचित बंटवारा हो — तो नुकसान न्यूनतम हो सकता है।
उनकी अनुभव यह कहता है कि वे ऐसे समीकरण बना सकते हैं जो कम प्रतिरोधी हों।लोकल लीडरशिप और विकास एजेंडा
यदि Nitish ने अपने स्थानीय नेता और कार्यकर्ता मजबूत बनाए हों, और विकास की कहानी जनता तक अच्छी ढंग से पहुँचाई हो — यह लाभ देता है।
विशेष क्षेत्रों में सफलतम परियोजनाओं, योजनाओं, लोकहित कार्रवाई को आधार बनाया जाना चाहिए।विपक्ष की कमजोरियाँ
यदि विपक्ष एकजुट न हो, यदि गठबंधन ढीला हो या नेता विवादों में घिरे हों — तो Nitish को लाभ मिल सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि RJD या कांग्रेस में असंतोष हो, या प्रशांत किशोर की चाल सफल न हो — तो सामना आसान हो सकता है।
विरोधियों की रणनीति: विपक्षी मोर्चे की चुनौतियाँ एवं योजना
Nitish कुमार के मुकाबले विपक्षी ताकतों (RJD, कांग्रेस, अन्य क्षेत्रवादी दल) को कुछ विशेष चुनौतियों और अवसरों की रणनीति अपनानी होगी:
एकज़ुटता बनाना
यदि सभी विपक्षी दल एक सामूहिक रूप से एक साझा प्रस्ताव व नेता दे सकें, तो यह मिट्टी को हल्का कर सकती है।
लेकिन अक्सर विभाजन या आत्म-स्वार्थी दांव इस एकजुटता को टालते हैं।विकास विरोधी नियंत्रण
विपक्ष को यह दिखाना होगा कि विकास व योजनाओं में कमी है — भ्रष्टाचार, अधूरे काम, ग्रामीण एवं पिछड़े भागों की उपेक्षा आदि मुद्दे सामने लाने होंगे।सामाजिक एवं जाति समीकरण का उत्कृष्ट उपयोग
मुस्लिम–यादव गठजोड़ जैसे समीकरणों को अपनी ओर करने की रणनीति हो सकती है।
यदि उन्होंने जाति समीकरणों को संतुलित किया, केंद्र की योजनाओं को घेरने की रणनीति अपनाई — तो वे मुकाबला कड़ा कर सकते हैं।नव उभरते चेहरे
यदि विपक्ष नई, स्वच्छ और प्रेरणादायक चेहरे प्रस्तुत करे — खासकर युवकों और महिलाओं को — तो जनता का आकर्षण मिल सकता है।मीडिया एवं जन-संचार युद्ध
डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया एवं पब्लिक रैलियों में बेहतर संदेश-रणनीति अपनाकर विपक्ष Nitish को घेरे में ला सकता है।
भविष्य की संभावना और ली गई चुनौतियाँ
प्रदीप गुप्ता का विश्लेषण हमें एक संभावना बताता है कि यह चुनाव “कांटे की टक्कर” हो सकता है। लेकिन चयन परिणाम पर निहित कई अनिश्चितताएँ भी हैं:
मतदान प्रतिशत, आश्रित वोटर व क्षेत्रीय बाधाएँ — ये सभी अंत तक संघर्ष का हिस्सा होंगे।
गठबंधन टूटने या आकर्षण ताकत बदलने पर हालात पल में बदल सकते हैं।
रणनीति, प्रचार, फंडिंग और संगठनात्मक मजबूती बहुत महत्वपूर्ण रोल निभाएंगी।
जनता की आखिरी अदायगी — वोट — तय करेगी कि किसका आखिरी पलझड़नी होगी।

गुप्ता के संकेत और Nitish कुमार की चुनौती
प्रदीप गुप्ता ने बहुत स्पष्ट संकेत दिया है — इस चुनाव में Nitish कुमार एक केंद्रीय भूमिका निभाएंगे, लेकिन यह मुकाबला आसान नहीं होगा। “Only common denominator” का कथन सिर्फ तारीफ़ नहीं है, बल्कि यह चुनौती का पैमाना भी है — कि जनता, विपक्ष और स्वयं गठबंधन यह देखेंगे कि विकल्प क्या है।
Nitish कुमार के लिए यह वक्त है:
गठबंधन की मजबूती सुनिश्चित करने का
जन समर्थन को फिर से चिन्हित करने का
विकास एवं लोकमूल्य की कहानी को जनता तक पहुँचाने का
नए नेतृत्व और पीछे न छूटने की रणनीति अपनाने का
विपक्ष के लिए यह समय है:
साझा प्रस्ताव देना
विकास एवं भ्रष्टाचार के प्रश्न को सामने लाना
नए चेहरे, मजबूत संगठन और सामाजिक समीकरण को खेलाना
समापन में कह सकते हैं कि प्रदीप गुप्ता का ये संकेत सियासी मौसम को और गरम कर गया है। बिहार 2025 का चुनाव एक तरह से यह लड़ाई होगी: अनुभव बनाम नवाचार, स्थिरता बनाम परिवर्तन, और जन विश्वास बनाम विकल्पों की खोज।
Pollster प्रदीप गुप्ता ने बिहार में भाजपा शासन के लिए एनडीए मतदाताओं की इच्छा पर प्रकाश डाला
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