UP में ‘घुसखोर पंडित’ फ़िल्म को लेकर राजनीतिक विवाद तेज़
कल्पना कीजिए कि एक फ़िल्म पर्दे पर विस्थापन और पीड़ा की कहानी दिखाए—और वही कहानी पूरे राज्य में विरोध, बहस और तनाव का कारण बन जाए। UP में नई फ़िल्म “घुसखोर पंडित” के साथ ठीक यही हो रहा है। यह फ़िल्म 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनके संघर्षों को दर्शाती है। लेकिन यूपी में कई राजनीतिक दलों और संगठनों ने आरोप लगाया है कि फ़िल्म सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काती है, जिसके चलते इसके प्रदर्शन पर प्रतिबंध और सिनेमाघरों को धमकियों की मांग उठ रही है।
“घुसखोर पंडित” को लेकर UP का राजनीतिक विवाद पिछले महीने ट्रेलर रिलीज़ होने के बाद से तेज़ी से बढ़ा है। सेंसर बोर्ड पर दबाव है, लखनऊ जैसे शहरों में सामाजिक तनाव दिख रहा है, जबकि फ़िल्म निर्माता इसे ऐतिहासिक सच्चाई का सम्मान बता रहे हैं। इस लेख में हम पूरे विवाद, दोनों पक्षों की दलीलों और UP की राजनीति व सिनेमा पर इसके असर को समझेंगे।
विवाद की जड़: किस बात ने आक्रोश पैदा किया?
“घुसखोर पंडित” एक पंडित परिवार की कहानी दिखाती है जो कश्मीर में बढ़ती हिंसा के बीच अपना घर छोड़ने को मजबूर होता है। फ़िल्म व्यक्तिगत पीड़ा को बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम से जोड़ती है और उन आवाज़ों को सामने लाने का दावा करती है जिन्हें अक्सर अनदेखा किया गया।
विवादित विषयवस्तु
फ़िल्म में पंडितों के घरों पर हमले और जबरन पलायन के दृश्य हैं, जो पीड़ितों की गवाही पर आधारित बताए जाते हैं। आलोचकों का कहना है कि कुछ दृश्य एक समुदाय को ज़्यादा दोषी ठहराते हैं और साझा पीड़ा को नज़रअंदाज़ करते हैं।
एक अहम दृश्य में गांव में तनावपूर्ण आमना-सामना दिखाया गया है, जिसे विरोधी “एकतरफ़ा” और UP की सामाजिक विविधता के प्रति असंवेदनशील बता रहे हैं। कुछ नेताओं को फ़िल्म में हिंदू समाज के भीतर जातिगत संकेतों पर भी आपत्ति है, क्योंकि इससे पुराने मतभेद उभरने का डर है। सार्वजनिक क्लिप्स में ऐतिहासिक तथ्यों—जैसे तारीख़ों और घटनाओं—की सटीकता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
प्रमुख राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
समाजवादी पार्टी ने सबसे पहले प्रतिक्रिया दी। पिछले हफ्ते जारी बयान में पार्टी ने UP में फ़िल्म पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की और कहा कि इससे राज्य में अल्पसंख्यकों के बीच अशांति फैल सकती है।

