Unnao पीड़िता ने सेंगर की ज़मानत का किया विरोध: CBI हाईकोर्ट आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, देशभर में आक्रोश
एक ऐसे फैसले में जिसने एक बार फिर देशभर में गुस्सा भड़का दिया है, Unnao बलात्कार मामले की पीड़िता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जा चुके भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत दिए जाने के फैसले का खुलकर विरोध किया है।
यह फैसला 2019 में हुई उसकी सजा के वर्षों बाद आया है और इसके साथ ही CBI ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान कर दिया है।
इस घटनाक्रम ने विरोध-प्रदर्शनों, राजनीतिक बयानबाज़ी और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवालों को जन्म दिया है। सवाल यही है—क्या इससे भारत में न्याय की लड़ाई और लंबी हो जाएगी?
भूमिका: ज़मानत का फैसला और तत्काल असर
फैसले के बाद देशभर में प्रतिक्रिया
Unnao मामला 2017 में सामने आया था, जब एक नाबालिग लड़की ने तत्कालीन विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर गंभीर आरोप लगाए थे। इसके बाद पीड़िता और उसके परिवार को धमकियों, हादसों और जान के नुकसान का सामना करना पड़ा, जिससे यह मामला राजनीतिक ताकत के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया।
दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट द्वारा दी गई ज़मानत की खबर आते ही सोशल मीडिया पर #JusticeForUnnaoSurvivor जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। टीवी चैनलों पर बहसें शुरू हो गईं और आम लोगों में गहरा असंतोष दिखा।
कई लोगों को यह फैसला महिला सुरक्षा और तेज़ न्याय की दिशा में उठाए गए कदमों के उलट लगा।
पीड़िता की आवाज़: न्याय की लड़ाई और तेज़
ज़मानत के फैसले के बाद पीड़िता ने इसे “विश्वासघात” बताया। उनके वकीलों के ज़रिए कहा गया कि यह फैसला उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है और उनके साहस का अपमान करता है।
जब उन्होंने पहली बार शिकायत दर्ज कराई थी, तब वह बहुत कम उम्र की थीं और एक प्रभावशाली नेता के खिलाफ खड़ी हुई थीं। आज भी उनकी लड़ाई उसी हिम्मत की परीक्षा ले रही है।
उनकी आवाज़ उन तमाम पीड़ितों की आवाज़ बन गई है जो सोचते हैं कि सच बोलने की कीमत क्या होती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: कानूनी आधार और सवाल
ज़मानत देने के तर्क
हाईकोर्ट ने ज़मानत देते समय यह कहा कि सेंगर लंबे समय से जेल में हैं और अपील लंबित है। अदालत ने यह भी देखा कि सह-आरोपियों को पहले ज़मानत मिल चुकी है।
कानूनी रूप से ज़मानत का मतलब दोषमुक्ति नहीं होता, बल्कि अपील के दौरान अस्थायी राहत होती है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतने गंभीर अपराध में यह तर्क पर्याप्त नहीं हैं।
यह सवाल उठता है कि क्या समय बीतने के साथ अपराध की गंभीरता कम हो जाती है?
आगे की कानूनी प्रक्रिया
CBI अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के ज़रिए चुनौती देगी। एजेंसी का कहना है कि पीड़िता और गवाहों की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ किया गया है।
अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करता है, तो ज़मानत रद्द भी हो सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगेगा, जो पीड़िता के लिए एक और मानसिक परीक्षा होगी।
CBI का रुख: ज़मानत के खिलाफ सख्त कदम
CBI की आधिकारिक प्रतिक्रिया
CBI ने साफ कहा है कि वह इस ज़मानत को चुनौती देगी। एजेंसी के मुताबिक, यह फैसला मामले की गंभीरता और पिछली घटनाओं को देखते हुए गलत है।
CBI का कहना है कि वह पीड़िता के साथ खड़ी है और न्याय सुनिश्चित करने के लिए हर कानूनी कदम उठाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि CBI के पास मज़बूत आधार हैं। अपराध की प्रकृति, गवाहों को पहले मिली धमकियाँ और आजीवन कारावास की सजा—ये सभी ज़मानत रद्द करने के पक्ष में जाते हैं।
अतीत में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है, जहाँ पीड़ित की सुरक्षा पर खतरा माना गया हो।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
राहुल गांधी की तीखी टिप्पणी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस ज़मानत को “लोकतंत्र पर दाग” बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला दिखाता है कि ताकतवर लोगों को कैसे राहत मिल जाती है, जबकि पीड़ित न्याय के लिए संघर्ष करते रहते हैं।
उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को और तेज़ कर दिया है, खासकर महिला सुरक्षा और कानून के राज को लेकर।
नागरिक समाज का विरोध
महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिल्ली सहित कई जगहों पर प्रदर्शन किए। मोमबत्ती मार्च और ऑनलाइन अभियानों के ज़रिए ज़मानत रद्द करने की मांग की जा रही है।
लोग सिस्टम में बदलाव चाहते हैं, जैसे:
संवेदनशील मामलों में तेज़ अपील
पीड़ितों की बेहतर सुरक्षा
राजनीतिक प्रभाव से मुक्त न्याय
पीड़िता पर असर: लंबी कानूनी लड़ाई का मानसिक बोझ
लगातार चल रही कानूनी प्रक्रिया पीड़िता पर भारी पड़ रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मामलों में पीड़ित बार-बार उसी दर्द से गुजरते हैं।
सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद डर और अनिश्चितता बनी रहती है। यह दिखाता है कि केवल सजा ही नहीं, बल्कि पीड़ित के पुनर्वास पर भी ध्यान ज़रूरी है।
न्याय की तलाश जारी
कुलदीप सिंह सेंगर को मिली ज़मानत ने एक बार फिर उन्नाव मामले को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। पीड़िता का विरोध, CBI की चुनौती और राजनीतिक-सामाजिक दबाव—सबकी निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट पर हैं।
यह मामला याद दिलाता है कि न्याय सिर्फ फैसले से नहीं, बल्कि भरोसे से जुड़ा होता है।
पीड़िता की लड़ाई उन सभी के लिए उम्मीद है जो न्याय की राह पर डटे हैं।
न्याय तभी मजबूत होगा, जब समाज, संस्थाएँ और सिस्टम—तीनों साथ खड़े हों।
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