Trinamool या बीजेपी: आज चुनाव हुए तो बंगाल किसे चुनेगा?
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से गर्म रही है। 2021 के विधानसभा चुनावों की तीखी टक्कर याद कीजिए—Trinamool कांग्रेस (TMC) सत्ता में तो लौटी, लेकिन बेहद कड़े मुकाबले के बाद। वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अभूतपूर्व बढ़त दर्ज की। अब, 2026 की शुरुआत में, समय से पहले चुनाव की अटकलें तेज़ हैं। अगर आज ही वोटिंग हो जाए, तो बंगाल किस ओर झुकेगा? यह सवाल स्थानीय ज़रूरतों, राष्ट्रीय राजनीति और मतदाताओं के मूड के बीच फंसा हुआ है। आइए इसे परत-दर-परत समझते हैं।
सत्ता में बैठी Trinamool : कामकाज और जनता की राय
एक दशक से ज़्यादा समय से Trinamool कांग्रेस बंगाल की सत्ता में है। समर्थन अभी भी मज़बूत है, लेकिन सवाल भी कम नहीं हैं।
राज्य की प्रमुख कल्याण योजनाओं का असर
लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री जैसी योजनाएं Trinamool की सबसे बड़ी ताकत हैं। लक्ष्मी भंडार के तहत घर की महिला मुखिया को नकद सहायता मिलती है, जिससे ग्रामीण परिवारों को सीधा फायदा हुआ है। करीब 2 करोड़ महिलाएं इससे जुड़ी हैं और ग्रामीण इलाकों में इसकी लोकप्रियता बहुत ज़्यादा है।
हालांकि, राज्य के बढ़ते कर्ज़ को लेकर चिंता भी है। विशेषज्ञ पूछते हैं कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि गरीब परिवारों के लिए ये योजनाएं राहत हैं। आज चुनाव हों, तो यही योजनाएं Trinamool के पक्ष में बड़ा वोट खींच सकती हैं।
शासन की चुनौतियां और भ्रष्टाचार के आरोप
हाल के वर्षों में Trinamool पर कई घोटालों के आरोप लगे—शिक्षक भर्ती घोटाला, तस्करी के मामले, और नेताओं की गिरफ्तारी। इससे खासकर शहरी मध्यम वर्ग और युवाओं में नाराज़गी दिखी है।
Trinamool इसे बीजेपी की “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बताती है। लेकिन सच यह है कि भ्रष्टाचार की चर्चा पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाती है। अगर आज चुनाव हों, तो यही मुद्दा तृणमूल को कुछ सीटों का नुकसान पहुंचा सकता है।
ममता बनर्जी: अब भी सबसे बड़ा फैक्टर
ममता बनर्जी अब भी Trinamool की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका सरल रहन-सहन, दिल्ली के खिलाफ “बंगाल की आवाज़” बनने की छवि और महिलाओं से जुड़ाव उन्हें खास बनाता है।
दुआरे सरकार जैसे कार्यक्रमों ने सरकारी सेवाओं को लोगों के घर तक पहुंचाया, जिससे भरोसा बना। 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इंकम्बेंसी ज़रूर है, लेकिन ममता की व्यक्तिगत लोकप्रियता उसे काफी हद तक संतुलित कर देती है।
बीजेपी की बढ़त: रणनीति, संगठन और रफ्तार
बीजेपी के लिए बंगाल अब “अगला बड़ा लक्ष्य” है। 2016 में 3 सीटों से 2021 में 77 सीटों तक पहुंचना कोई छोटी बात नहीं।
केंद्र सरकार की योजनाएं और स्थानीय असर
प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना जैसी केंद्र की योजनाओं का लाभ बंगाल में भी पहुंचा है। गैस कनेक्शन और पक्के घर खासकर सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाते हैं।