भारतीय जनता पार्टी के भीतर राय बंटी हुई है। कुछ नेता फ़िल्म को हिंदू दृष्टिकोण का समर्थन मानते हैं, जबकि अन्य इसे चुनावी माहौल में जोखिम भरा बताते हुए संयम की बात कर रहे हैं। एक वरिष्ठ मंत्री ने ट्वीट किया—
“कला को हमें बाँटना नहीं चाहिए”—जो सरकार की चिंता को दर्शाता है।
हिंदू युवा वाहिनी जैसे स्थानीय संगठनों ने कानपुर में सभाएँ कर फ़िल्म के समर्थन में प्रदर्शन किए और इसके प्रदर्शन की मांग की।
निर्माता और निर्देशक का पक्ष
निर्देशक राजेश शर्मा का कहना है कि फ़िल्म पर कई सालों तक शोध किया गया और वास्तविक कश्मीरी पंडित परिवारों से बातचीत की गई। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा,
“हमारा मकसद घाव कुरेदना नहीं, बल्कि भरना है। फ़िल्म हर पक्ष की मानवीय पीड़ा दिखाती है।”
निर्माता नेहा कपूर ने अदालत का रुख किया है और भारतीय संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया है। उन्होंने इतिहासकारों के समर्थन में ई-मेल भी साझा किए हैं। सोशल मीडिया पर #ReleaseGhuskhorPandit अभियान चल रहा है, जिसे हज़ारों लोगों का समर्थन मिल रहा है।
कानूनी और सेंसरशिप की लड़ाई: यूपी की आधिकारिक प्रतिक्रिया
जैसे-जैसे विरोध बढ़ रहा है, उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक शांति के बीच संतुलन की परीक्षा हो रही है।
सेंसर बोर्ड के निर्देश
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने कुछ संशोधनों के बाद फ़िल्म को U/A प्रमाणपत्र दिया है। कुछ संवाद और दृश्य बदले गए, लेकिन मूल कहानी बरकरार है। यूपी प्रशासन अब अतिरिक्त राज्य-स्तरीय समीक्षा की मांग कर रहा है।
बताया जा रहा है कि बोर्ड ने करीब 12 छोटे बदलाव सुझाए, जैसे भीड़ वाले दृश्यों को नरम करना। अभी तक पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा है, लेकिन दबाव बढ़ रहा है।
अदालतों में याचिकाएँ
इस हफ्ते लखनऊ हाईकोर्ट में दो जनहित याचिकाएँ दायर हुई हैं। एक मुस्लिम संगठन ने पूरे राज्य में रिलीज़ रोकने की मांग की है, जबकि दूसरी याचिका फ़िल्म समर्थकों ने दायर कर इसके प्रदर्शन की सुरक्षा मांगी है।
सुनवाई अगले सोमवार से शुरू होगी। “पद्मावत” जैसे पुराने मामलों का हवाला दिया जा रहा है, जहाँ अदालतों ने संतुलित रुख अपनाया था।
राज्य सरकार का रुख
बीजेपी सरकार फिलहाल तटस्थ दिख रही है। मुख्यमंत्री कार्यालय का कहना है कि कानून के अनुसार कदम उठाए जाएंगे और हालात पर नज़र रखी जाएगी। चर्चाएँ हैं कि तनाव बढ़ने पर फ़िल्म वितरकों को दी जाने वाली टैक्स छूट वापस ली जा सकती है।
वाराणसी जैसे संवेदनशील इलाकों में सिनेमाघरों के बाहर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जा सकता है। कुछ विधायक राज्य में फ़िल्म निगरानी क़ानून सख़्त करने की बात भी कर रहे हैं।

सामाजिक-राजनीतिक असर
यह विवाद राजनीति से निकलकर आम जीवन तक पहुँच चुका है। चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक बहस तेज़ है।
जन प्रतिक्रिया और विरोध
लखनऊ में पिछले शनिवार एक मल्टीप्लेक्स के बाहर 200 से ज़्यादा लोग विरोध में जुटे। वाराणसी में पंडित संगठनों ने फ़िल्म के समर्थन में रैलियाँ निकालीं।
आगरा जैसे छोटे शहरों में सोशल मीडिया की बहस ज़मीनी तनाव में बदलती दिखी। कहीं विरोध, कहीं चुपचाप टिकट बुकिंग—राज्य की राय बंटी हुई है।
राजनीतिक समीकरणों पर असर
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल बीजेपी पर “विभाजनकारी कला” को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं। यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ध्रुवीकरण को तेज़ कर सकता है।
बीजेपी आलोचकों को “हिंदू-विरोधी” बताकर अपने कोर वोटरों को मज़बूत करने की कोशिश कर रही है।
UP में कला और सेंसरशिप का इतिहास
UP में कला को लेकर विवाद नया नहीं है। 2018 में “पद्मावत” पर प्रतिबंध, 2000 के दशक में धार्मिक नाटकों पर रोक—ऐसे कई उदाहरण हैं।

जब भी कला धर्म या जाति को छूती है, राजनीतिक हस्तक्षेप आम हो जाता है। “घुसखोर पंडित” भी इसी परंपरा का हिस्सा बनती दिख रही है।
मीडिया कवरेज और पक्षपात
राष्ट्रीय चैनल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ज़ोर दे रहे हैं, जबकि स्थानीय चैनल विरोध और संभावित अशांति को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। सोशल मीडिया ने आग में घी का काम किया है—क्लिप्स, हैशटैग और अफ़वाहें तेज़ी से फैल रही हैं।
आगे क्या?
अदालत का फैसला तय करेगा कि फ़िल्म यूपी में पूरी तरह रिलीज़ होगी, संशोधन के साथ आएगी या रोक दी जाएगी। इस मामले का असर आने वाले वर्षों तक फ़िल्म निर्माण और निवेश पर पड़ेगा।
“घुसखोर पंडित” को लेकर विवाद इस सवाल को सामने लाता है—कहानी ज़रूरी है या संवेदनशीलता? यह फ़िल्म दिखाती है कि सिनेमा में समाज को झकझोरने की ताकत होती है। UP में यह बहस राजनीति, कानून और अभिव्यक्ति की आज़ादी—तीनों की परीक्षा बन गई है।
आपकी राय क्या है—क्या फ़िल्म को बिना रोकटोक दिखाया जाना चाहिए? फरवरी 2026 में यह मामला किस दिशा में जाता है, उस पर सभी की नज़रें टिकी हैं।
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