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Delhi धमाके के बाद: भारत पाकिस्तान द्वारा किए गए आतंक हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ क्यों नहीं कह रहा?

पिछले हफ्ते Delhi के दिल में एक बड़ा धमाका हुआ, जिसने बाज़ारों से लेकर घरों तक को झकझोर दिया। इंडिया गेट के पास की भीड़-भाड़ वाली जगह से धुआँ उठता देखा गया, जहां मलबा मानो नरक की राख की तरह बिखर गया था। अधिकारी पाकिस्तान से जुड़े आतंकी संगठनों की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन भारत अब भी इसे “युद्ध की कार्रवाई” कहने से बच रहा है। यह चुप्पी क्यों? सबूत बढ़ते जा रहे हैं, फिर भी नई दिल्ली सतर्क है। यह पैटर्न पहले भी दिखा है—जैसे 2019 के पुलवामा हमले में, जिसमें 40 जवान मारे गए थे।
तो बड़ा सवाल यह है: भारत पाकिस्तान का नाम सीधे क्यों नहीं लेता?

कुछ को “युद्ध की कार्रवाई” कहना पूर्ण युद्ध भड़का सकता है। जबकि “राज्य-प्रायोजित आतंकवाद” का लेबल लगाना अपेक्षाकृत शांत कूटनीतिक कदमों—जैसे प्रतिबंध—की अनुमति देता है। भारत की यही पसंद वैश्विक धारणा और अपनी सुरक्षा दोनों को प्रभावित करती है। आइए धीरे-धीरे समझें कि भारत किस नाज़ुक स्थिति में है।

युद्ध की कार्रवाई की परिभाषा: अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सीमा कहाँ है?

जब Delhi जैसा धमाका होता है, भारत एक बेहद पतली रेखा पर चलता है। वैश्विक ढांचे यह निर्धारित करते हैं कि आतंक कब युद्ध की सीमा पार करता है। इसे समझने से स्पष्ट होता है कि नेता बड़े शब्द बोलते समय क्यों रुक जाते हैं।

प्रचलित अंतरराष्ट्रीय क़ानून और ‘सशस्त्र हमला’ की कसौटी

यूएन चार्टर का अनुच्छेद 51 किसी देश को “सशस्त्र हमले” के बाद आत्मरक्षा का अधिकार देता है। लेकिन सशस्त्र हमला आखिर होता क्या है?

एक अकेला बम इस कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता—खासकर तब, जब हमलावर किसी देश की सेना नहीं बल्कि गैर-राज्य समूह हों। इसे ऐसे समझें:

  • गली का गुंडा एक मुक्का मार दे—प्रति-प्रहार होगा,

  • लेकिन जब गुट बनकर हमला हो—तो वह युद्ध जैसा माना जा सकता है।

आतंकी धमाके अक्सर इस पैमाने पर कम ठहरते हैं। इनमें टैंकों का इस्तेमाल नहीं होता, लड़ाकू विमान नहीं उड़ते। अदालतें हमलों की निरंतरता भी देखती हैं। अगर हमले एक ही सीमा से बार-बार हों तो मामला मजबूत होता है, लेकिन सिर्फ एक Delhi धमाका? यह युद्ध का स्तर नहीं माना जाएगा।

फिर भी भारत की खुफिया रिपोर्टें पाकिस्तान-स्थित संगठनों से जुड़ाव की ओर इशारा करती हैं। यही धुंधली रेखा नेताओं को सोच-समझकर शब्द चुनने पर मजबूर करती है।

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आरोप सिद्ध करना: राज्य की ज़िम्मेदारी तय करने का सिद्धांत

अगर किसी देश को जिम्मेदार ठहराना है, तो यह साबित करना ज़रूरी है कि उसने हमले का आदेश दिया। यानी पाकिस्तान की आईएसआई जैसे एजेंसियों के सीधे निर्देश। इसके बिना यह कहा जा सकता है कि “उग्रवादी अपने स्तर पर काम कर रहे थे।”

2008 के मुंबई हमले को ही लें—हैंडलरों के पाकिस्तान में होने के सबूत तो मिले, लेकिन सीधे राज्य के आदेश का पक्का प्रमाण नहीं मिल पाया। अंतरराष्ट्रीय अदालतें ईमेल, कॉल रिकॉर्ड, प्रत्यक्ष गवाह—सब मांगती हैं, जिन्हें सीमा पार जुटाना बेहद मुश्किल है।

Delhi धमाके में भी संकेत हैं, लेकिन “स्मोकिंग गन” यानी निर्णायक सबूत नहीं मिले। इसीलिए मामला अनिश्चितता में अटक जाता है।

ऐतिहासिक मिसालें: भारत की प्रतिक्रिया का पैटर्न

भारत ने पहले भी जवाब दिया है, पर कभी युद्ध की घोषणा नहीं की।

  • 2016 उरी हमला: भारत ने सीमा पार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की।

  • 2019 पुलवामा हमला: बालाकोट एयर स्ट्राइक।
    दोनों बार भारत ने “युद्ध की कार्रवाई” का शब्द प्रयोग नहीं किया। क्यों? क्योंकि यह भविष्य में बातचीत और कूटनीति के रास्ते बंद कर देता।

भारत की रणनीति अक्सर—“करवाई करो, लेकिन शब्दों में संयम रखो”—रही है।

भू-राजनीतिक कीमत: नई दिल्ली युद्ध शब्द से क्यों बचती है?

