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Amit शाह ने राज्यसभा में कहा: ‘वंदे मातरम् भारत के पुनर्जन्म का मंत्र’ – एक ऐतिहासिक संबोधन

भारत की संसद के गलियारों में Amit शाह की आवाज़ गूँज उठी—मानो अतीत का कोई रणघोष फिर दोहराया गया हो।
एक विशेष राज्यसभा सत्र में उन्होंने वंदे मातरम् को “भारत के पुनर्जन्म का मंत्र” बताया।
यह सिर्फ़ भावनात्मक भाषण नहीं था; बल्कि 150 साल पुराने गीत के संदेश को देश के नए अध्याय से जोड़ने की कोशिश थी।

यह कार्यक्रम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा वंदे मातरम् रचे जाने के 150 वर्ष पूरे होने पर आयोजित किया गया था।
इसने फिर से देश में राष्ट्रवाद, एकता और पहचान पर बहस छेड़ दी।
सत्ता और विपक्ष—दोनों ही—गंभीरता से शाह के कथनों को सुनते रहे, जहाँ उन्होंने इस गीत को आज के ‘सशक्त भारत’ के प्रयासों से जोड़ा।

यह लेख वंदे मातरम् की ऐतिहासिक जड़ों, शाह के संबोधन के महत्व और आज के संदर्भ में इसके मायने पर गहराई से नज़र डालता है।

वंदे मातरम् की 150 वर्ष की यात्रा: साहित्य से राष्ट्रीय प्रतीक तक

वंदे मातरम् एक साहित्यिक रचना के रूप में शुरू हुआ, लेकिन समय के साथ यह आज़ादी के आन्दोलन की धड़कन बन गया।
150 सालों में इसने विरोध, संघर्ष और गर्व—तीनों का आधार प्रदान किया।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे ब्रिटिश शासन के कठिन समय में लिखा।
गीत में भारत को माँ दुर्गा के रूप में दर्शाया गया, जो अपने बच्चों को रक्षा के लिए पुकारती है—इसने उस दौर के युवाओं और क्रांतिकारियों को गहरे तक प्रभावित किया।

आनंदमठ: जहाँ जन्मा यह अमर गीत

बंकिमचंद्र ने वंदे मातरम् को अपनी 1882 की प्रसिद्ध कृति आनंदमठ में शामिल किया।
यह उपन्यास संन्यासियों के उत्पीड़न के खिलाफ उठ खड़े होने की कहानी था।

गीत की पंक्तियाँ—“वंदे मातरम्”—पाठकों के लिए केवल साहित्यिक सौंदर्य नहीं थीं, बल्कि कार्यवाही का आह्वान थीं।
इसी वजह से यह रचना चुपचाप चलने वाली बैठकों, गुप्त संगठनों और प्रारंभिक प्रतिरोध आंदोलनों का प्रमुख स्वर बनी।

प्रकृति—नदियाँ, खेत, धरती—इन प्रतीकों के माध्यम से बंकिम ने भारत की सौंदर्यता और पीड़ा को एक साथ उकेरा।

Drawing inspiration from 'Vande Mataram', time to build great India by  2047: Amit Shah - DD India

स्वतंत्रता संग्राम में अंगीकरण और राजनीतिक ऊर्जा

1900 के दशक की शुरुआत तक वंदे मातरम् देशभर में फैल चुका था।
1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाया—यही क्षण इसे राष्ट्रीय संघर्ष का प्रतीक बना गया।

बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने इसे जनसभा का नारा बनाया।
1905 के स्वदेशी आंदोलन में भीड़ “वंदे मातरम्” के नारे लगाती थी, पुलिस की लाठी-चार्ज का सामना करते हुए भी।

कुछ मतभेदों के बावजूद यह गीत हिंदू–मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच एकजुटता का पुल बना।

भारतीय संविधान और वंदे मातरम्: स्वतंत्रता के बाद की स्थिति

1947 के बाद गीत की स्थिति पर तीखी चर्चाएँ हुईं।
राष्ट्रगान के रूप में जन गण मन को आधिकारिक दर्जा मिला, लेकिन वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान दिया गया।
संविधान इसे अनिवार्य नहीं बनाता।

कुछ नेताओं ने संकेत दिया कि इसकी धार्मिक छवियाँ सभी समुदायों से मेल न खाएँ।
लेकिन अदालतों ने स्पष्ट किया—इसे गाना पूरी तरह स्वैच्छिक है और स्कूल/कार्यक्रम इसे शामिल कर सकते हैं।

यह संतुलन भारत की विविधता और समावेश को दर्शाता है।

Amit शाह का संबोधन: ‘पुनर्जन्म के मंत्र’ का विश्लेषण

Amit शाह ने 10 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में यह ऐतिहासिक संबोधन दिया।
उनका उद्देश्य था—वंदे मातरम् की पुरानी ऊर्जा को आज के भारत के संकल्पों से जोड़ना।

उन्होंने कहा कि यह गीत आज के भारत के लिए मार्गदर्शक है—चाहे वैश्विक प्रतिस्पर्धा हो, आत्मनिर्भरता हो या सुरक्षा नीति।

आधुनिक राष्ट्रवाद की नई व्याख्या

Amit शाह ने कहा कि वंदे मातरम् “पुराने समय का गीत” भर नहीं है—बल्कि एक जीवित प्रेरणा है।
“भारत के पुनर्जन्म” का विचार 2014 के बाद चल रहे व्यापक विकास, सुधारों और आत्मविश्वास से जुड़ा संकेत था।

यह कथन इस बात का प्रतीक है कि जैसे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा था, वैसे आज के भारत के लिए भी नई ऊर्जा है।

