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BMC चुनाव परिणाम: राहुल गांधी का आरोप—चुनाव आयोग नागरिकों को ‘गैसलाइट’ कर रहा है

BMC चुनावों के नतीजे आए अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, लेकिन मुंबई की राजनीति में घमासान मच गया है। कांग्रेस नेता और प्रमुख विपक्षी आवाज़ राहुल गांधी ने चुनाव आयोग (ईसी) पर तीखा हमला बोला है। उनका आरोप है कि आयोग ने निष्पक्ष चुनाव को लेकर झूठे आश्वासन देकर जनता को भ्रमित किया। नागरिकों को “गैसलाइट” करने का यह आरोप बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के कड़े मुकाबले के बाद और भी गंभीर हो गया है।

शुरुआती नतीजों के मुताबिक शिवसेना लगभग 227 में से 120 सीटों के साथ आगे है। भाजपा करीब 80 सीटों पर है, जबकि कांग्रेस को लगभग 30 सीटें मिली हैं। नतीजों के बाद जनता की भावनाएं बंटी हुई दिखीं—सत्तारूढ़ दल के समर्थकों में जश्न, तो विपक्षी खेमे में नाराज़गी और शक। कई मतदाता तेज़ जीत और कुछ इलाकों में मतगणना में हुई देरी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी का यह बयान आया है।

राहुल गांधी का आरोप गहरा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग ने चुनाव के दिन जो हुआ, उस पर जनता को अपनी ही आंखों पर शक करने पर मजबूर कर दिया। यहां “गैसलाइटिंग” का मतलब है—तथ्यों को इस तरह मोड़ना कि असल समस्याएं, जैसे ईवीएम में गड़बड़ी या मतगणना में देरी, दब जाएं। यह शब्द मनोविज्ञान से राजनीति में आया है और अब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास को उजागर करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

राहुल गांधी के आरोपों का आधार: एक विश्लेषण

पिछले सप्ताह दिए गए अपने भाषण में राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर BMC चुनावों में सामने आई समस्याओं को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेतृत्व ने भी मतगणना प्रक्रिया की पूर्ण जांच की मांग की है।

कांग्रेस द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे

कांग्रेस ने कई “रेड फ्लैग” गिनाए हैं।
पहला, बांद्रा और दादर जैसे प्रमुख वार्डों में ईवीएम और वीवीपैट मिलान में गड़बड़ी के आरोप। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि मशीनों में दर्ज वोट काग़ज़ी पर्चियों से मेल नहीं खाते।

दूसरा, मतदान प्रतिशत को लेकर सवाल। सुबह तक जहां मतदान लगभग 50% बताया गया, वहीं शाम तक यह अचानक 65% पहुंच गया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दावा है कि ज़मीनी स्तर पर इतनी भीड़ नहीं दिखी।

तीसरा, मतगणना में देरी। अंधेरी में घंटों तक बैलेट बॉक्स खुले बिना पड़े रहे, जिससे छेड़छाड़ की आशंका बढ़ी। राहुल गांधी ने इसे जानबूझकर की गई देरी बताया। कांग्रेस ने स्थानीय चुनाव कार्यालयों में शिकायतें भी दर्ज कराईं, लेकिन त्वरित समाधान नहीं मिला।

कांग्रेस का कहना है कि इतने बड़े स्तर—करीब एक करोड़ मतदाताओं—वाले चुनाव में छोटी गड़बड़ियां भी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं।

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भारतीय संदर्भ में ‘चुनावी गैसलाइटिंग’ का अर्थ

चुनावों में गैसलाइटिंग का मतलब है—जब अधिकारी यह कहते रहें कि सब कुछ ठीक है, जबकि सामने सबूत इसके उलट हों। भारत में यह शब्द तब उभरता है जब विपक्ष मानता है कि व्यवस्था नागरिकों को पक्षपात या खामियों से अनजान रखने की कोशिश कर रही है।

जैसे 2021 के पश्चिम बंगाल चुनावों में भी विपक्ष ने बूथ हिंसा को कम करके दिखाने का आरोप लगाया था। राहुल गांधी का कहना है कि बीएमसी चुनावों में भी इसी तरह वास्तविक समस्याओं को छिपाया गया।

यह आरोप जनता के भरोसे को तेजी से कमजोर करता है। ऐसे बयान समर्थकों को एकजुट करते हैं, लेकिन समाज में ध्रुवीकरण भी बढ़ाते हैं।