पाकिस्तान को युद्ध का जिम्मेदार बताना उल्टा पड़ सकता है। भारत वैश्विक मंच पर बढ़ती भूमिका निभा रहा है और एक गलत कदम सहयोगियों और निवेश दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक जोखिम

अमेरिका समेत बड़े देश भारत-पाक बातचीत चाहते हैं। अगर भारत इसे युद्ध कह देता है, तो कुछ देशों को भारत ही आक्रामक दिख सकता है।
संयुक्त राष्ट्र या यूरोपीय संघ भी कड़े बयानों या प्रतिबंधों की ओर बढ़ सकते हैं।

साझा आतंकवाद-विरोधी सहयोग भी प्रभावित होगा, जिससे भारत को सुरक्षा में नुकसान हो सकता है।

No blame: Why India is being cautious with accusations after Delhi blast |  Conflict | Al Jazeera

आर्थिक असर और बाज़ार में हलचल

युद्ध की घोषणा से शेयर बाज़ार गिर सकता है, रुपया कमजोर हो सकता है, और विदेशी निवेशक पलायन कर सकते हैं।
जैसे—पुलवामा के बाद सिर्फ कुछ दिनों में बाज़ार 2% गिर गया था।
अगर मामला “युद्ध की कार्रवाई” तक पहुँच जाए, तो झटका कहीं बड़ा होगा।

घरेलू राजनीति और जनभावना

जनता और सोशल मीडिया अक्सर कड़ी कार्रवाई की मांग करते हैं।
लोग पूछते हैं—“नाम क्यों नहीं ले रहे?”
लेकिन सरकारें घरेलू कठोरता और अंतरराष्ट्रीय संयम—दोनों के बीच संतुलन साधती हैं।

गैर-राज्य अभिनेता का कवच: पाकिस्तान की रणनीतिक अस्पष्टता

पाकिस्तान अक्सर कहता है कि हमलों के पीछे “स्वतंत्र संगठन” हैं, राज्य नहीं। यह बयानबाजी उन्हें बचाव का रास्ता देती है।

आईएसआई का संबंध बनाम समूहों की स्वतंत्रता

लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों को सुरक्षित ठिकाने और सहायता मिलने के आरोप हैं। कई रिपोर्टों में आईएसआई फंडिंग का ज़िक्र आता है, लेकिन ऑपरेशन को “स्वतंत्र” बताकर पाकिस्तान जिम्मेदारी से बच निकलता है।

कश्मीर के नैरेटिव का इस्तेमाल

पाकिस्तान कई बार आतंकियों को “फ्रीडम फाइटर” बताता है। इससे कुछ देशों में भारत की दलीलों का प्रभाव कम होता है और जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है।

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वार्ता तंत्र की विफलता

हमलों के बाद स्थापित हॉटलाइन और संवाद तंत्र अक्सर ठंडे पड़ जाते हैं। मुंबई 2008 के बाद यही हुआ। SAARC जैसे बड़े मंच भी रुके हुए हैं।
इससे बार-बार हमले होने पर भी ठोस प्रगति नहीं हो पाती।

भारत की वैकल्पिक रणनीति: तेज़, सटीक, और अस्वीकरण योग्य प्रतिक्रिया

भारत खुली लड़ाई से बचते हुए “सर्जिकल”, “कूटनीतिक” और “वित्तीय” दबाव के रास्ते अपनाता है।

सर्जिकल स्ट्राइक और ‘कोल्ड स्टार्ट’ का संकेत

2016 जैसी कार्रवाई भारत की क्षमता दिखाती है, बिना युद्ध छेड़े।
कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत भारत की तत्परता का संकेत है—पर पूर्ण हमले की सीमा पार नहीं करता।

FATF और आतंकी फंडिंग पर वैश्विक दबाव

भारत ने FATF के माध्यम से पाकिस्तान पर कड़ी निगरानी बढ़वाई है। ग्रेलिस्टिंग से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ता है, जो आतंकी संगठनों की फंडिंग कम करता है।

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भविष्य की मजबूत नीति: भारत क्या कर सकता है?

  • वैश्विक साझेदारों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने में सुधार

  • पाकिस्तान पर कठोर कूटनीतिक और वीज़ा प्रतिबंध

  • सीमा पर तकनीकी निगरानी, ड्रोन और सेंसर

  • व्यापारिक लाभों को आतंक-विरोधी प्रगति से जोड़ना

  • संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर और आतंकवाद के लिंक पर सक्रिय कदम

संप्रभुता, सुरक्षा और वैश्विक छवि का संतुलन

Delhi धमाके के बाद स्थिति बेहद संवेदनशील है। पाकिस्तान से जुड़ाव के संकेतों के बावजूद भारत “युद्ध की कार्रवाई” कहने से बच रहा है—क्योंकि इसके कानूनी, कूटनीतिक और आर्थिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

यह संयम तात्कालिक सज़ा से ज़्यादा दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
लेकिन इससे सवाल भी उठता है—क्या यह संयम एक ढाल है या कमज़ोरी?

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