क्यों PM बिना CJI के चुनाव आयोग प्रमुख चुनना चाहते हैं? राहुल गांधी के सरकार से 3 बड़े सवाल
ज़रा सोचिए—एक खेल में एक टीम ही रेफ़री चुन ले। यही भारत की ताज़ा राजनीतिक बहस का केंद्र है।
PM का यह प्रस्ताव कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भूमिका न हो, 2025 के अंत में बड़ा विवाद बन गया है।
सवाल उठ रहा है—आख़िर चुनावों की निष्पक्षता की रक्षा कौन करेगा?
इसी मुद्दे पर राहुल गांधी ने सरकार से तीन तीखे सवाल पूछे हैं। ये सवाल सीधे सत्ता, निष्पक्ष व्यवस्था और लोकतांत्रिक भरोसे से जुड़ते हैं।
यह लेख उन्हीं तीन सवालों का विश्लेषण करता है—संविधान, इतिहास और संभावित परिणामों के संदर्भ में।
राहुल गांधी के तीन मुख्य सवालों का विश्लेषण
राहुल गांधी के सवाल सरकार की मंशा पर सीधा वार करते हैं। हर सवाल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़ता है।
1. अचानक CJI को हटाने की इतनी जल्दी क्यों?
क्यों इतने वर्षों बाद CJI को बाहर करने की हड़बड़ी हो रही है?
दशकों से ECI का ढांचा न्यायिक निगरानी में ठीक चलता रहा है।
पर 2025 में एक नए बिल की चर्चाएँ सामने आईं, जिसमें PM और कैबिनेट की सहमति से नियुक्ति का प्रावधान बताया गया।
सरकार का तर्क—निर्णय जल्दी हों, ताकि नियुक्तियों में देरी न हो।
लेकिन विपक्ष का कहना है—2026 के राज्य चुनावों से पहले यह बदलाव संदिग्ध समय पर लाया गया है।
राहुल गांधी का सवाल है—
क्या यह “तत्काल जरूरत” है या फिर “चुनावी लाभ के लिए पैनल बदलने की कोशिश”?
पिछले वर्षों में चुनाव तिथियों को लेकर ECI प्रमुखों पर दबाव पड़ता रहा है।
यदि CJI का संतुलन हट गया, तो भरोसा तेज़ी से गिर सकता है।
2. संविधान PM को अकेले चयन का अधिकार कहाँ देता है?
राहुल गांधी कहते हैं—
क्या संविधान में कहीं लिखा है कि PM अकेले चुनाव आयोग प्रमुख चुन सकते हैं?
अनुच्छेद 324 ECI की व्यवस्था बताता है
लेकिन नियुक्ति का तरीका कानून पर छोड़ता है
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal फैसले में कहा:
जब तक संसद कानून नहीं बनाएगी, पैनल में PM + नेता विपक्ष + CJI रहेंगे।
अब प्रस्तावित नई व्यवस्था में CJI को हटाकर PM की भूमिका को और मजबूत कर दिया गया है।
विशेषज्ञों का तर्क—
यह शक्ति संतुलन को तोड़ता है और कार्यपालिका को अत्यधिक प्रभाव दे सकता है।
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3. CJI को हटाने के बाद ECI की स्वतंत्रता बचाने वाले कौन-से सुरक्षा कवच रह जाएंगे?
राहुल गांधी का तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है—
अगर CJI नहीं होंगे, तो ECI को सरकार के प्रभाव से बचाने की गारंटी क्या है?
ECI को:
आचार संहिता लागू करनी होती है
विवादों का निपटारा करना होता है
राजनीतिक पार्टियों पर कार्रवाई करनी होती है
यदि प्रमुख का चयन सरकार-प्रधान पैनल करेगा, तो क्या ECI सरकार के ख़िलाफ़ मजबूत निर्णय ले पाएगा?