बीजेपी का आरोप है कि राज्य सरकार इन योजनाओं को पूरी तरह लागू नहीं होने देती। यह नैरेटिव शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं में असर डाल रहा है।
संगठनात्मक मजबूती और ज़मीनी तैयारी
बीजेपी ने बूथ स्तर पर संगठन मज़बूत किया है। कई पूर्व तृणमूल नेताओं को पार्टी में लाकर नेटवर्क बढ़ाया गया। पंचायत चुनावों में पार्टी की अच्छी मौजूदगी इसका संकेत है।
करीबी मुकाबलों में संगठन ही फर्क डालता है—और इस मोर्चे पर बीजेपी पहले से कहीं ज़्यादा तैयार दिखती है।
पहचान की राजनीति और ध्रुवीकरण
बीजेपी धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक मुद्दों को जोर-शोर से उठाती है। उत्तर बंगाल और हिंदू बहुल इलाकों में इसका असर दिखा है।
हालांकि, राज्य की 27% मुस्लिम आबादी बड़े पैमाने पर बीजेपी से दूरी बनाए हुए है। फिर भी, मिश्रित इलाकों में थोड़ा सा झुकाव भी सीटों का गणित बदल सकता है।
बदलता चुनावी भूगोल और जनसांख्यिकी
शहरी बनाम ग्रामीण वोटिंग
शहरों में बेरोज़गारी और विकास की मांग बीजेपी को फायदा देती है। कोलकाता और हावड़ा जैसे इलाकों में पार्टी मज़बूत हुई है।
ग्रामीण बंगाल में अब भी Trinamool की पकड़ मजबूत है, जहां कल्याण योजनाएं सीधा असर डालती हैं। असली लड़ाई उपनगरों और कस्बों में है।
मुस्लिम वोटों का एकजुट रहना
मुस्लिम मतदाता अब भी बड़े पैमाने पर Trinamool के साथ हैं—लगभग 90% समर्थन। बीजेपी का डर उन्हें ममता के साथ बांधे रखता है। यही तृणमूल की सबसे बड़ी ढाल है।
मतुआ समुदाय और अन्य अहम जातियां
मतुआ समुदाय, खासकर शरणार्थी पृष्ठभूमि वाले मतदाता, बीजेपी की नागरिकता संबंधी बातों से आकर्षित हुए हैं। यह करीब 30 सीटों पर असर डाल सकता है।
तीसरी ताकतें और रणनीतिक वोटिंग
लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन की कोशिशें जारी हैं, लेकिन ज़मीनी असर सीमित है। कई जगह ये Trinamool के वोट काटते हैं, जिससे बीजेपी को फायदा हो सकता है।
कुछ इलाकों में स्थानीय निर्दलीय नेता भी उभर रहे हैं, जो बड़े दलों से नाराज़ वोटरों को अपनी ओर खींच रहे हैं।
अगर आज चुनाव हों: संभावित नतीजा
हालिया उपचुनाव और ज़मीनी संकेत बताते हैं कि मुकाबला बेहद करीबी होगा।
Trinamool : मजबूत ग्रामीण आधार + मुस्लिम वोट + ममता की लोकप्रियता
बीजेपी: शहरी बढ़त + संगठन + कुछ जातीय समूहों का समर्थन
आज की तारीख में अनुमान यही है कि Trinamool कांग्रेस मामूली बढ़त के साथ सरकार बना सकती है, मान लीजिए लगभग 145 सीटें, जबकि बीजेपी 110 के आसपास रह सकती है। लेकिन ज़रा-सी हवा बदली, तो तस्वीर पलट भी सकती है।
भरोसा या बदलाव?
बंगाल एक चौराहे पर खड़ा है।
एक ओर—परिचित सरकार, कल्याण योजनाएं और ममता बनर्जी की भावनात्मक पकड़।
दूसरी ओर—बदलाव का वादा, राष्ट्रीय ताकत और बीजेपी की बढ़ती मशीनरी।
फैसला अंततः मतदाता करेगा:
स्थिरता या बदलाव?
आप क्या सोचते हैं—बंगाल किसे चुनेगा?

