क्यों यह खबर महत्वपूर्ण है?
1 अक्टूबर 2025 को, PM नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शताब्दी (100 वर्ष) के अवसर पर एक विशेष 100 रुपये का स्मारक सिक्का तथा विशेष डाक टिकट जारी किया। यह कदम न केवल एक समारोह की होर है, बल्कि इसमें बहुत से राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम जुड़े हैं।
यह घोषणा उस समय आई है जब धर्म, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और राजनीति की सीमाएँ अक्सर सार्वजनिक बहस में होती हैं। इसीलिए इस घटना को सिर्फ “सिक्का और टिकट जारी करना” न मानकर, हमें इसके पीछे के तर्क, संदेश और प्रभाव को समझना आवश्यक है।
1. घटना का विवरण
1.1 समय, स्थान और अवसर
यह कार्यक्रम 1 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित किया गया।
यह विजयादशमी / दशहरा के अवसर पर किया गया, जो RSS की स्थापना की तिथि से भी मेल खाता है (1925 में नागपुर में स्थापना विजयादशमी को की गई थी)।
RSS सरकार्यवाह (सार्वजनिक जानकारी में) दत्तात्रेय होसबाले भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।
1.2 कार्यक्रम की रूपरेखा
PM मोदी ने समारोहपूर्वक विशेष डाक टिकट और 100 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया।
समारोह में RSS और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।PM मोदी ने इस अवसर पर संघ की शताब्दी यात्रा को श्रद्धांजलि दी और संघ की भूमिका की महिमा गायी।
मोदी ने डाक टिकट और सिक्के के डिज़ाइन, प्रतीक और महत्व पर प्रकाश डाला।
2. ऐतिहासिक एवं वैचारिक पृष्ठभूमि: RSS का शताब्दी महत्व
2.1 RSS: स्थापना और उद्देश्य
RSS की स्थापना वर्ष 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी।
इसका मूल उद्देश्य था हिंदू समाज में राष्ट्र चेतना बढ़ाना, सामाजिक सेवा, अनुशासन और एकता को बढ़ावा देना।
संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन, समाज सुधार, शिक्षा, अन्य सामाजिक अभियान, आपदा राहत आदि क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है — जैसा कि सरकार और समर्थक मीडिया बताते हैं।

2.2 पूर्व स्मारक मुद्रा और टिकट जारी करने की परंपरा
भारत सरकार ने अतीत में कई अवसरों पर स्मारक सिक्के और डाक टिकट जारी किए हैं — जैसे किसी राष्ट्रीय घटना, प्रमुख विभूतियों या विशेष कार्यक्रमों के उपलक्ष्य में।
लेकिन 100 रुपये का स्मारक सिक्का और भारतीय मुद्रा पर भारत माता की छवि इस तरह के अवसरों में एक नए प्रतीक होते हैं,
क्योंकि यह पहली बार कहा जा रहा है कि भारत माता की छवि मुद्रा पर देखने को मिली है। डाक टिकट में भी संघ के इतिहास और योगदान को चित्रित करने का प्रयास किया गया है।
इस प्रकार, यह कदम न केवल स्मारक के रूप में लिया गया है, बल्कि विचारधारात्मक संदेश देने की कोशिश है।
3. सिक्का और डाक टिकट: डिज़ाइन, प्रतीक और विशिष्टताएँ
इस खंड में हम विश्लेषण करेंगे कि इन स्मारक मुद्राओं और टिकटों में क्या खास है और उनका प्रतीकात्मक अर्थ क्या है।
3.1 100 रुपये का स्मारक सिक्का: डिज़ाइन और प्रतीक
इस स्मारक सिक्के को 100 रुपये की मूल्यांकित राशि के साथ जारी किया गया है।
