संसद शीतकालीन सत्र का 11वां दिन: पीएम-विरोधी नारों पर हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा स्थगित
भारत की संसद में आज भारी हंगामे के कारण शीतकालीन सत्र के 11वें दिन की कार्यवाही ठप हो गई। हालिया Congress रैली में लगे पीएम-विरोधी नारों को लेकर दोनों सदनों में तीखी नोकझोंक हुई। सांसदों ने नारेबाज़ी की, काग़ज़ लहराए और पीछे हटने से इनकार किया, जिसके चलते कार्यवाही समय से पहले स्थगित करनी पड़ी और अहम विधेयक अधर में लटक गए। माहौल में तनाव साफ़ झलक रहा है—क्या यह गतिरोध आगे भी जारी रहेगा?
दिन 11 का टकराव: स्थगन तक पहुंची घटनाओं की कड़ी
चिंगारी: Congress रैली के नारे संसद में गूंजे
पिछले हफ्ते हुई Congress रैली के नारों से विवाद शुरू हुआ। विपक्षी नेताओं ने “मोदी है तो मुमकिन है” जैसे नारों को सरकार की नीतियों—खासकर रोज़गार और महंगाई—पर कटाक्ष के रूप में उठाया। संसद में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने शून्यकाल के दौरान नियम 267 के तहत सामान्य कार्यवाही स्थगित कर इस पर बहस की मांग की।
ख़ज़ाना पक्ष ने तुरंत पलटवार किया। भाजपा नेताओं ने इसे प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया। स्पीकर ओम बिरला ने संयम बरतने की चेतावनी दी, लेकिन शोर बढ़ता गया।
लोकसभा में हंगामा
लोकसभा में हालात तेज़ी से बिगड़े। स्पीकर ने कई बार हथौड़ा बजाकर सदस्यों से बैठने को कहा। विपक्ष के सांसद नारे लिखी तख्तियां लेकर वेल में आ गए।
सुबह 11:30 बजे कार्यवाही 30 मिनट के लिए स्थगित हुई। दोबारा शुरू होने पर भी शोर थमा नहीं और सदन को दोपहर 2 बजे तक स्थगित करना पड़ा। शाम तक कोई ठोस काम नहीं हो सका—आख़िरकार पूरा दिन स्थगन में चला गया।
राज्यसभा में भी वही गतिरोध
राज्यसभा में भी हालात कुछ ऐसे ही रहे। उपसभापति हरिवंश ने शांति की कोशिश की, पर विपक्ष की आवाज़ों में वह दब गईं। नियम 267 के तहत रैली के लोकतांत्रिक प्रभाव पर चर्चा की मांग रखी गई।
भाजपा सदस्यों ने इसे “सस्ती राजनीति” बताया। पहले दोपहर में और फिर बाद में सदन स्थगित करना पड़ा। लोकसभा की तुलना में यहां बहसें लंबी चलीं, पर नतीजा वही रहा।

मूल टकराव: मर्यादा बनाम लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति
सरकार का रुख
सरकार इसे संसदीय मर्यादाओं पर सीधा हमला मानती है। गृह मंत्री अमित शाह ने प्रेस नोट में कहा कि ऐसे नारे प्रधानमंत्री के पद का मज़ाक उड़ाते हैं और विशेषाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। Congress से माफ़ी की मांग की गई, नहीं तो कार्रवाई/निलंबन पर विचार की बात कही गई।
मंत्रियों का तर्क है कि रैलियों की बातें सदन के बाहर रहें; सदन के भीतर तथ्य और नियम चलें।
विपक्ष की दलील
Congress का कहना है कि नारे किसानों की परेशानी और युवाओं के ग़ुस्से जैसे असली मुद्दों की ओर ध्यान दिलाते हैं। सदन में इन्हें उठाना जवाबदेही तय करता है। वे 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों जैसे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कड़ी अभिव्यक्ति भी लोकतंत्र का हिस्सा है।

विधायी असर: दिन 11 में क्या खोया?
तयशुदा कामकाज बाधित
लोकसभा में वक्फ़ संशोधन विधेयक पर चर्चा और राज्यसभा में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ तथा सीमा सुरक्षा पर सवाल तय थे—सब टल गया। पहले 10 दिनों में तीन विधेयक पास हुए थे, अब देरी बढ़ रही है।
उत्पादकता के आंकड़े
आधिकारिक लॉग्स के अनुसार, सत्र का करीब 40% समय हंगामे में चला गया—दिन 11 तक 20 घंटे से ज़्यादा। प्रश्नकाल सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ। कुल सत्र सिर्फ़ 25 दिनों का है, ऐसे में आगे कामकाज पर दबाव बढ़ेगा।
संस्थागत प्रतिक्रिया और आगे की राह-Congress
स्पीकर/चेयर के संकेत
स्पीकर ओम बिरला ने चेताया कि दोबारा हंगामा हुआ तो नाम लेकर कार्रवाई/निलंबन हो सकता है। राज्यसभा में हरिवंश ने दलों से बातचीत का आग्रह किया। स्थगन के बाद भाजपा-कांग्रेस नेताओं की 20 मिनट की बातचीत हुई—अभी सहमति नहीं बनी, पर संवाद की गुंजाइश दिखी।

पिछले उदाहरण और समाधान
2019 (एनआरसी) और 2020 (कृषि कानून) जैसे मामलों में सर्वदलीय बैठकों से समाधान निकला था। नियम 267 के तहत कार्यवाही स्थगित करने के लिए दो-तिहाई समर्थन चाहिए—अक्सर यही अड़चन बनती है।
दिन 11 हंगामे और गतिरोध में खत्म हुआ। विरोध के अधिकार और सदन की मर्यादा के बीच खींचतान ने कानून-निर्माण की रफ्तार रोक दी है। जैसे-जैसे सत्र आगे बढ़ेगा, दिन 12 पर सबकी नज़र रहेगी—समाधान होगा या शोर बढ़ेगा?
मुख्य बिंदु:
घटना: पीएम-विरोधी नारों पर बहस से दोनों सदन स्थगित।
नुकसान: वक्फ़ संशोधन, चुनाव सुधार जैसे मुद्दे टले।
तनाव: सरकार मर्यादा पर अड़ी, विपक्ष जवाबदेही पर।
आगे: मध्यस्थता से ही सत्र बच सकता है।
संदेश: संतुलन के बिना संसद नहीं चलती।
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