‘भारत के पुनर्जन्म’ का महत्व

Amit शाह के अनुसार—पुनर्जन्म का मतलब है:

  • उपनिवेशवादी घावों को भरना

  • आत्मनिर्भर भारत का निर्माण

  • त्याग करने वालों की स्मृतियों का सम्मान

  • तकनीक, गांव, सुरक्षा और विकास में बड़ा बदलाव

उनका संदेश भावनात्मक भी था और प्रेरणादायक भी—कि आज का भारत अतीत की ताकत से ही आगे बढ़ता है।

Drawing inspiration from 'Vande Mataram', time to build great India by  2047: Amit Shah

ऐतिहासिक बलिदान और वर्तमान शासन का सेतु

Amit शाह ने स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को वर्तमान नीतियों—जैसे सुरक्षा सुधारों और कुछ कानूनों—से जोड़ा।
उनके अनुसार यह “कर्तव्य की निरंतरता” है।

हालाँकि, इससे यह चर्चा भी उठी कि “पुनर्जन्म” की नई परिभाषा किसके लिए और किस दृष्टिकोण से है।

सांस्कृतिक और राजनीतिक असर

Amit शाह के भाषण पर प्रतिक्रियाएँ बँट गईं।
सत्तापक्ष ने इसे गर्व का क्षण बताया, जबकि विपक्ष ने इससे संभावित विभाजन की चिंता जताई।
सोशल मीडिया पर #VandeMataram150 ट्रेंड करता रहा।

स्कूलों, संस्थानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत को दोहराया गया।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

  • भाजपा ने इसे संस्कृति और राष्ट्रवाद की विजय बताई।

  • कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने तर्क दिया कि विविधता के बीच संतुलन ज़रूरी है।

  • बंगाल जैसे राज्यों में नेताओं ने “अनिवार्यता” को लेकर चेतावनी दी।

एकता बनाम बहिष्करण—दो दृष्टिकोण

गीत में माँ दुर्गा का प्रतीक होने के कारण कुछ समुदायों को चिंता रहती है।
इसलिए बहस उठती है—क्या यह सबको जोड़ता है या आस्था-आधारित मतभेद बढ़ाता है?

भारत के न्यायालयों ने हमेशा कहा है—यह ऐच्छिक है, किसी पर थोपना नहीं चाहिए।

जनता की प्रतिक्रिया और डिजिटल चर्चा

सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट्स आए।
टीवी चैनलों ने विशेष कार्यक्रम चलाए।
युवा वर्ग में किए गए सर्वे में लगभग 70% ने गर्व जताया, जबकि लगभग 20% ने चिंताएँ रखीं।

देशभर में नए कार्यक्रम और गतिविधियाँ

  • यूपी, महाराष्ट्र आदि में स्कूलों में गीत पर विशेष कक्षाएँ शुरू की गईं।

  • केरल में मिश्रित समुदायों के गायकों ने संयुक्त गान किया।

  • सांस्कृतिक पर्वों, नाटकों और मंच कार्यक्रमों में गीत की पंक्तियाँ गूँजने लगीं।

150 years on, 'Vande Mataram' continues to ignite eternal flame of  nationalism: Amit Shah - The Hindu

आधुनिक भारत में गीत की भूमिका: क्या करें, कैसे समझें

वंदे मातरम् को लेकर कानूनी, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।

कानूनी स्थिति: क्या अनिवार्य है और क्या नहीं

  • 1986 (बिजॉय इम्मैनुअल केस): धार्मिक कारणों से गीत/गान से छूट मिल सकती है।

  • 2017 सुप्रीम कोर्ट: वंदे मातरम् अनिवार्य नहीं।

  • किसी पर दबाव डालना कानूनन उचित नहीं, लेकिन कार्यक्रम में सम्मान करना आवश्यक है।

स्कूलों, संस्थानों के लिए मार्गदर्शिका

  • गीत का इतिहास पढ़ाएँ

  • बच्चों/कर्मचारियों को स्वतंत्र विकल्प दें

  • कार्यक्रम को समावेशी बनाएं

  • विविध समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करें

समावेशी राष्ट्रवाद का मार्ग

राष्ट्रीय प्रतीकों पर खुली और सम्मानजनक चर्चा ज़रूरी है।
गीत को कला, संगीत, व्याख्यान, कार्यशालाओं के माध्यम से विभिन्न समुदायों के लिए एक संयुक्त अनुभव बनाया जा सकता है।

150 years on, 'Vande Mataram' continues to ignite eternal flame of  nationalism: Amit Shah - The Hindu

सांस्कृतिक संरक्षण: प्रमुख सीखें

वंदे मातरम् देश के संघर्षों और भावनाओं का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
इसे संरक्षित करने के लिए—कहानियाँ, इतिहास, संगीत और भावनाएँ साझा करना आवश्यक है।
युवाओं तक इसकी यात्रा और अर्थ पहुँचाना महत्वपूर्ण है।

वंदे मातरम् की अनवरत गूँज

वंदे मातरम् की यात्रा—साहित्य, आंदोलन, संविधान और अब संसद तक—इसकी शक्ति को साबित करती है।
अमित शाह का “भारत के पुनर्जन्म का मंत्र” वाला वक्तव्य इसके 150वें वर्ष में एक नई ऊर्जा जोड़ता है।

हमने इसकी उत्पत्ति, स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका, संविधानिक स्थिति, शाह के भाषण और सामाजिक प्रतिक्रियाओं पर नज़र डाली।
गीत आज भी सवाल उठाता है—एकता, पहचान और राष्ट्र के भविष्य को हम कैसे देखते हैं?

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