गाज़ा के लिए ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: India, पाकिस्तान और इटली को शामिल करने के मायने
कल्पना कीजिए—गाज़ा संघर्ष को सुलझाने के लिए एक नया और चौंकाने वाला प्रस्ताव। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “बोर्ड ऑफ पीस” बनाने का विचार रखा है और इसमें India, पाकिस्तान और इटली जैसे देशों को शामिल करने की बात कही है। ये ऐसे देश हैं जो आमतौर पर मध्य-पूर्व शांति वार्ताओं के केंद्र में नहीं रहते। यही बात इस प्रस्ताव को दिलचस्प भी बनाती है और सवालों के घेरे में भी रखती है। आखिर इन तीनों को क्यों चुना गया? ये क्या योगदान दे सकते हैं? और क्या यह पहल वाकई कारगर हो सकती है?
भूमिका: गाज़ा के लिए एक नया कूटनीतिक ढांचा
ट्रंप का यह विचार पारंपरिक ढांचों से हटकर है। इसमें न तो केवल पश्चिमी महाशक्तियां हैं और न ही सिर्फ क्षेत्रीय खिलाड़ी। एशिया और यूरोप के देशों को साथ लाकर एक छोटा समूह बनाने की कल्पना है, जो इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच बातचीत को आगे बढ़ाए।
इस लेख में हम समझेंगे—इस चयन के पीछे का तर्क, इन देशों की क्षमताएं और सीमाएं, और यह कि क्या यह “बोर्ड ऑफ पीस” गाज़ा के भविष्य में कोई वास्तविक बदलाव ला सकता है।
गाज़ा संघर्ष की पृष्ठभूमि और कूटनीतिक गतिरोध
गाज़ा का संघर्ष दशकों पुराना है। रॉकेट हमले, सीमा संघर्ष और बार-बार टूटती वार्ताएं—यह सिलसिला चलता रहा है। 2023–24 के टकरावों में हजारों जानें गईं, लेकिन समाधान फिर भी दूर रहा।
ओस्लो समझौते से लेकर हालिया कतर-प्रायोजित वार्ताओं तक, कई प्रयास हुए, पर भरोसे की कमी और राजनीतिक हितों ने राह रोक दी।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पास करता है, लेकिन अमल कमजोर रहता है। अरब देशों की कोशिशों पर पक्षपात के आरोप लगते हैं। ऐसे में ट्रंप का प्रस्ताव एक “नई शुरुआत” के तौर पर देखा जा रहा है—एक छोटा, लचीला समूह जो जमी हुई स्थिति को हिला सके।
अचानक चयन: भारत, पाकिस्तान और इटली ही क्यों?
खबरों के मुताबिक ट्रंप की टीम ने इन तीन देशों से अनौपचारिक संपर्क किया है। आधिकारिक घोषणा भले न हुई हो, लेकिन संकेत साफ हैं।
इन तीनों का मिश्रण दिलचस्प है—
India: आर्थिक ताकत और संतुलित विदेश नीति
पाकिस्तान: मुस्लिम दुनिया में प्रभाव
इटली: भूमध्यसागर के ज़रिए क्षेत्रीय निकटता और यूरोपीय कड़ी
सिद्धांततः यह संयोजन संतुलन दे सकता है—या फिर नई जटिलताएं भी पैदा कर सकता है।

ट्रंप के चयन के पीछे की सोच
ट्रंप अक्सर पारंपरिक रास्तों से हटकर फैसले लेते हैं। उन्होंने न तो “क्वार्टेट” (अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, संयुक्त राष्ट्र) को चुना और न ही केवल खाड़ी देशों को।
यह बोर्ड एक तरह से “स्टार्टअप मॉडल” जैसा है—छोटा, तेज़ और पुराने ढांचों के बोझ से मुक्त।
इटली की भूमिका: यूरोप और भूमध्यसागर के बीच सेतु
इटली भौगोलिक रूप से गाज़ा के क़रीब है। भूमध्यसागर के रास्ते उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व से उसका सीधा जुड़ाव है।
इटली पहले भी गाज़ा में मानवीय सहायता भेज चुका है।
उसके निर्माण और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां पुनर्निर्माण में भूमिका निभा सकती हैं।
