विपक्ष की तैयारी: LokSabha अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की परतें
भारत की व्यस्त संसद के भीतर एक ऐसा राजनीतिक तूफ़ान उठ रहा है, जो लोकसभा की नींव तक को हिला सकता है। ज़रा कल्पना कीजिए—विपक्षी दल, अपनी नाराज़गी में एकजुट होकर, LokSabha अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर देते हैं। यह कोई साधारण बहस नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था के केंद्र पर सीधा प्रहार है।
दिल्ली का सियासी माहौल इन दिनों खासा तनावपूर्ण है। बजट चर्चा और कृषि कानूनों में संशोधन को लेकर 2026 की शुरुआत में हुई तीखी झड़पों ने विपक्ष को इस कदम के लिए उकसाया है। उनका आरोप है कि अध्यक्ष ओम बिरला सत्तारूढ़ दल के प्रति झुकाव रखते हैं। यह लेख बताएगा कि यह प्रस्ताव कैसे काम करता है, बिरला पर क्या आरोप हैं, सरकार की रणनीति क्या हो सकती है, और इसका भारत की लोकतांत्रिक सेहत पर क्या असर पड़ेगा।
LokSabha अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया
अध्यक्ष को चुनौती देने के आधार और मिसालें
LokSabha अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना आसान नहीं है। लोकसभा के नियम 198 के तहत, कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है और 14 दिन का नोटिस देना पड़ता है। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि ऐसे कदम जल्दबाज़ी में न उठाए जाएँ।
तो चिंगारी क्या बनी? विपक्ष का आरोप है कि ओम बिरला ने बहस के समय और विधेयकों को पारित कराने में पक्षपात किया। जनवरी 2026 के सत्रों में, उनका कहना है कि आर्थिक सुधारों पर चर्चा जानबूझकर सीमित कर दी गई। विपक्ष के मुताबिक, यह अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका के खिलाफ है।
ऐसे प्रस्ताव बहुत दुर्लभ होते हैं और यह दर्शाते हैं कि सदन में दरार कितनी गहरी हो चुकी है। बिना इस नियम के, अध्यक्ष की शक्तियों पर कोई नियंत्रण न रह जाए।
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कानूनी ढांचा और संवैधानिक जिम्मेदारी-LokSabha
भारतीय संविधान अध्यक्ष की भूमिका को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। अनुच्छेद 94 के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष को केवल सदन के बहुमत से ही हटाया जा सकता है। लेकिन प्रक्रिया सदन के नियमों के तहत ही चलती है।
यह प्रस्ताव उसी संतुलन की परीक्षा है। ओम बिरला, जो 2019 में अध्यक्ष बने और 2024 में फिर चुने गए, पर आरोप है कि उनके फैसले बीजेपी-नीत सरकार के पक्ष में झुके हुए हैं।
इसे एक तरह का “सेफ्टी वाल्व” समझिए। संविधान निष्पक्षता की मांग करता है, क्योंकि अगर अध्यक्ष पर भरोसा टूटता है, तो संसद पर जनता का भरोसा भी डगमगा जाता है।
इतिहास के पन्नों से: लोकसभा अध्यक्षों को चुनौती
इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रस्ताव बहुत कम आए हैं।
1952 में पहले अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ कोशिश हुई, जो बिना वोटिंग के ही खत्म हो गई।
1991 में अध्यक्ष रबी रे के खिलाफ प्रस्ताव आया, लेकिन वह गिर गया।
1999 में जी.एम.सी. बालयोगी के खिलाफ भी प्रयास असफल रहा।
इन उदाहरणों से साफ है कि जब सरकार के पास मजबूत बहुमत हो, तो ऐसे प्रस्तावों की सफलता की संभावना बेहद कम होती है। लेकिन ये प्रस्ताव निष्पक्षता पर सार्वजनिक बहस जरूर छेड़ते हैं।
ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का मामला
पक्षपात और प्रक्रियागत भेदभाव के आरोप
विपक्ष का दावा है कि ओम बिरला सरकार के लिए “ढाल” की तरह काम कर रहे हैं। दिसंबर 2025 में रक्षा विधेयकों को तेज़ी से पारित करने का उदाहरण दिया जा रहा है, जहाँ विपक्ष के संशोधनों को नजरअंदाज कर दिया गया।
एक और बड़ा आरोप है चयनात्मक निलंबन। 2025 के प्रदर्शनों के दौरान 20 से अधिक विपक्षी सांसद निलंबित हुए, जबकि सत्तापक्ष के सांसदों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह साफ पक्षपात है।
इन आरोपों के जरिए विपक्ष एक नैरेटिव गढ़ रहा है, जिसे संसद के बाहर भी भुनाया जा रहा है।

संसदीय मर्यादा बनाए रखने में अध्यक्ष की भूमिका
