PM मोदी तेलंगाना बीजेपी नेताओं से क्यों नाराज़ हैं: राज्य इकाई में बढ़ती दरारें
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों तेलंगाना बीजेपी को लेकर असहजता की चर्चा है। पिछले महीने हैदराबाद में हुई एक अहम पार्टी बैठक में PMनरेंद्र मोदी की गैर-मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए। इसे राज्य इकाई के नेतृत्व के प्रति शीर्ष स्तर की नाराज़गी के संकेत के तौर पर देखा गया।
तेलंगाना बीजेपी के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम राज्य है। यहां लोकसभा की 17 सीटें हैं और दक्षिण भारत में पार्टी के विस्तार की बड़ी उम्मीदें इससे जुड़ी हैं। लेकिन अंदरूनी कलह, कमजोर संगठन और रणनीतिक चूक इन संभावनाओं पर पानी फेर रही हैं—खासतौर पर विधानसभा चुनावों से पहले।
यह लेख उन मुख्य वजहों को समझने की कोशिश करता है जिनके कारण PM मोदी तेलंगाना बीजेपी नेतृत्व से असंतुष्ट दिखते हैं।
1. संगठनात्मक कमजोरियां और मौके गंवाना
राज्य इकाई का कमजोर प्रबंधन और तालमेल की कमी
दिल्ली से जारी निर्देश अक्सर ज़मीनी स्तर तक ठीक से नहीं पहुंच पाते। युवा मोर्चा और संगठन विस्तार जैसे अभियानों में ढिलाई दिखी। पार्टी के अंदर गुट अलग-अलग दिशाओं में काम करते हैं—कोई शहरी इलाकों पर फोकस करता है तो कोई ग्रामीण क्षेत्रों को नज़रअंदाज़ कर देता है।
पीएम मोदी अनुशासन और सटीक क्रियान्वयन पर जोर देते हैं। ऐसे में यह लापरवाही उन्हें खलती है।
सदस्यता अभियान और बूथ स्तर पर कमजोरी
तेलंगाना में बीजेपी के सदस्यता लक्ष्य पूरे नहीं हो पाए। कई जिलों में बूथ स्तर पर कार्यकर्ता ही नहीं हैं। इससे घर-घर संपर्क और वोटर मैनेजमेंट कमजोर पड़ता है।
जहां उत्तर प्रदेश या कर्नाटक जैसे राज्यों में मजबूत बूथ नेटवर्क है, वहीं तेलंगाना पीछे रह गया—जो शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है।