2024 के एक सर्वे में 60% भारतीयों ने कहा कि ECI की निष्पक्षता कम हुई है।
ऐसे में न्यायिक भागीदारी का हटना भरोसे को और कमजोर कर सकता है।
चुनाव आयोग नियुक्तियों का कानूनी और संवैधानिक इतिहास
भारत में ECI की ताकत कई ऐतिहासिक चरणों से गुज़रकर बनी है।
सुकुमार सेन और टी.एन. शेषन की मिसाल
सुकुमार सेन (1950)
पहले मुख्य चुनाव आयुक्त
विभाजन के बाद कठिन परिस्थितियों में निष्पक्ष चुनाव कराए
तब कार्यपालिका का दबाव सीमित था
टी.एन. शेषन (1990s)
ECI को सबसे मजबूत रूप दिया
आचार संहिता लागू करने में कोई समझौता नहीं
कई बार सरकारों से टकराव
संसद पर दबाव पड़ा कि आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता बढ़ाई जाए
इतिहास बताता है—
मजबूत CEC तभी उभरते हैं, जब संस्थान को राजनीतिक दबाव से सुरक्षा मिले।
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2023 का सुप्रीम कोर्ट आदेश क्यों महत्वपूर्ण था?
2023 के Anoop Baranwal मामले में कोर्ट ने माना कि:
कार्यपालिका का एकतरफा दबदबा लोकतांत्रिक सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है
इसलिए CJI की उपस्थिति अनिवार्य होगी जब तक संसद कानून न बदल दे
2025 का प्रस्ताव इसी संतुलन को उलटने के रूप में देखा जा रहा है।
नई चयन पद्धति क्या बदल देगी?
2025 के प्रस्तावित ऑर्डिनेंस में पैनल में होंगे—
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
एक केंद्रीय मंत्री
नेता विपक्ष
लेकिन CJI को हटाया गया है।
इससे चयन प्रक्रिया पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ जाता है।
विपक्ष का तर्क—
यह सुप्रीम कोर्ट के संतुलन-आधारित मॉडल को कमजोर करता है।
संस्थागत स्वतंत्रता बनाम कार्यपालिका का विशेषाधिकार
यह मुद्दा सिर्फ ECI का नहीं—बल्कि देश की संस्थागत संरचना का है।
संतुलन और निगरानी कमजोर होने का खतरा
CJI की गैर-मौजूदगी का मतलब—
न्यायपालिका की भूमिका खत्म और कार्यपालिका का दबदबा बढ़ना।
उदाहरण:
लोकपाल नियुक्तियों में ऐसी बहस पहले भी हुई
CVC नियुक्तियों पर पक्षपात के आरोप लगते रहे
ECI जैसे संस्थान में ऐसा बदलाव जोखिम और बढ़ा देता है, क्योंकि चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं।
दुनिया में कैसे चुने जाते हैं चुनाव आयुक्त?
कई देशों में नियुक्तियों में विविधता होती है—
कनाडा: गैर-राजनीतिक सलाहकार परिषद
दक्षिण कोरिया: संसद + न्यायपालिका की संयुक्त भूमिका
आयरलैंड: सर्वदलीय बातचीत
भारत का 2023 मॉडल भी इसी वैश्विक मानक के करीब था।
2025 का प्रस्ताव उससे पीछे जाता दिख रहा है।
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भविष्य में चुनावों की निष्पक्षता पर प्रभाव
1. नियामक क्षमता कम हो सकती है
आचार संहिता पर ढील
सत्तारूढ़ दल पर शिकायतों की धीमी सुनवाई
भाषणों और खर्चों पर कार्रवाई घट सकती है
स्वतंत्र ECI चुनाव उल्लंघनों को 30% तक कम करता है—अध्ययन बताते हैं।
2. जनता का भरोसा और वोटर कॉन्फिडेंस गिर सकता है
अगर नियुक्तियों पर संदेह बढ़ा—
मतदाता मतदान कम हो सकता है
युवा वोटर विशेष रूप से उदासीन हो सकते हैं
2025 के एक सर्वे में सिर्फ 45% लोगों ने कहा कि उन्हें ECI पर पूरा भरोसा है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ कहते हैं—
“लोकतंत्र का गोंद है भरोसा।”
लोकतंत्र के प्रहरी को बचाना क्यों ज़रूरी है
राहुल गांधी के तीन सवाल—
अचानक की गई जल्दबाज़ी
संवैधानिक आधार
सुरक्षा कवच की कमी
इन तीनों पर महत्वपूर्ण बहस छेड़ते हैं।
Delhi की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि दिल्ली मेट्रो स्टेशनों के नाम यात्रा को आसान बनाने और जनता के सुझावों को ध्यान में रखकर बदले गए हैं।
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