कांग्रेस की अहम CWC बैठक: Sonia गांधी और राहुल गांधी की अगुवाई में सिद्धारमैया और शशि थरूर की भूमिका का विश्लेषण
कल्पना कीजिए एक ऐसे कमरे की, जहाँ भारत की राजनीति के बड़े दिग्गज देश की एक प्रमुख पार्टी के भविष्य पर मंथन कर रहे हों। दिसंबर 2025 में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की ताज़ा बैठक कुछ ऐसी ही रही। इस बैठक की कमान Sonia गांधी और राहुल गांधी ने संभाली, जहाँ हालिया चुनावी झटकों के बाद पार्टी को दोबारा मज़बूत करने पर गहन चर्चा हुई।
महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों में हार के बाद यह बैठक हुई, जबकि कर्नाटक जैसे राज्यों में कांग्रेस की सफलता को उदाहरण के तौर पर रखा गया। Sonia और राहुल ने बैठक की दिशा तय की और सिद्धारमैया तथा शशि थरूर जैसे नेताओं को आगे रखकर अनुभव और नए विचारों का संतुलन बनाने की कोशिश की।
आज की कांग्रेस में गांधी नेतृत्व की केंद्रीय भूमिका-Sonia
कांग्रेस में आज भी गांधी परिवार की भूमिका निर्णायक बनी हुई है। Sonia और राहुल गांधी ने CWC बैठक को स्थिर और नियंत्रित नेतृत्व दिया, जिससे पार्टी के भीतर एकता बनाए रखने का संदेश गया।
Sonia गांधी: अनुभव और संतुलन की ताक़त
Sonia गांधी ने बैठक की शुरुआत स्पष्ट एजेंडे के साथ की। वर्षों के अनुभव के कारण उनकी बातों को आज भी पार्टी में खास महत्व मिलता है। हाल ही में राज्यसभा जाने के बाद वह रोज़मर्रा की राजनीति से कुछ दूरी बनाकर रणनीतिक सलाह की भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने महिला अधिकारों, ग्रामीण रोज़गार और समावेशी विकास जैसे मुद्दों पर ज़ोर दिया। उनका शांत और संतुलित अंदाज़ पार्टी के अंदर अलग-अलग विचारों को जोड़ने का काम करता है।
राहुल गांधी: रणनीतिकार और कार्यकर्ताओं की आवाज़
राहुल गांधी ने बैठक में रणनीति पर खुलकर चर्चा की। युवाओं से जुड़ाव, डिजिटल कैंपेन और संगठन की कमज़ोरियों पर उन्होंने फोकस किया। उन्होंने चुनावी हारों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्हें सीख में बदलने की बात कही।
राहुल ने बेरोज़गारी, किसानों की समस्याओं और असमानता जैसे मुद्दों को पार्टी की लड़ाई का केंद्र बनाने पर ज़ोर दिया। साथ ही, उन्होंने सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल की आवश्यकता बताई।
सिद्धारमैया और शशि थरूर: कांग्रेस की रणनीति में नए आयाम
इस बैठक में सिद्धारमैया और शशि थरूर की सक्रिय भागीदारी कांग्रेस की सोच में बदलाव का संकेत देती है।
सिद्धारमैया: दक्षिण भारत की मज़बूत ज़मीन से आवाज़
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2023 की बड़ी जीत के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि ज़मीनी स्तर पर काम, सामाजिक न्याय और जनकल्याण योजनाएँ कैसे चुनावी सफलता दिला सकती हैं।
उन्होंने दक्षिण भारत पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी और कहा कि कांग्रेस को क्षेत्रीय मुद्दों के साथ मज़बूत संगठन खड़ा करना होगा।
शशि थरूर: बौद्धिक दृष्टि और वैश्विक सोच
शशि थरूर ने बैठक में वैश्विक राजनीति, विदेश नीति और आधुनिक संचार रणनीतियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को सोशल मीडिया और शहरी मतदाताओं तक पहुँचने के लिए नए तरीकों की ज़रूरत है।
उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और तकनीकी बदलावों को समझकर ही पार्टी खुद को आधुनिक बना सकती है।
CWC में हुई प्रमुख चर्चाएँ और रणनीतिक बदलाव
चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा और जवाबदेही
बैठक में हालिया चुनावों की गहन समीक्षा हुई। उत्तर भारत में कमजोर प्रदर्शन और दक्षिण में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति पर चर्चा की गई। कई नेताओं ने संगठनात्मक कमज़ोरियों और संदेश की कमी को हार का कारण बताया।
कुछ पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने और संगठन में बदलाव के संकेत भी दिए गए।
भविष्य की रणनीति और गठबंधन राजनीति
2026 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन मज़बूत करने पर सहमति बनी। INDIA गठबंधन को और प्रभावी बनाने, साझा अभियानों और संसाधनों के बेहतर उपयोग पर चर्चा हुई।
आंतरिक चुनौतियाँ और संगठन को मज़बूत करने की कोशिश
बैठक में असहमति के स्वर भी सामने आए, लेकिन सोनिया गांधी ने सभी को एकजुट रहने का संदेश दिया। कार्यकर्ताओं की राय लेने के लिए नियमित बैठकों और ऑनलाइन फीडबैक सिस्टम पर सहमति बनी।
आगे की राह: संगठनात्मक पुनर्जीवन
कांग्रेस ने 2026 तक 2 करोड़ नए सदस्य जोड़ने का लक्ष्य रखा है। युवा और महिला नेताओं को आगे लाने, डिजिटल प्रशिक्षण और ग्रामीण संपर्क कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है।
CWC बैठक का संभावित असर
Sonia और राहुल गांधी के नेतृत्व में हुई यह CWC बैठक कांग्रेस के लिए एक अहम मोड़ मानी जा रही है। सिद्धारमैया और शशि थरूर जैसे नेताओं की सक्रिय भूमिका पार्टी को नई दिशा देने का संकेत देती है।
जवाबदेही, एकता और स्पष्ट रणनीति—ये इस बैठक के प्रमुख संदेश रहे। अब देखना होगा कि क्या ये फैसले कांग्रेस की वापसी की ज़मीन तैयार कर पाएंगे।
BJP के अनुसार, राहुल गांधी कांग्रेस, सहयोगी दलों और यहां तक कि परिवार के भीतर भी अपना समर्थन खो रहे हैं।
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