Rahul

Rahul गांधी का बीटिंग द रिट्रीट समारोह से दूरी बनाना: प्रतीकवाद और एकता पर सियासी घमासान

हर साल बीटिंग द रिट्रीट समारोह गणतंत्र दिवस समारोहों का शांत और गरिमामय समापन करता है। जब बैंड मधुर धुनें बजाते हैं और देश की भव्य इमारतों पर रोशनी धीरे-धीरे बुझती है, तब यह आयोजन परेड की भव्यता के बाद शांति का संदेश देता है। यह सशस्त्र बलों के सम्मान और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता है।

लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग था। कांग्रेस के प्रमुख नेता और विपक्ष के अहम चेहरे Rahul गांधी इस समारोह में मौजूद नहीं थे। उनकी खाली कुर्सी ने तुरंत राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया। क्या यह महज़ एक चूक थी या फिर कोई सोचा-समझा संदेश? यह लेख इसी सियासी ड्रामे की पड़ताल करता है—पार्टी टकराव से लेकर भारत की बंटी हुई राजनीति पर इसके असर तक।

बीटिंग द रिट्रीट समारोह को समझना

राष्ट्रीय कैलेंडर में बीटिंग द रिट्रीट का महत्व

बीटिंग द रिट्रीट की परंपरा सैन्य इतिहास से जुड़ी है। पुराने ज़माने में ढोल बजाकर सैनिकों को दिन के अंत में बैरकों में लौटने का संकेत दिया जाता था। भारत में यह समारोह हर साल 29 जनवरी को नई दिल्ली के विजय चौक पर आयोजित होता है। इसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना के संयुक्त बैंड “सारे जहाँ से अच्छा” जैसी प्रसिद्ध धुनें बजाते हैं।

यह आयोजन गणतंत्र दिवस समारोहों का औपचारिक समापन होता है। उत्साह से भरे जश्न के बाद यह आत्मचिंतन और शांति का क्षण देता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल लगभग 5,000 लोग इसे देखने आते हैं। विविधताओं वाले देश में यह एकता की भावना को मजबूत करता है।

भारतीय और पश्चिमी संगीत का मेल भारत की परंपरा और आधुनिकता के संगम को दिखाता है। ऐसे में इस समारोह से अनुपस्थित रहना कई लोगों को किसी पारिवारिक आयोजन से दूरी बनाने जैसा लगता है।

प्रोटोकॉल और शीर्ष नेताओं की मौजूदगी की अपेक्षा

इस समारोह में देश के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी अपेक्षित होती है। राष्ट्रपति इसकी अगुवाई करते हैं, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, न्यायाधीश और विदेशी राजनयिक भी मौजूद रहते हैं। परंपरागत रूप से विपक्ष के नेता—जैसे Rahul गांधी—भी इसमें शामिल होते हैं ताकि राष्ट्रीय एकता का संदेश जाए।

वीआईपी बैठने की व्यवस्था पद के अनुसार तय होती है। बिना सूचना के अनुपस्थिति को गंभीरता से देखा जाता है। यह राजनीति का एक तरह का अलिखित ड्रेस कोड है—या तो मौजूद रहिए, या वजह बताइए। पहले के वर्षों में, कठिन राजनीतिक हालात के बावजूद, समारोह में उपस्थिति पूरी रही है।

राहुल गांधी ने 95 चुनाव हारने का नया रिकार्ड बनाया', गौरव भाटिया का  कांग्रेस पर तंज - bihar election result bjps gaurav bhatia targets rahul  gandhi after nda victory

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी अनुपस्थितियाँ

2023 में कुछ सांसदों ने कृषि कानूनों के विरोध में समारोह का बहिष्कार किया था, जिस पर कई दिनों तक बहस चली। 2019 में एक क्षेत्रीय नेता स्थानीय रैली के कारण नहीं आए, तब भी हल्का विवाद हुआ।

