Rahul गांधी का आरोप: पीएम मोदी ‘सच का सामना करने से डरते हैं’, सांसदों से नहीं
भारत की संसद के गरमाए माहौल में Rahul गांधी ने एक बड़ा राजनीतिक आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सच का सामना करने से डरते हैं। यह बयान फरवरी 2026 के एक तनावपूर्ण सत्र के दौरान आया, जब विपक्ष और सत्तारूढ़ बीजेपी आमने-सामने थे।
Rahul गांधी के इस आरोप ने संसद में हलचल मचा दी। उनका कहना था कि पीएम मोदी संसद से इसलिए नहीं बच रहे क्योंकि विपक्षी सांसद हंगामा कर रहे हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके अपने बयानों का बोझ भारी है। विवाद की जड़ रही अडानी समूह और आर्थिक नीतियों पर गांधी की तीखी टिप्पणी, जिनके बारे में उनका दावा है कि इनसे आम लोगों को नुकसान हो रहा है।
शीतकालीन सत्र के दौरान लगातार विरोध और स्थगन के बीच यह टकराव और तेज हो गया। यह टकराव कांग्रेस और बीजेपी के बीच गहरी खाई को उजागर करता है, जिस पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है।
मुख्य आरोप: मोदी का कथित डर और संसद से दूरी
Rahul गांधी के दावे की पड़ताल: सच से डर या सांसदों से?
Rahul गांधी ने साफ कहा कि प्रधानमंत्री को विपक्षी सांसदों से नहीं, बल्कि सच से डर लगता है। संसद के बाहर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा:
“प्रधानमंत्री मेरे अडानी और क्रोनी कैपिटलिज़्म पर दिए गए बयानों के कारण सदन में आने से डरते हैं। उन्हें हमसे नहीं, सच से डर लगता है।”
यह बयान बीजेपी के उस नैरेटिव को पलटने की कोशिश है जिसमें राहुल गांधी को संसद की कार्यवाही बाधित करने वाला बताया जाता है। गांधी का तर्क है कि असली समस्या मोदी का कठिन सवालों से बचना है। उन्होंने कहा कि पीएम महत्वपूर्ण बहसों से दूर रहते हैं और मंत्रियों को आगे कर देते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह रणनीति प्रधानमंत्री पर जवाब देने का दबाव बनाती है। यदि जवाब नहीं आता, तो छवि “जवाबदेही से बचने वाले नेता” की बन सकती है।
भारतीय राजनीति में तीखे आरोपों का ऐतिहासिक संदर्भ
भारतीय राजनीति में तीखी बयानबाज़ी कोई नई बात नहीं है।
2014 में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर विकास रोकने के आरोप लगाए थे।
2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के दौरान विपक्ष ने सरकार की जल्दबाज़ी पर सवाल खड़े किए।
ऐसे उदाहरण बताते हैं कि संसद में शब्दों की आग अक्सर राजनीतिक समर्थन जुटाने का जरिया बनती है। राहुल गांधी का आरोप अतीत की उन घटनाओं की याद दिलाता है, जब इंदिरा गांधी को 1970 के दशक में अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा था।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि आक्रामक बयान सुर्खियाँ तो बटोरते हैं, लेकिन संसद की गरिमा और जनता के भरोसे को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं।
विवाद के केंद्र में आई टिप्पणियों का विश्लेषण
वे बयान जिनसे कथित तौर पर पीएम मोदी की प्रतिक्रिया आई
Rahul गांधी की टिप्पणी का मुख्य निशाना अडानी समूह का तेज़ उभार रहा। उन्होंने अरबों रुपये के सौदों में कथित पक्षपात का आरोप लगाया और इसे बेरोज़गारी और किसानों की बदहाली से जोड़ा। एक हालिया भाषण में उन्होंने कहा:
“सच यह है कि बड़े उद्योगपति और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि किसान संघर्ष कर रहे हैं — और मोदी इस सच का सामना संसद में नहीं करना चाहते।”
उन्होंने 2023 की हिंडनबर्ग रिपोर्ट का भी ज़िक्र किया, जिसमें अडानी समूह को लेकर सवाल उठे थे, हालांकि भारतीय नियामकों ने बाद में क्लीन चिट दी। गांधी का कहना है कि यह सब शासन में खामियों और शीर्ष स्तर पर मिलीभगत को दर्शाता है।