अध्यक्ष को रेफरी की तरह निष्पक्ष होना चाहिए। नियम कहते हैं कि अध्यक्ष पद संभालने के बाद पार्टी निष्ठा त्यागनी होती है। ओम बिरला, एक अनुभवी बीजेपी नेता, ने यही शपथ ली थी।
लेकिन विपक्ष का कहना है कि 1970 के दशक की संसदीय आचार-संहिता, जिसमें सभी पक्षों को समान अवसर देने की बात है, का पालन नहीं हो रहा। उनका आरोप है कि विपक्षी सवालों पर अध्यक्ष का हथौड़ा जल्दी गिर जाता है।
यह केवल नियमों की बात नहीं, बल्कि भरोसे की भी है। जब अध्यक्ष एकतरफा दिखता है, तो विपक्ष खुद को हाशिये पर महसूस करता है।
विपक्षी एकजुटता और राजनीतिक रणनीति
अब क्यों? INDIA गठबंधन की नजर 2029 के चुनावों पर है। यह प्रस्ताव टीएमसी, डीएमके और कांग्रेस जैसे दलों को एक मंच पर लाता है।
रणनीति साफ है—भले ही प्रस्ताव गिरे, लेकिन इससे महंगाई, बेरोज़गारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सवाल उछलते हैं। इससे मतदाताओं में संदेश जाता है कि विपक्ष लड़ रहा है।
साथ ही, यह ओम बिरला पर दबाव बनाता है कि भविष्य के सत्रों में वे अधिक संतुलित रहें।
सरकार की प्रतिक्रिया और जवाबी रणनीति
कानूनी दलीलें और प्रक्रियागत अड़चनें
बीजेपी इस चुनौती को हल्के में नहीं लेगी। वह नोटिस में तकनीकी खामियां निकाल सकती है—जैसे हस्ताक्षरों की कमी। सचिवालय के नियम सरकार को समय लेने का मौका देते हैं।
संविधान की दृष्टि से सरकार अनुच्छेद 94 का हवाला देगी और कहेगी कि यह प्रस्ताव सदन के कामकाज को बाधित कर रहा है।
यह रणनीति विपक्ष को “अराजक” दिखाने में मदद कर सकती है।
संख्या बल और राजनीतिक संदेश
एनडीए के पास लगभग 303 सीटें हैं, जबकि विपक्ष करीब 230 पर सिमटा है। गणित साफ है—प्रस्ताव का गिरना लगभग तय।
सरकार इसे “स्थिरता पर हमला” बताएगी। प्रधानमंत्री मोदी के बयान और सहयोगी दलों का समर्थन इस नैरेटिव को मजबूत करेगा।
यहाँ संख्या ही निर्णायक है, और फिलहाल सत्ता पक्ष मजबूत स्थिति में है।

विधायी एजेंडा पर असर
यह प्रस्ताव संसद के कैलेंडर को पूरी तरह बदल देता है। फरवरी 2026 में शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े विधेयकों पर चर्चा होनी थी, जो अब टल सकती है।
प्रक्रिया लंबी होती है—बहस, जवाब, और फिर वोटिंग। इस दौरान जरूरी विधेयक लटक जाते हैं।
संसद की रफ्तार धीमी पड़ती है, जिससे आम जनता में निराशा बढ़ती है।
ऐतिहासिक नतीजे और आगे का असर
पिछले अनुभव क्या कहते हैं?
LokSabha रिकॉर्ड बताते हैं कि 1952 से अब तक आए ऐसे किसी भी प्रस्ताव को सफलता नहीं मिली। मजबूत बहुमत ने हमेशा इन्हें कुचल दिया।
1991 में भी, कमजोर सरकार के बावजूद, प्रस्ताव गिर गया था। मौजूदा हालात में बीजेपी की स्थिति और भी मजबूत है।
संभावना? लगभग शून्य। लेकिन राजनीतिक शोर बना रहेगा।
कार्यकाल पर प्रभाव
अगर बिरला प्रस्ताव जीत भी जाते हैं, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल बना रहेगा। विपक्षी बेंचों से लगातार हंगामा और अविश्वास देखने को मिल सकता है।
2029 तक उनका कार्यकाल है, लेकिन यह विवाद उनकी साख को चोट पहुँचा सकता है।
अध्यक्ष और विपक्ष के बीच दूरी और बढ़ेगी, जिससे सत्र और ज्यादा टकरावपूर्ण हो सकते हैं।
लोकतंत्र की सेहत पर बड़ा सवाल
यह टकराव गहरी संस्थागत समस्या की ओर इशारा करता है। 2025 के सर्वे बताते हैं कि 40% भारतीय संसद की निष्पक्षता पर संदेह करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक जैसे योगेंद्र यादव चेतावनी देते हैं कि बढ़ता पक्षपात लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता है।
अगर “रेफरी” ही पक्षपाती लगे, तो लोकतंत्र का खेल ही खतरे में पड़ जाता है।
एक संवैधानिक ड्रामा जारी
किसी मौजूदा LokSabha अध्यक्ष को चुनौती देना असाधारण कदम है। ओम बिरला के मामले में भी कोई आसान मिसाल नहीं है।
सरकार वोटिंग में जीत का दावा करेगी, विपक्ष नैरेटिव की जीत का। असली मुद्दा है—निष्पक्षता।
2026 में यह टकराव तय करेगा कि संसद कितनी मजबूत और भरोसेमंद बनी रहती है।
नज़र बनाए रखिए—आगे जो होगा, वह लोकसभा की दिशा तय कर सकता है।
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