सिक्के के एक ओर राष्ट्रीय चिन्ह (अशोक स्तंभ) है, जिसमें “सत्यमेव जयते” लिखा है।
दूसरी ओर पर इसका डिज़ाइन विशेष है — भारत माता की प्रतिमा (विराजमान) और सिंह, और एक स्वयंसेवक (स्वयंसेवक को नमस्कार करते हुए) दिखाया गया है।
PM मोदी ने कहा कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार है कि मुद्रा पर भारत माता की छवि को मुद्रित किया गया है।
सिक्के में “RSS का मूल मंत्र / कथन (उदाहरण स्वरूप “राष्ट्रिय स्वाहा, इदम राष्ट्रम्, इदम न मम”) भी अंकित किया गया है।
3.2 डाक टिकट: डिज़ाइन और महत्व
डाक टिकट में RSS के इतिहास एवं भूमिका को चित्रित किया गया है।
एक प्रमुख डिज़ाइन तत्व है 1963 की गणतंत्र दिवस परेड, जिसमें RSS स्वयंसेवकों की भागीदारी का स्मरण किया गया है।
डाक टिकट को पोस्ट ऑफिस विभाग और वित्त मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से डिज़ाइन किया गया।

3.3 प्रतीकात्मक अर्थ और सन्देश
भारत माता की छवि राज्य-सत्ता और धर्म-संस्कृति के बीच संबंध को दर्शाती है।
स्वयंसेवक का नमस्कार राष्ट्र-सेवा की भावना को उजागर करता है — “नम्र सेवा निष्ठा” का भाव।
1963 परेड का संकेत यह देता है कि RSS ने पारंपरिक सार्वजनिक राष्ट्रीय समारोहों में सक्रिय भागीदारी की है।
इस तरह, सिक्का और टिकट न केवल स्मृति चिन्ह हैं, बल्कि राष्ट्रवाद और संघ की वैचारिक विरासत को सार्वजनिक भाषा में संप्रेषित करने का माध्यम हैं।
4. राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम
इस प्रकार की स्मारक मुद्राएँ और टिकटें केवल संग्रहणीय वस्तुएँ नहीं होतीं — वे राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेशों को अभिव्यक्त करती हैं। इस खंड में हम उन आयामों को आगे विश्लेषित करेंगे।
4.1 राजनीतिक आयाम
राजनीतिक हिमायती संदेश
इस तरह का कदम यह संदेश देता है कि सरकार RSS को मान्यता देती है और इनके योगदान को राष्ट्रीय विमर्श में शामिल करती है।
मोदी सरकार की नीति और संघ की वैचारिक निकटता इस घोषणा को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाती है।समर्थकों को संदेश
BJP / हिंदुत्व समर्थक वर्गों को यह दिखाने का एक प्रतीक है कि उनका नेता उनकी विचारधारा को सम्मान और दृश्यता देता है।विपक्ष और आलोचना
विपक्ष इस कदम को “राजनीतिक विचारधारा को राज्य द्वारा समर्थन” के रूप में देख सकता है। यह तर्क उठ सकता है कि सरकार सत्ता का उपयोग संगठन की वैचारिक विरासत को बढ़ावा देने में कर रही है।नवीनता और सीमाएँ
मुद्रा पर भारत माता की छवि पहली बार मुद्रित करना एक नया राजनीतिक कदम है, जो सीमाओं का परीक्षण करता है — धार्मिक प्रतीक और राज्य प्रतीक के बीच।

4.2 सामाजिक और पहचान संबंधी आयाम
सांस्कृतिक पहचान
भारत माता की छवि और संघ की कहानी जनता की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का प्रयास करती है।नारी (माँ) की अभिव्यक्ति
माता की छवि निजी और राष्ट्रीय स्तर पर “माँ का प्रतीक” बनाती है — यह मातृशक्ति, करुणा, और मातृभूमि के बीच जोड़ बनाती है।सामाजिक एकता और विभाजन
ऐस कदम कुछ वर्गों में गर्व की भावना जगाते हैं, लेकिन दूसरों में विभाजन या अस्वस्थ प्रतिक्रिया भी उत्पन्न कर सकते हैं — विशेषकर उन लोगों के लिए जो धर्म-राज्य विभाजन, धार्मिक न्युस्ट्रलिटी या सांस्कृतिक बहुलता को अधिक महत्व देते हैं।स्मृति और आने वाली पीढ़ी