उन्होंने संसद में अडानी से जुड़े बंदरगाह प्रोजेक्ट्स के दस्तावेज़ भी जमा किए और पूरी बहस की मांग की।
प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रतिक्रिया (या उसकी कमी)
शुरुआत में पीएमओ की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई। प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी के “डर” वाले आरोप पर कुछ नहीं कहा। इसके बजाय, गृह मंत्री अमित शाह ने एक टीवी इंटरव्यू में इसे “सस्ती विपक्षी राजनीति” बताया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसी दिन पीएम मोदी दिल्ली में एक रैली में शामिल हुए, लेकिन संसद में अडानी पर होने वाली बहस से दूर रहे। सदन में सरकार की ओर से कैबिनेट मंत्रियों ने जवाब दिया और मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों को दोहराया।
एनडीटीवी और द हिंदू जैसी मीडिया रिपोर्ट्स में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए गए, जिससे नेतृत्व शैली को लेकर बहस और तेज हो गई।

राजनीतिक असर और विपक्ष की रणनीति
कांग्रेस का ‘डर’ वाला नैरेटिव
कांग्रेस इस नैरेटिव को पूरी ताकत से आगे बढ़ा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह आम मतदाताओं से जुड़ता है, जो जवाबदेही चाहते हैं।
हालिया रैलियों में राहुल गांधी के भाषण के नारे लगाए गए। प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर पीएम मोदी को “असली सवालों से डरने वाला” बताया।
चुनावी झटकों के बाद यह रणनीति कांग्रेस और INDIA गठबंधन को एकजुट करने में मदद कर रही है। कुछ राज्यों में विपक्षी समर्थन में हल्की बढ़त भी देखी गई है।
संसदीय बहस और जवाबदेही पर असर
ऐसे व्यक्तिगत आरोप संसद की कार्यवाही को प्रभावित करते हैं। कई अहम विधेयकों — जैसे बजट या कृषि कानून — पर चर्चा टल जाती है।
संसद में नियम मौजूद हैं:
मुद्दे पर नोटिस देना
स्पीकर द्वारा समीक्षा
बहस के लिए सदन में निर्णय
लेकिन राजनीतिक टकराव अक्सर इन प्रक्रियाओं को बाधित कर देता है। 2026 की बंटी हुई संसद में यह टकराव इन संस्थागत व्यवस्थाओं की परीक्षा ले रहा है।
जनता और मीडिया की प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय मीडिया की व्याख्या
मीडिया इस मुद्दे पर बंटी हुई दिखी।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने गांधी के बयान को “सीधा और साहसी” बताया।
रिपब्लिक टीवी ने इसे “ध्यान खींचने की नाकाम कोशिश” कहा।
इंडिया टुडे के एक त्वरित सर्वे में 45% दर्शकों ने माना कि जवाबदेही के मुद्दे पर गांधी की बात में दम है।

सोशल मीडिया और डिजिटल राजनीति
सोशल मीडिया पर तूफान आ गया।
#ModiAfraidOfTruth और #RahulVsModi जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
कांग्रेस ने मीम्स और वीडियो शेयर किए, वहीं बीजेपी ने पीएम मोदी की पुरानी संसदीय उपलब्धियों के क्लिप्स फैलाए।
एक वायरल ट्वीट में एक युवा एक्टिविस्ट ने लिखा:
“अगर प्रधानमंत्री बहस से बचते हैं, तो सिस्टम पर भरोसा कैसे करें?”
इस ट्वीट को कुछ ही घंटों में 50 हज़ार से ज़्यादा लाइक्स मिले।
नैरेटिव की जंग जारी
Rahul गांधी का यह आरोप कि प्रधानमंत्री मोदी सच का सामना करने से डरते हैं, असल में राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई है। विपक्ष इसे जवाबदेही बनाम बचाव के रूप में देखता है, जबकि बीजेपी इसे महज़ राजनीति बताती है।
तत्काल असर यह है कि Rahul गांधी की छवि एक आक्रामक नेता की बनती है और पीएम मोदी पर संसद में अधिक सक्रिय होने का दबाव बढ़ता है। लंबे समय में यह बहस तय करेगी कि जनता प्रधानमंत्री को मज़बूत नेता मानती है या सवालों से बचने वाला।
जैसे-जैसे संसद सत्र आगे बढ़ेगा, सबकी निगाहें जवाब पर टिकी रहेंगी।
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