सत्तारूढ़ दल को चुनौती देने में नाकामी
राज्य सरकार के खिलाफ बीजेपी का प्रदर्शन फीका रहा है। विधानसभा में कई अहम मुद्दों पर पार्टी आक्रामक भूमिका नहीं निभा सकी।
भ्रष्टाचार या जनहित के सवालों पर देर से और कमजोर प्रतिक्रिया दी गई, जिससे बीआरएस (BRS) को बढ़त मिलती रही।
2. उम्मीदवार चयन और वफादारी पर सवाल
दलबदलुओं को तरजीह से नाराज़गी
कांग्रेस और बीआरएस से आए नेताओं को टिकट दिए जाने से पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष फैला। लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे लोगों को नजरअंदाज किया गया।
इससे गुटबाज़ी बढ़ी और कई जगह कार्यकर्ताओं ने चुनावी गतिविधियों से दूरी बना ली।
स्थानीय नेतृत्व का अति-आत्मविश्वास और संवाद की कमी
कुछ राज्य नेताओं का रवैया ऐसा रहा मानो वे केंद्रीय नेतृत्व की सलाह से ऊपर हों। दिल्ली से आने वाले संदेशों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
पीएम मोदी को साफ और ईमानदार रिपोर्टिंग पसंद है, लेकिन तेलंगाना से आने वाली जानकारी अक्सर अधूरी या सजावटी रही।
अनुशासनहीनता और क्रॉस-वोटिंग
स्थानीय निकाय और परिषद चुनावों में पार्टी लाइन के खिलाफ वोटिंग हुई। बावजूद इसके, दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
यह संदेश गया कि राज्य नेतृत्व का अपने विधायकों और पार्षदों पर नियंत्रण कमजोर है—जो पीएम मोदी को बिल्कुल स्वीकार्य नहीं।
3. चुनावी प्रदर्शन और रणनीतिक चूक
नगर निकाय और उपचुनावों में निराशाजनक नतीजे
जहां पार्टी को बढ़त मिलनी चाहिए थी, वहां भी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ। नगर निगम चुनावों और उपचुनावों में बीजेपी लक्ष्य से काफी पीछे रही।
राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की मजबूत स्थिति के बावजूद तेलंगाना में प्रगति सीमित रही।
केसीआर फैक्टर को गलत समझना
केसीआर पर व्यक्तिगत हमले उलटे पड़ते दिखे। ग्रामीण इलाकों में उनकी पकड़ अब भी मजबूत है।
जहां केंद्र चाहता था कि बीजेपी रोजगार, किसान और विकास के मुद्दों पर फोकस करे, वहीं राज्य इकाई पुरानी राजनीतिक दुश्मनी में उलझी रही।
हाई-प्रोफाइल दौरों और ज़मीनी हकीकत का अंतर
PM मोदी की रैलियों में भारी भीड़ जुटती है, लेकिन उसका सीधा फायदा चुनावी नतीजों में नहीं दिखता।
स्थानीय नेतृत्व इन दौरों के बाद ज़मीनी स्तर पर माहौल बनाने में असफल रहा।
4. शीर्ष नेतृत्व के साथ भरोसे की कमी
रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल
तेलंगाना से दिल्ली भेजी जाने वाली रिपोर्टों में जीत को बढ़ा-चढ़ाकर और हार को कम करके दिखाया गया।
इससे गलत रणनीतिक फैसले हुए और भरोसा कमजोर पड़ा।
गुटबाज़ी से केंद्रीय नेतृत्व की छवि कमजोर
अलग-अलग गुट केंद्रीय नेताओं का समय और ऊर्जा खा रहे हैं। बार-बार मध्यस्थ भेजने पड़ते हैं, जो राज्य इकाई की कमजोरी को उजागर करता है।

दिल्ली के निर्देशों में देरी या बदलाव
PM या पार्टी अध्यक्ष कार्यालय से आए निर्देशों को स्थानीय स्तर पर बदल दिया गया या देर से लागू किया गया।
इसे शीर्ष नेतृत्व ने अनुशासनहीनता और अप्रत्यक्ष विरोध के तौर पर देखा।
तेलंगाना बीजेपी को रीसेट करने की ज़रूरत
मुख्य बातें संक्षेप में
संगठन और बूथ स्तर पर कमजोरी
उम्मीदवार चयन से असंतोष और गुटबाज़ी
चुनावी नतीजों में निराशा
केसीआर और स्थानीय राजनीति की गलत समझ
दिल्ली के साथ भरोसे और संवाद की कमी

आगे का रास्ता
राज्य नेतृत्व को एकजुट होकर काम करना होगा
बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करना होगा
केंद्रीय नेतृत्व को सही और समय पर जानकारी देनी होगी
उम्मीदवार चयन में निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देनी होगी
अनुशासनहीनता पर सख्त कार्रवाई जरूरी होगी
अंतिम दृष्टिकोण
PM मोदी की नाराज़गी एक बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है—या तो नेतृत्व में फेरबदल होगा, या रणनीति में गहरा सुधार।
तेलंगाना बीजेपी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य इकाई कितनी जल्दी केंद्र की सोच के साथ खुद को संरेखित करती है।
आने वाले महीनों में बड़े फैसले संभव हैं। मजबूत सुधार पार्टी को आगे बढ़ा सकते हैं, जबकि ढिलाई और गिरावट ला सकती है।
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