इस तरह का सिक्का और टिकट आने वाली पीढ़ियों को एक सामाजिक स्मृति बनाकर देंगे — यह बताने के लिए कि 2025 में इस संगठन को किस प्रकार महत्व मिला।
4.3 सांस्कृतिक राजनीति और धर्म–राज्य संबंध
यह कदम राज्य और धर्म के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है — नागरिक के दृष्टिकोण से यह सवाल उठता है कि क्या राज्य पूरी तरह धर्म-निरपेक्ष है।
अगर राज्य धार्मिक प्रतीकों को मुद्रा पर सार्वजनिक रूप से मान्यता दे, तो धार्मिक अल्पसंख्यकों या वह लोग जो धर्म-निरपेक्षता को महत्व देते हैं, वे इसे चिंताजनक मान सकते हैं।
हालांकि समर्थकों का तर्क होगा कि यह सांस्कृतिक प्रतीक है न कि धार्मिक अनुष्ठान — लेकिन विभाजन की संभावना बनी रहेगी।
5. प्रतिक्रियाएँ, समर्थन और विवाद
कोई बड़ा सार्वजनिक कदम बिना प्रतिक्रियाओं के नहीं रहता। इस घटना पर लगभग तुरंत प्रतिक्रियाएँ आईं — समर्थन, आलोचना और मध्य स्थिति दोनों तरह की।
5.1 समर्थन और प्रशंसा
सरकारी मीडिया और निकट समर्थक मीडिया ने इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया — कि यह RSS की सेवा, शपथ और राष्ट्रवाद को अभिव्यक्त करता है।
मोदी ने इसे RSS की “सेवा भावना, अनुशासन और राष्ट्र प्रथम” की गौरवशाली यात्रा के रूप में याद किया।
मीडिया अंकन जैसे Times of India ने लिखा कि यह “उदाहरण” है कि सरकार कैसे संघ की भूमिका को सार्वजनिक स्मरण में शामिल कर रही है।
5.2 आलोचना और सवाल
आलोचक यह कह सकते हैं कि यह कदम राज्य को अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं का प्रचारक बनाता है।
धर्म-निरपेक्षता के समर्थक तर्क देंगे कि सार्वजनिक मुद्रा पर धार्मिक या धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक लगाना संवैधानिक प्रश्न पैदा कर सकता है।
यह भी कहा गया कि ऐसी पहल केवल प्रतीकात्मक होती है — असली मूल्य तब है जब नीतियाँ (शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता) मजबूत हों।
कुछ इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता यह तर्क उठा सकते हैं कि RSS के इतिहास और भूमिका विवादास्पद पहलुओं से भरा है, और इस ओर पर्याप्त जांच होनी चाहिए।
जब सत्ता और वैचारिक संगठन इतने निकट हों, तो प्रशासनिक तटस्थता पर सवाल उठ सकते हैं — निर्णय लेने, संसाधन आवंटन में पक्षपात की आशंका बनी रहती है।

5.3 मिश्रित और तटस्थ प्रतिक्रियाएँ
कुछ लोग इसे एक संस्कृति–राष्ट्र आंदोलन के प्रतीक के रूप में देखते हैं, और इसे आलोचना या समर्थन से ऊपर एक “आज़ादी की मान्यता” के रूप में स्वीकार करते हैं।
दूसरों ने इसे संग्रहणीय वस्तु मानकर देखा — “यह मेरे पास एक स्मृति होगी” — और इसलिए व्यावहारिक दृष्टिकोण लिया।
कई लोगों ने यह पूछा कि क्या यह सिक्का आम जन उपयोग के लिए होगा या केवल संग्रहणीय रूप से जारी किया जाएगा — यानी इसे सामान्य लेन-देन में उपयोग किया जाएगा या नहीं।
आलोचनाओं के बीच यह भी चर्चा हुई कि यदि अन्य विचारधाराओं को ऐसी समान पहुंच न मिले, तो यह असमान अवसर की शिकायत को जन्म देगा।
6. मूल्यांकन: यह घटना क्यों महत्वपूर्ण है?