चुनाव आयोग (ईसीआई) की शुरुआती प्रतिक्रिया

चुनाव आयोग ने आरोपों को सिरे से खारिज किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार हुईं और किसी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के प्रमाण नहीं मिले।

आयोग के अनुसार 20% ईवीएम की रैंडम जांच की गई और मतगणना के दौरान लाइव अपडेट दिए गए। ईसीआई ने “गैसलाइटिंग” के आरोपों को हार का ठीकरा फोड़ने जैसा बताया और कहा कि अगर किसी को आपत्ति है तो वह अदालत का रास्ता अपनाए।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि आयोग को और पारदर्शिता दिखानी चाहिए।

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मतदान प्रतिशत और आंकड़ों पर सवाल

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कुल मतदान लगभग 62% रहा। लेकिन कांग्रेस का दावा है कि दक्षिण मुंबई के कुछ वार्डों में वास्तविक मतदान 55% से ज्यादा नहीं था। एक स्थानीय एनजीओ की रिपोर्ट में फॉर्म 17C में करीब 5% का अंतर बताया गया।

विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ गड़बड़ियां मानवीय भूल से भी हो सकती हैं, लेकिन इतने बड़े शहर में छोटी त्रुटियां भी करीबी मुकाबलों को प्रभावित कर सकती हैं।

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मतगणना के दौरान प्रशासनिक चूक

कुछ मतगणना केंद्रों पर अव्यवस्था देखी गई। मलाड से वायरल वीडियो में खुले बॉक्स और कर्मचारियों के बीच बहस दिखाई दी। अंधेरी पूर्व में 90 मिनट की देरी, चेंबूर में ईवीएम सील को लेकर विवाद और वर्सोवा में अफवाहों के चलते झड़प की खबरें सामने आईं।

चुनाव आयोग ने इसे तकनीकी और मौसम संबंधी समस्याएं बताया, साजिश से इनकार किया।

मुंबई चुनावों में विवाद का इतिहास

मुंबई में चुनावी विवाद नए नहीं हैं। 2012 और 2017 के बीएमसी चुनावों में भी ईवीएम और बूथ कैप्चर को लेकर याचिकाएं दायर हुई थीं। ज्यादातर मामलों में अदालतों ने नतीजों को बरकरार रखा।

2026 के चुनावों में फर्क यह है कि यह विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका और जवाबदेही

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार मिले हैं। वह चुनाव की तारीख तय करता है, आचार संहिता लागू करता है और मतगणना कराता है।

अगर किसी को नतीजों पर आपत्ति है, तो 45 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है। कांग्रेस अब 15 सीटों पर ऐसा करने की तैयारी में है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आयोग को खासकर बड़े शहरी चुनावों में संवाद और पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए।

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राजनीतिक असर और जनता के भरोसे पर प्रभाव

राहुल गांधी का बयान विपक्ष को एकजुट करता है, लेकिन अगर ठोस सबूत सामने नहीं आते, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। भाजपा इसे राजनीतिक ड्रामा बता रही है।

सबसे बड़ा खतरा लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसे का क्षरण है। हालिया सर्वे बताते हैं कि शहरी मतदाताओं में ईवीएम को लेकर संदेह बढ़ा है।

मीडिया कवरेज भी बंटी हुई है—राष्ट्रीय मीडिया संतुलन साध रहा है, जबकि क्षेत्रीय मीडिया अधिक आलोचनात्मक रुख अपना रहा है। सोशल मीडिया पर “गैसलाइटिंग” ट्रेंड बन चुका है।

आरोपों के बीच भरोसा कैसे बहाल हो

BMC चुनाव परिणामों के बाद राहुल गांधी और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं। ईवीएम, मतगणना में देरी और मतदान प्रतिशत जैसे मुद्दों पर अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकले हैं।

आगे का रास्ता सुधारों से होकर जाता है—जैसे वीवीपैट की व्यापक जांच, डेटा की रियल-टाइम निगरानी और अधिक पारदर्शी संवाद। राजनीतिक दलों को सड़कों के बजाय अदालतों का सहारा लेना चाहिए।

एक नागरिक के रूप में संदेश साफ है—सतर्क रहें, सवाल पूछें और सबूत मांगें। मजबूत लोकतंत्र आपकी भागीदारी से ही मजबूत रहता है। आपका वोट सिर्फ मशीन में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव में जाता है।

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