‘Phansi घर’ विवाद: दिल्ली विधानसभा ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को भेजा समन
दिल्ली की राजनीति के बीचोंबीच एक शब्द ने तूफान खड़ा कर दिया है — “Phansi घर”। दिल्ली विधानसभा ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को इस टिप्पणी को लेकर तलब किया है। यह विवाद एक साधारण बयान से शुरू होकर विशेषाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप तक पहुँच गया है। सवाल यह है — क्या यह मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी का है या विधानसभा की गरिमा का अपमान?
विवाद की शुरुआत: ‘फांसी घर’ टिप्पणी कैसे बनी मुद्दा
“Phansi घर” शब्द सबसे पहले मनीष सिसोदिया ने विधानसभा की एक गर्मागर्म बहस के दौरान कहा। वह शिक्षा बजट पर चर्चा कर रहे थे और विपक्षी व्यवधानों से खिन्न होकर बोले —
“यह सदन तो सच्चाई बोलने वालों के लिए फांसी घर बन गया है।”
उनकी यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गई। विपक्ष ने इसे विधानसभा की गरिमा पर सीधा हमला बताया। अगले ही दिन बीजेपी विधायकों ने विशेषाधिकार भंग का प्रस्ताव रखा, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। इसी के बाद केजरीवाल और सिसोदिया को समन जारी हुआ।
विधानसभा विशेषाधिकार और कानूनी पहलू
दिल्ली विधानसभा को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 की धारा 35 के तहत विशेषाधिकार मामलों की जांच का अधिकार है।
विशेषाधिकार समिति ऐसे मामलों में गवाह बुला सकती है, बयान ले सकती है और सिफारिशें दे सकती है।
अगर किसी सदस्य को दोषी पाया गया तो चेतावनी से लेकर निलंबन तक की कार्रवाई संभव है।

अगर केजरीवाल या सिसोदिया समिति के समन की अनदेखी करते हैं, तो अवमानना की कार्यवाही हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मामला अदालत तक जा सकता है — क्योंकि यह विधानसभा के अधिकार बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का टकराव है।
राजनीतिक अर्थ और ‘विशेषाधिकार भंग’ का आरोप
बीजेपी का कहना है कि “फांसी घर” टिप्पणी ने विधानसभा की गरिमा को ठेस पहुँचाई है और यह Rule 181 का उल्लंघन है, जिसमें अध्यक्ष की सत्ता को चुनौती देने वाली भाषा प्रतिबंधित है।
वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) का कहना है कि यह “राजनीतिक रूपक” था, कोई अपमान नहीं।
सिसोदिया के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने केवल यह बताने की कोशिश की कि विपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है।
लेकिन विपक्ष इसे “सदन का अपमान” बताकर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है।
ऐतिहासिक उदाहरण
ऐसे विवाद पहले भी अन्य विधानसभाओं में हुए हैं।
2014 में यूपी के एक विधायक को सदन को “चिड़ियाघर” कहने पर निलंबित किया गया था।
2019 में दिल्ली विधानसभा में “कैश फॉर वोट” मामले की जांच विशेषाधिकार समिति के पास गई थी।
इन मामलों से यही स्पष्ट है कि भाषा की मर्यादा टूटे तो सजा तय होती है।

विशेषाधिकार समिति की भूमिका
दिल्ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति में लगभग 15 सदस्य होते हैं, जिनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक शामिल रहते हैं।
समिति बंद कमरे में सुनवाई करती है, रिकॉर्ड देखती है, बयान लेती है और अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंपती है।
अगर आरोप साबित होते हैं तो चेतावनी, माफ़ी, या निलंबन तक का प्रस्ताव आ सकता है।
कानूनी चुनौती की संभावना
केजरीवाल और सिसोदिया दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं कि विधानसभा ने अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया है।
संविधान का अनुच्छेद 194 सदस्यों को विधायी कार्यों में प्रतिरक्षा देता है, लेकिन अगर टिप्पणी को “अवमानना” माना गया तो यह प्रतिरक्षा सीमित हो जाती है।
पिछले मामलों में अदालतों ने कहा है कि जब तक कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण न हो, विधानसभा का अधिकार बना रहता है।
केजरीवाल–सिसोदिया का जवाब और रणनीति
मुख्यमंत्री केजरीवाल ने ट्वीट किया —
“यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई है। सच्चाई बोलने पर हमें डराया नहीं जा सकता।”
आप पार्टी का आधिकारिक रुख है कि ‘फांसी घर’ एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी, किसी संस्था का अपमान नहीं।
पार्टी ने कहा कि वह माफ़ी नहीं मांगेगी और विधिक लड़ाई लड़ेगी।
यह रुख उनके समर्थकों में जोश भर रहा है, जबकि विपक्ष इसे “अहंकार” बता रहा है।

शासन पर प्रभाव
इस विवाद ने शासन के कामकाज पर असर डाला है।
शिक्षा और विकास से जुड़ी फाइलें अटकी हैं, मंत्रीगण कानूनी तैयारी में व्यस्त हैं।
आम आदमी पार्टी को डर है कि यह ध्यान भटकाने की रणनीति है।
फिर भी पार्टी इस विवाद को “सच्चाई के लिए संघर्ष” की छवि में बदलने की कोशिश कर रही है।
मीडिया और जन प्रतिक्रिया
मीडिया का रुख बंटा हुआ है —
कुछ अख़बार इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही की परीक्षा मानते हैं।
टीवी चैनलों पर बहसों में बीजेपी इसे अनुशासन का मामला बता रही है, जबकि आप समर्थक इसे राजनीतिक साजिश कह रहे हैं।
सोशल मीडिया पर #StandWithKejriwal और #PhansiGharRemark जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं।
ऑनलाइन सर्वे बताते हैं कि लगभग 70% लोगों ने इसे “राजनीतिक विवाद” माना, न कि “संवैधानिक संकट”।
जवाबदेही बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
‘Phansi घर’ विवाद यह दिखाता है कि विधानसभाओं में भाषा की मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की रेखा कितनी नाज़ुक है।
यह मामला न सिर्फ़ आप सरकार की साख बल्कि दिल्ली की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की सीमाएँ भी तय करेगा।
मुख्य सीख
विधानसभाओं को अपने अधिकारों का इस्तेमाल संतुलन से करना चाहिए।
नेताओं को भाषणों में प्रतीकात्मकता और अपमान के बीच फर्क समझना ज़रूरी है।
अदालतें ऐसे मामलों में लोकतंत्र की सुरक्षा की आख़िरी दीवार हैं।
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