यह सिर्फ एक स्मारक नहीं — बल्कि एक संदेश है। इस खंड में हम यह देखें कि यह कदम कितना रणनीतिक है और इसके संभावित दीर्घकालीन प्रभाव क्या हो सकते हैं।
6.1 प्रतीककरण और वैचारिक संदेश
मुद्रा और डाक टिकट आम जनता के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं — इसलिए उन्हें एक आदर्श प्रतीक माना जा सकता है।
इस तरह के प्रतीकों से सरकार यह संकेत देती है कि राष्ट्रवाद + संस्कृति + संगठन का मिश्रण उसका नैतिक आधार है।
यह कदम यह याद दिलाता है कि RSS की वैचारिक विरासत अब राष्ट्रीय पहचान के तत्व के रूप में स्थापित हो रही है।
6.2 रणनीतिक राजनयिक संतुलन
इस तरह की पहल उन लोगों को जोड़ने की कोशिश करती है जो राष्ट्रीय संस्कृति और हिंदू पहचान को महत्वपूर्ण मानते हैं।
साथ ही, इसे ध्यान से करना होगा, क्योंकि कटु आलोचना से सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है।
यदि यह सफल होता है, तो अन्य राष्ट्रीय या सांस्कृतिक संगठनों को भी अपनी मान्यता, स्मृति विमर्श में स्थान मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।
6.3 संभावित दीर्घकालीन प्रभाव
यह स्मारक सिक्का और टिकट आने वाले वर्षों तक एक सार्वजनिक स्मृति के रूप में रहेगा।
शिक्षा, सार्वजनिक विमर्श और इतिहास लेखन में इसका उल्लेख हो सकता है — उदाहरण के लिए “2025 में भारत ने मुद्रा पर भारत माता की छवि मुद्रित की”।
यह कदम अन्य नीतिगत निर्णयों और सरकार की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है — जैसे संस्कृति मंत्रालय, कला‑संस्कृति कार्यक्रमों, स्मारक निर्माण के लिए बजट, आदि।
यदि इस पहल से संगठनों के बीच समान अवसर नहीं रखे गए, तो यह सामाजिक तनाव और असंतोष को बढ़ा सकता है।
7. कुछ चुनौतियाँ और सवाल
इस प्रकार की पहल में निम्न चुनौतियाँ और प्रश्न उभरते हैं:
सामान्य जनता के लिए उपयोगिता
यह स्मारक सिक्का क्या सामान्य लेन-देन के लिए होगा या सिर्फ संग्रहणीय? अगर सामान्य जनता इसका उपयोग न कर सके, तो यह प्रतीकात्मक ही रहेगा।संवैधानिक एवं न्यायालयीन चुनौतियाँ
क्या किसी नागरिक या संगठन इस कदम को चुनौती दे सकते हैं — कि यह “धार्मिक प्रतीक राज्य द्वारा अधिकृत करना” है? धर्म-निरपेक्षता का तर्क उठ सकता है।केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन
यदि राज्य सरकारें या प्रदेश सरकारें अलग वैचारिक पहचान रखती हैं, तो वे इस तरह के कदमों को स्वीकार नहीं कर सकतीं।विविधता और बहुलता
भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी देश है। क्या इस तरह के प्रतीक उन समाजों में परेशानी खड़ी कर सकते हैं जो अलग सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान रखते हैं?प्रतिक्रिया प्रबंधन
मीडिया, विपक्ष और सोशल मीडिया की आलोचनाएँ संभालना चुनौती होगी। यदि कोई विधानसभा या अदालत चुनौती ले आए, तो सरकार को तर्कों का मजबूत आधार चाहिए होगा।

आगे की दिशा
PM नरेंद्र मोदी द्वारा RSS की शताब्दी पर 100 रुपये का स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी करना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रतीकात्मक कदम है। यह मुहिम:
RSS की शताब्दी यात्रा को स्मरण करने का माध्यम है
सरकार की वैचारिक प्राथमिकताओं को सार्वजनिक पहचान देती है
राष्ट्रवाद, संस्कृति और सेवा की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है
लेकिन इसे केवल प्रतीकात्मक आयोजन न मानकर, हमें इसकी न्यायिक, सामाजिक और संवैधानिक सीमाओं पर भी ध्यान देना चाहिए:
क्या यह कदम समाज के सभी हिस्सों को जोड़ पाएगा, या विभाजन को बढ़ाएगा?
क्या इसे प्रतीक बनकर छोड़ दिया जाएगा, या इसे ठोस नीति और सामाजिक सुधारों से जोड़ कर आगे बढ़ाया जाएगा?
कैसे नागरिक समाज, विपक्ष और न्यायपालिका इसके संतुलन की भूमिका निभाएंगे?
अगर आप चाहें, तो मैं इस लेख को एक विश्लेषणात्मक संस्करण प्रदान कर सकता हूँ जिसमें समर्थक और आलोचक दृष्टिकोणों को बराबरी से रखा जाए, या इसे एक समाचार लेख के रूप में तैयार कर सकता हूँ। आप किस रूप में चाहेंगे कि मैं आगे बढ़ूं?
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