अक्सर ऐसी अनुपस्थितियाँ बड़े मुद्दों से जुड़ी होती हैं। जब सड़कों पर आंदोलन होते हैं, तो नेता प्रतीकात्मक फैसले लेते हैं। सोशल मीडिया इस पर बहस को और तेज़ कर देता है।

हालांकि 2024 में एक मंत्री बीमारी के कारण नहीं आए थे, जिसे ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। लेकिन Rahul गांधी जैसे बड़े नेता का न आना अपने-आप में बड़ा मुद्दा बन गया।

तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

सत्तारूढ़ दल की तीखी आलोचना

बीजेपी नेताओं ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट कर कहा कि Rahul गांधी की अनुपस्थिति सशस्त्र बलों का अपमान है। उन्होंने लिखा, “राष्ट्रीय आयोजन हमें जोड़ते हैं, अनुपस्थिति हमें बाँटती है।”

टीवी बहसों में इसे कांग्रेस की पुरानी बहिष्कार राजनीति से जोड़ा गया। कुछ सांसदों ने इसे सैनिकों के मनोबल से जोड़कर देखा। संसद के गलियारों में भी यह मुद्दा गूंजता रहा।

बीजेपी ने इसे राहुल गांधी के “जमीनी हकीकत से कटे होने” के रूप में पेश किया, जो उनके पुराने राजनीतिक नैरेटिव से मेल खाता है।

Rahul गांधी के पक्ष में कांग्रेस की सफाई

कांग्रेस ने पलटवार किया। पार्टी के बयान में कहा गया कि Rahul गांधी पहले से तय अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड के कार्यक्रमों में व्यस्त थे। बयान में कहा गया, “वह हर दिन सशस्त्र बलों का सम्मान करते हैं, सिर्फ मंचों पर नहीं।”

पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने पूरे विवाद को गैरज़रूरी बताया। राहुल गांधी ने खुद एक वीडियो साझा कर सेना को सलाम किया और भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिए एकता के अपने प्रयासों को रेखांकित किया।

समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनके पुराने समारोहों में शामिल होने के वीडियो शेयर कर बीजेपी के आरोपों को पलटने की कोशिश की।

राहुल गांधी की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, संभल की अदालत ने जारी किया नोटिस

मीडिया की नजर और संपादकीय रुख

टीवी चैनल दो खेमों में बँटे दिखे। बीजेपी समर्थक चैनलों ने इसे “अपमान” करार दिया और खाली कुर्सी के दृश्य बार-बार दिखाए। वहीं द हिंदू जैसे अखबारों ने इसे मामूली मुद्दा बताते हुए असली नीतिगत सवालों पर ध्यान देने की बात कही।

टाइम्स ऑफ इंडिया के एक संपादकीय ने पूछा—क्या उपस्थिति कर्मों से ज्यादा मायने रखती है? जबकि इंडियन एक्सप्रेस ने बढ़ते ध्रुवीकरण को इस हंगामे की वजह बताया।

सोशल मीडिया पर #RahulSkipsBeatingRetreat ट्रेंड करने लगा और मीम्स की बाढ़ आ गई।

गहराई से राजनीतिक संदेश की पड़ताल

क्या यह एक शांत विरोध था?

पिछले कुछ हफ्तों पर नजर डालें तो संसद में बेरोज़गारी और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तीखी बहसें हुई थीं। Rahul गांधी बजट सत्र में वॉकआउट का नेतृत्व कर चुके हैं। ऐसे में यह अनुपस्थिति एक संकेत भी हो सकती है।

भारतीय राजनीति में प्रतीकात्मक कदम अक्सर बिना बोले संदेश दे जाते हैं। क्या यह मोदी सरकार के खिलाफ एक मौन विरोध था? कई विश्लेषक इसे उसी कड़ी में देखते हैं।

