क्या तेजस्वी यादव ‘ममता बनर्जी मॉडल’ से बीजेपी को हरा पाएंगे?
Bihar की राजनीति इस वक्त उबाल पर है। विधानसभा चुनाव करीब हैं और विपक्ष की कमान संभाले तेजस्वी यादव बीजेपी के मज़बूत गढ़ पर चोट करने की तैयारी में हैं। अब बड़ा सवाल यह है — क्या तेजस्वी ममता बनर्जी के “बंगाल मॉडल” से प्रेरणा लेकर बिहार में बाज़ी पलट सकते हैं?
यह सिर्फ़ वोटों का नहीं, बल्कि रणनीति के तालमेल का सवाल है — क्या बंगाल की चाल बिहार की ज़मीन पर चलेगी? आइए समझते हैं।
ममता बनर्जी का बंगाल मॉडल: जीत की कुंजी
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उभार को रोकने के लिए एक बेहद चतुर रणनीति अपनाई। उनकी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने “स्थानीय अस्मिता” और “राष्ट्रीय दबाव” के बीच संतुलन बनाकर जनता का दिल जीता।
आस्था बनाम सामाजिक न्याय का संतुलन
बीजेपी ने बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति पर ज़ोर दिया। जवाब में ममता ने “धर्म के साथ न्याय” का संतुलन साधा — मंदिरों में गईं, त्योहार मनाए, लेकिन साथ ही मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा की और CAA-NRC का कड़ा विरोध किया।
इस दोहरे रुख से उन्होंने बंगाल के 27% मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट किया। साथ ही, बांग्लादेशी शरणार्थी मतुआ समुदाय को नागरिकता का भरोसा दिलाया।
2021 के चुनावों में यही रणनीति बीजेपी के खिलाफ दीवार बन गई।
तेजस्वी Bihar में यही फॉर्मूला अपनाना चाहेंगे, लेकिन यहाँ जाति की जड़ें धर्म से भी गहरी हैं। क्या वो दोनों के बीच संतुलन बना पाएंगे?

जमीनी नेटवर्क और कार्यकर्ता निष्ठा
TMC की ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन है। हर गांव में कार्यकर्ता, हर गली में निगरानी। ममता की टीम जमीनी शिकायतें तुरंत सुलझाती है — पानी, सड़क, राशन जैसे मुद्दों पर।
Bihar में RJD का नेटवर्क यादव बेल्ट में तो मजबूत है, लेकिन ऊँची जातियों और शहरी इलाकों में कमजोर। तेजस्वी को युवाओं और नए स्वयंसेवकों को जोड़कर इस गैप को भरना होगा।
केंद्र बनाम राज्य: ममता का टकराव और तेजस्वी की चुनौती
ममता बनर्जी अक्सर दिल्ली से भिड़ती रही हैं। उन्होंने केंद्र पर “राज्य की अनदेखी” का आरोप लगाया — चाहे CAA हो, बाढ़ राहत या COVID फंड्स।
इस “बंगाल पहले” नारों ने जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ा।
तेजस्वी भी केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं — खासकर किसानों और बेरोज़गारी पर। लेकिन उनका फोकस ज़्यादातर रोज़गार और सामाजिक न्याय पर है।
अगर वे “राज्य की स्वायत्तता” वाला सुर थोड़ा और तेज़ करें, तो विपक्ष का तेवर और धारदार हो सकता है।
तेजस्वी यादव की रणनीति: न्याय, नौकरियाँ और नई उम्मीद
तेजस्वी खुद को “नए Bihar” का चेहरा दिखा रहे हैं — न जाति का पुराना चेहरा, न भ्रष्टाचार की छवि। उनका नारा है:
“न्याय भी, रोज़गार भी।”
जातीय समीकरण और ‘लव जिहाद’ पर पलटवार
RJD का पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक करीब 30% है। अब तेजस्वी इसे EBC, कुर्मी और कुशवाहा जैसे समूहों तक फैलाना चाहते हैं।
जहाँ बीजेपी “लव जिहाद” या “धार्मिक खतरे” की बात करती है, तेजस्वी वहाँ “समान अवसर” और “आरक्षण में न्याय” की बात रख रहे हैं।
2020 में इसी संतुलन ने उन्हें 110 सीटों तक पहुंचाया था।

रोजगार और विकास पर सीधा प्रहार
तेजस्वी का सबसे बड़ा वादा — 5 साल में 10 लाख सरकारी नौकरियाँ।
वे नीतीश कुमार की सरकार पर बेरोज़गारी के झूठे वादों का आरोप लगाते हैं।
बिहार की युवा आबादी (40% से ज़्यादा) को यह बात सीधी लगती है।
उनकी रैलियों में बेरोज़गार युवाओं की सच्ची कहानियाँ दिखती हैं — यह “आंकड़ों की नहीं, इंसानों की” राजनीति है।
अगर वे इसे ज़मीन पर उतार पाए, तो यह बीजेपी की “विकास” कहानी को टक्कर दे सकती है।
गठबंधन प्रबंधन: एकता की परीक्षा
बंगाल में ममता अकेले लड़ती हैं। Bihar में तेजस्वी को कांग्रेस और वाम दलों के साथ तालमेल रखना पड़ता है।
सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर तनाव बना रहता है।
तेजस्वी की सबसे बड़ी परीक्षा यही है — गठबंधन को टूटने से बचाना।
अगर वे समय रहते समझौते तय कर लें, तो 20–30 सीटों पर असर पड़ सकता है।
बंगाल बनाम बिहार: दो ज़मीनें, दो समीकरण
| पहलू | बंगाल | बिहार |
|---|---|---|
| मुख्य पहचान | भाषा और संस्कृति | जाति और वर्ग |
| मुस्लिम आबादी | 27% | 17% |
| ग्रामीण आबादी | 68% | 88% |
| महिला मतदाता | निर्णायक भूमिका (50%) | उभरती भूमिका |
| बीजेपी की स्थिति | बाहरी पार्टी | सत्ता में भागीदार |
बंगाल में बीजेपी को “बाहरी” कहा गया, पर Bihar में वो अब “सत्ता का हिस्सा” है। तेजस्वी को इस इनसाइडर कम्फर्ट ज़ोन को तोड़ना होगा।
बंगाल मॉडल की सीमाएँ
गठबंधन की जटिलता: Bihar में कई दल हैं, ममता जैसी एकछत्र ताकत नहीं।
जातिगत राजनीति: बंगाल की तुलना में बिहार में जाति वोटिंग पैटर्न को अधिक तय करती है।
मीडिया पर पकड़: बंगाल में TMC स्थानीय मीडिया को प्रभावित करती है, जबकि Bihar में डिजिटल मैदान बीजेपी के पास है।
व्यक्तित्व की तुलना: ममता की “दीदी” छवि भावनात्मक है, जबकि तेजस्वी को अभी “भरोसेमंद” चेहरा बनने में वक्त लगेगा।

क्या ममता का फॉर्मूला बिहार में काम करेगा?
तेजस्वी यादव अगर ममता बनर्जी के “बंगाल मॉडल” को अपनाते हैं — यानी न्याय, स्थानीय अस्मिता और जमीनी जुड़ाव — तो यह रणनीति आंशिक रूप से सफल हो सकती है।
लेकिन Bihar के अपने दर्द — बेरोज़गारी, पलायन और जातीय असमानता — को प्राथमिकता देना ज़रूरी है।
सिर्फ नकल नहीं, नवाचार ही जीत दिला सकता है।
अगर गठबंधन मजबूत रहा और युवा मतदाता साथ आए, तो तेजस्वी खेल पलट सकते हैं।
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