राहुल गांधी का बड़ा दावा: Govt नहीं चाहती कि हम पुतिन की भारत यात्रा के दौरान उनसे मिलें
ज़रा सोचिए: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की अहम राजकीय यात्रा पर उतरते हैं। दुनिया की निगाहें भारत-रूस मुलाकात पर टिकी हैं। ठीक उसी समय विपक्षी नेता राहुल गांधी एक तीखा आरोप छोड़ते हैं। उनका कहना है कि Govt नहीं चाहती कि विपक्षी नेता पुतिन से मिलें—जबकि वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में ऐसा खुले तौर पर संभव था।
यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन युद्ध जारी है और भारत अमेरिका व क्वाड देशों के साथ संतुलन साध रहा है। इस माहौल में गांधी के आरोप भारत-रूस संबंधों और मौजूदा नेतृत्व की कूटनीतिक शैली पर नए सवाल खड़े करते हैं।
राहुल गांधी का आरोप: असल मुद्दा क्या है?
आरोप की मुख्य बातों को समझना
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया और अपने भाषणों में कहा कि सरकार पुतिन से विपक्ष की मुलाकात नहीं चाहती। उनका दावा है कि यह यात्रा महत्वपूर्ण थी और विपक्षी नेताओं का मिलना भारत-रूस वार्ता को और संतुलित बनाता। परंतु मोदी सरकार “दरवाज़े बंद” कर रही है—जो उनके अनुसार पहले की सरकारों में नहीं होता था।
उनके सवाल की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है।
पुतिन की यात्रा के दौरान:
रक्षा और ऊर्जा से जुड़ी कई अहम डील्स होती हैं,
वैश्विक तनाव चरम पर है,
और भारत संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है।
गांधी इस समय को इसलिए चुनते हैं ताकि वे विदेशी नीति पर सरकार की प्राथमिकताओं और रवैये पर रोशनी डाल सकें।
ऐतिहासिक संदर्भ: वाजपेयी और मनमोहन के दौर में भारत-रूस संबंध
वाजपेयी युग: खुला माहौल, मजबूत रिश्ते
अटल बिहारी वाजपेयी के दौरान भारत-रूस रिश्तों में नई मजबूती आई।
पुतिन और वाजपेयी के बीच कई मीटिंग्स हुईं।
परमाणु ऊर्जा, हथियार और अन्य रणनीतिक समझौते हुए।

विपक्षी नेता भी इन आयोजनों में शामिल होते थे।
यह “सहभागिता वाला दौर” माना जाता है—जहाँ सभी पक्षों की उपस्थिति को ताकत माना जाता था।
मनमोहन सिंह का दौर: रणनीतिक स्वायत्तता और साझेदारी
डॉ. मनमोहन सिंह ने इस रिश्ते को और आगे बढ़ाया।
भारत-रूस शिखर सम्मेलनों में बड़े समझौते हुए।
तेल, स्पेस टेक्नोलॉजी और रक्षा सहयोग बढ़ा।
सरकार और विपक्ष—दोनों की भागीदारी को महत्व मिला।
राहुल गांधी इन्हीं मॉडलों का हवाला देते हैं और कहते हैं कि वो “उत्कृष्ट उदाहरण” थे। उनकी नज़र में—
पहले सब एक मेज़ पर बैठते थे, आज कुछ लोगों को दरवाज़े पर ही छोड़ दिया जाता है।
दावे की पड़ताल: सबूत और विरोधी पक्ष की दलीलें
आधिकारिक बयान और कूटनीतिक प्रोटोकॉल
विदेश मंत्रालय ने पुतिन की आधिकारिक यात्रा का कार्यक्रम जारी किया।
उसमें PM मोदी और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात शामिल है—
लेकिन विपक्षी नेताओं से मुलाकात का कोई उल्लेख नहीं है।
क्या यह सामान्य प्रक्रिया है?
कई बार राज्य यात्राओं में मेजबान देश अपने स्तर पर तय करते हैं कि कौन मिलेगा। सुरक्षा, समयसीमा और संवेदनशीलता की वजह से सूचियाँ सीमित रहती हैं।
सरकार का तर्क:
यह “रूटीन प्लानिंग” है।
कोई रोका-टोंकी नहीं हुई।
राहुल गांधी की ओर से दावा:
यह “सिर्फ सुरक्षा का बहाना” है।
असल मुद्दा राजनीतिक है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
थिंक टैंक और विश्लेषक बताते हैं:
2024 में भारत-रूस व्यापार 65 बिलियन डॉलर पहुंचा (20% की बढ़ोतरी)।
रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।
अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते सरकार अतिरिक्त सावधानी बरतती है।
विशेषज्ञों का मत:

“रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार है, लेकिन छवि (optics) आज ज्यादा मायने रखती है।”
गांधी इसी “ऑप्टिक्स” पर निशाना साधते हैं कि कहीं सावधानी “दूरी” का रूप तो नहीं ले रही।
राजनीतिक असर: अतीत की सफलता को हथियार बनाना
राहुल गांधी एक राजनीतिक रणनीति साध रहे हैं:
BJP के आइकॉन वाजपेयी की तारीफ़ कर BJP समर्थकों को असहज करना।
मनमोहन सिंह को याद कर अपनी पार्टी की विदेश नीति की क्षमता दिखाना।
पुतिन की यात्रा के दौरान बयान देकर मीडिया का ध्यान खींचना।
यह Govt पर दबाव बनाता है कि क्या वे कूटनीति में विपक्ष की भूमिका घटा रही हैं।
विदेश नीति पर विपक्षी दावों की विश्वसनीयता
Govt कहती है:
“यह सिर्फ चुनावी शोर है।”
“मोदी-पुतिन ने 2014 के बाद 20 से अधिक बार मुलाकात की है—रिश्ता मजबूत है।”
विश्लेषक कहते हैं:
राहुल गांधी का दावा चर्चा पैदा करता है लेकिन ठोस प्रमाण कम हैं।
फिर भी ऐसे आरोप लोगों के दिमाग में सवाल छोड़ देते हैं।

पुतिन यात्रा के बाद भी बने रह गए सवाल
भारत-रूस संबंध अब भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
रक्षा, ऊर्जा, और व्यापार पर नए समझौते हुए—यात्रा सफल मानी जा रही है।
लेकिन राहुल गांधी का आरोप घरेलू राजनीतिक बहस को हवा दे गया।
मुख्य बिंदु:
वे कहते हैं कि Govt विपक्ष को पुतिन से मिलने नहीं दे रही।
वाजपेयी-मनमोहन दौर की खुलेपन की तुलना करते हैं।
सवाल उठाते हैं कि क्या आज की नीति अधिक “संकोची” हो गई है।
इसका राजनीतिक असर विपक्ष की आवाज़ को मजबूत करता है।
यात्रा सफल रही या नहीं—यह एक स्तर है।
लेकिन “कौन भारत-रूस रिश्तों की दिशा तय करता है?”
यह सवाल अब और गहरा हो चुका है।
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