एकता बनाम विभाजन की छवि

राष्ट्रीय समारोह पुल बनाने का काम करते हैं। उनसे दूरी दीवारें खड़ी कर सकती है। आम लोगों को यह छोटी राजनीति लग सकती है, लेकिन कांग्रेस समर्थकों के लिए यह “डटकर खड़े रहने” का प्रतीक है।

2014 के चुनावों ने दिखाया था कि प्रतीकवाद वोटों को प्रभावित कर सकता है। राहुल गांधी के लिए यह जोखिम भी है और अवसर भी।

फायदे: मुद्दों पर मजबूती का संदेश
नुकसान: “राष्ट्रविरोधी” जैसे आरोपों का खतरा
बीच का रास्ता: कई लोग इसे अब सामान्य मानने लगे हैं

राहुल गांधी की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, संभल की अदालत ने जारी किया नोटिस

विपक्षी बहिष्कारों का इतिहास

1975 की आपातकाल अवधि में विपक्ष ने बड़े सरकारी आयोजनों का बहिष्कार किया था। 1990 के दशक में मंडल आयोग के दौरान भी ऐसे कदम उठे। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कुछ मौकों पर प्रतीकात्मक अनुपस्थिति दर्ज कराई थी।

इतिहास बताता है कि ऐसे फैसले बहस को दिशा देते हैं। Rahul गांधी का कदम भी उसी परंपरा की याद दिलाता है।

संसद और विपक्षी एकता पर असर

संसद के सत्रों में प्रभाव

अगले ही दिन लोकसभा में बीजेपी सांसदों ने यह मुद्दा उठा दिया। शोर-शराबा हुआ और जरूरी विधायी काम प्रभावित हुआ। राज्यसभा में भी तंज कसे गए।

ऐसे विवाद अक्सर कामकाज को धीमा कर देते हैं और प्रतीकों को असली मुद्दों से ऊपर ले आते हैं।

विपक्षी दलों के रिश्तों पर असर

इंडिया गठबंधन में कुछ दलों, जैसे आम आदमी पार्टी, ने Rahul गांधी का समर्थन किया। कुछ अन्य दल चुप रहे, अपने राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए।

इससे विपक्षी एकता की परीक्षा हुई—क्या यह बीजेपी के खिलाफ उन्हें जोड़ता है या दरारें दिखाता है? शुरुआती संकेत दोनों तरफ जाते दिखे।

राहुल गांधी की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, संभल की अदालत ने जारी किया नोटिस

विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इसे “सोची-समझी रणनीति” बताया—“जब शब्द काम न करें, तब अनुपस्थिति बोलती है।”
वहीं स्तंभकार तवलीन सिंह ने इसे एक चूक करार दिया—“एकता दिखाने का मौका चूक गया।”

एक 2025 के सर्वे के मुताबिक 60% मतदाता राष्ट्रीय आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी को अहम मानते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि बंटे दौर में प्रतीकों की ताकत बढ़ जाती है।

एक अनुपस्थिति की लंबी कहानी

बीटिंग द रिट्रीट समारोह में राहुल गांधी की गैरमौजूदगी ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया। जहां एक ओर समारोह की गरिमा थी, वहीं दूसरी ओर राजनीति की तपिश।

कुछ इसे विरोध मानते हैं, कुछ अपमान। यह विवाद भारत की मौजूदा राजनीतिक तनातनी को उजागर करता है। विरोधी इसे चुनावी हथियार बनाएंगे, जबकि समर्थकों के लिए यह उनके “लड़ाकू” नेता की छवि मजबूत करता है।

आज के दौर में प्रतीक पहले से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं। कभी-कभी एक खाली कुर्सी भी बहुत कुछ कह जाती है।

आप क्या सोचते हैं? अपनी राय साझा कीजिए—और चर्चा कीजिए कि राजनीति हमारे राष्ट्रीय गर्व को कैसे आकार देती है।

Noida: सेक्टर 47 में एसयूवी की टक्कर से स्कूटर सवार 27 वर्षीय युवक की मौत

Follow us on Facebook

India Savdhan News | Noida | Facebook

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.