ट्रंप इटली को अमेरिका की सक्रियता और यूरोपीय संघ के ढांचे के बीच एक “ब्रिज” के रूप में देखते हैं।
India की संभावित ताकत: आर्थिक शक्ति और गुटनिरपेक्ष विरासत
India दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। गाज़ा के पुनर्निर्माण में आर्थिक मदद और तकनीकी सहयोग दे सकता है।
इतिहास में भारत की गुटनिरपेक्ष नीति रही है—न पूरी तरह पश्चिम के साथ, न ही किसी एक धड़े के। यही संतुलन उसे स्वीकार्य मध्यस्थ बना सकता है।
हाल के वर्षों में India ने इज़राइल से रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ाया है, तो साथ ही फ़िलिस्तीन को मानवीय सहायता भी दी है। यह “दोनों से संवाद” की नीति ट्रंप को आकर्षक लगती है।
पाकिस्तान की जटिल स्थिति: मुस्लिम दुनिया में प्रभाव
पाकिस्तान फ़िलिस्तीन मुद्दे पर मुखर रहा है और संयुक्त राष्ट्र में लगातार समर्थन देता आया है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों से उसके गहरे रिश्ते हैं।
इस कारण वह हमास और अन्य फ़िलिस्तीनी गुटों तक संदेश पहुंचाने में प्रभावी हो सकता है।
हालांकि, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा से जुड़े सवाल उसकी विश्वसनीयता को चुनौती देते हैं। फिर भी, मुस्लिम दुनिया में उसकी “आवाज़” ट्रंप के बोर्ड को संतुलन दे सकती है।
![]()
क्षमताएं बनाम सीमाएं: ज़मीनी हकीकत
India: सीधी दखलअंदाजी से बचने की परंपरा, घरेलू जनमत का दबाव
इटली: यूरोपीय संघ की सामूहिक विदेश नीति से बंधा होना
पाकिस्तान: आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय तनाव
इन सीमाओं के बावजूद, सही ढांचे में यह तिकड़ी असर दिखा सकती है।
पुराने प्रयासों से तुलना: क्या नया है?
संयुक्त राष्ट्र क्वार्टेट बड़ा और धीमा साबित हुआ। बहुत से हित, बहुत सी बाधाएं।
ट्रंप का बोर्ड छोटा है—तेज़ फैसलों की उम्मीद के साथ।
इतिहास बताता है कि नॉर्वे जैसे गैर-पारंपरिक मध्यस्थ भी ओस्लो समझौते में सफल रहे थे। दक्षिण अफ्रीका ने भी अफ्रीकी संघर्षों में मध्यस्थता की।
सबक साफ है: तटस्थता और भरोसा, आकार से ज़्यादा अहम है।
![]()
संरचना और प्रभावशीलता: असली सवाल
सबसे बड़ा सवाल—इस बोर्ड की ताकत क्या होगी?
सिर्फ सलाह देने वाला मंच?
या आर्थिक प्रोत्साहन और दबाव डालने की क्षमता भी?
यदि यह बोर्ड पुनर्निर्माण, निवेश और रोज़गार जैसे ठोस लाभ जोड़ पाता है, तो शांति की संभावना बढ़ सकती है।
संभावित आर्थिक एजेंडा
India: सोलर और टेक प्रोजेक्ट
इटली: पानी, बंदरगाह और इंफ्रास्ट्रक्चर
पाकिस्तान: प्रशिक्षण और श्रम सहयोग
क्या यह त्रिपक्षीय पहल कारगर होगी?
ट्रंप का “बोर्ड ऑफ पीस” जोखिम भरा जरूर है, लेकिन मौजूदा गतिरोध में एक नया प्रयोग भी है।
ताकत इसकी विविधता में है, कमजोरी इसकी राजनीतिक जटिलताओं में।
मुख्य सीख
छोटे समूह तेज़ी से काम कर सकते हैं
गैर-पारंपरिक मध्यस्थ नए भरोसे ला सकते हैं
आर्थिक प्रोत्साहन, शब्दों से ज़्यादा असरदार होते हैं
अमेरिकी प्रतिबद्धता निर्णायक होगी
गाज़ा की कूटनीति में नवाचार की ज़रूरत है। शायद यही प्रयोग एक नई राह खोले।
आप क्या सोचते हैं—क्या यह बोर्ड वाकई बदलाव ला सकता है?

