Unnao पीड़िता की सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया:
“अगर मैं निर्भया की तरह मर गई होती, तो शायद इंसाफ जल्दी मिल जाता…”
“अगर मैं निर्भया की तरह मर गई होती, तो शायद इंसाफ जल्दी मिल जाता।”
Unnao रेप पीड़िता के ये शब्द सीधे दिल को चीर देते हैं। पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखने के बाद उन्होंने जो कहा, वह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि भारत की न्याय प्रक्रिया की कड़वी सच्चाई है। यह बयान बताता है कि ज़िंदा रह जाना भी एक लंबी, थकाऊ और दर्दनाक लड़ाई बन जाता है, भले ही अंत में फैसला आपके पक्ष में क्यों न आए।
यह भयावह कहानी 2017 में शुरू हुई थी, जब Unnao की एक नाबालिग लड़की ने कुलदीप सेंगर पर अपहरण और बलात्कार का आरोप लगाया। इसके बाद जो हुआ, वह किसी डरावने सपने से कम नहीं था—धमकियाँ, परिवार पर हमले, न्याय के लिए दर-दर भटकना। पुलिस हिरासत में पीड़िता के पिता की पिटाई के बाद मौत हो गई।
2019 में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सेंगर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे बरकरार रखा और अब, 2026 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा पर अंतिम मुहर लगा दी।
यह लेख पीड़िता की तीखी प्रतिक्रिया, न्याय की लंबी राह और इस फैसले के व्यापक मायनों को समझने की कोशिश करता है।
सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मुहर: कानूनी अध्याय का अंत
सजा और आरोपों की पुष्टि
सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सेंगर पर लगे सभी गंभीर आरोपों को सही ठहराया। इनमें शामिल हैं:
IPC की धारा 363 (अपहरण)
IPC की धारा 376 (बलात्कार)
POCSO एक्ट के तहत नाबालिग से यौन अपराध
आजीवन कारावास की सजा में कोई राहत नहीं दी गई। अदालत ने माना कि 20 मई 2017 की घटना, गवाहों के बयान और मेडिकल सबूत पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय हैं।
यह फैसला उन तमाम कोशिशों पर विराम है, जिनमें सत्ता और रसूख के सहारे सच को दबाने की कोशिश की गई।

उच्च न्यायपालिका की भूमिका
जब आरोपी ताकतवर हो, तब न्याय की राह और कठिन हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि राजनीतिक प्रभाव कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले ही सजा को सही ठहरा चुका था, और अब सर्वोच्च अदालत ने भी उसी लाइन को मजबूत किया।
यह संदेश साफ है—न्याय देर से मिल सकता है, लेकिन अगर सबूत मजबूत हों तो वह रुकता नहीं है।
एक मजबूत कानूनी मिसाल
एक मौजूदा विधायक को उम्रकैद—यह फैसला भविष्य के लिए एक सख्त चेतावनी है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, भारत में हर साल 30,000 से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं, लेकिन सजा की दर बेहद कम है।
Unnao केस उस ट्रेंड को तोड़ता है और बताता है कि ताकतवर अपराधी भी बच नहीं सकते।
पीड़िता की आवाज़: एक दशक की पीड़ा का विस्फोट
“अगर मैं निर्भया की तरह मर गई होती…”
इस एक वाक्य में पूरी व्यवस्था पर सवाल छिपा है। 2012 के निर्भया केस में देशभर में गुस्सा फूटा, कानून बदले, फास्ट-ट्रैक अदालतें बनीं।
लेकिन जो पीड़िताएं ज़िंदा रहती हैं, उन्हें सालों तक संदेह, मीडिया ट्रायल और धमकियों से गुजरना पड़ता है।
पीड़िता का सवाल सीधा है—
क्या इस देश में मर जाना, ज़िंदा रहने से ज्यादा तेज़ इंसाफ दिलाता है?
लंबी कानूनी लड़ाई का मानसिक असर
लगातार कोर्ट में पेशियाँ, मीडिया की नज़रें, जान का डर—यह सब किसी को अंदर से तोड़ देता है।
सुरक्षा के लिए दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा, पहचान छिपानी पड़ी, सामान्य ज़िंदगी पीछे छूट गई।
कानूनी जीत के बाद भी डर खत्म नहीं होता।
यह लड़ाई सिर्फ अदालत की नहीं, हर रात के डर और हर सुबह की चिंता की भी होती है।

दूसरे मामलों से तुलना
Unnao केस की गूंज हाथरस, बिलकिस बानो जैसे मामलों में भी सुनाई देती है।
निर्भया केस में तेजी आई, लेकिन अधिकतर मामलों में इंसाफ सालों लेता है।
देश में बलात्कार के मामलों में सजा की दर करीब 27% है।
Unnao पीड़िता की लड़ाई इन आंकड़ों के बीच उम्मीद की एक मिसाल बनती है।
फैसले के बाद की ज़िंदगी: सुरक्षा, पुनर्वास और चुनौतियाँ
सुरक्षा और पुनर्वास
फैसले के बाद भी पीड़िता और उसके परिवार को सुरक्षा मिली हुई है।
राष्ट्रीय महिला आयोग ने काउंसलिंग, आर्थिक सहायता और पुनर्वास योजनाएँ दी हैं।
सुरक्षा के बिना न्याय अधूरा होता है—यह मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है।
समाज में वापसी की मुश्किल
काम, पढ़ाई और सामान्य जीवन में लौटना आसान नहीं।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है—WHO के अनुसार भारत में प्रति 1 लाख लोगों पर सिर्फ 1 मनोचिकित्सक है।
हर दिन एक नई शुरुआत की कोशिश होती है।
सह-आरोपियों और सिस्टम की भूमिका
सेंगर के भाई और सहयोगियों को भी सजा मिली।
पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया।
लेकिन कई सवाल अब भी बाकी हैं—कितने जिम्मेदार लोग सच में सज़ा पाए?

सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही
संस्थागत विफलता
शुरुआत में पुलिस ने शिकायत दबाने की कोशिश की, पिता को झूठे केस में फँसाया गया।
कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, लेकिन व्यवस्था आज भी पूरी तरह नहीं बदली।
NGOs और सामाजिक संगठनों की भूमिका
मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस केस को ज़िंदा रखा।
आंकड़े बताते हैं कि जिन पीड़ितों को कानूनी और सामाजिक समर्थन मिलता है, उनमें सजा की दर 40% ज्यादा होती है।
डर पैदा करने वाला फैसला?
एक ताकतवर नेता को उम्रकैद—यह फैसला डर पैदा करता है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए तेज़ ट्रायल, मजबूत गवाह सुरक्षा और पीड़ित सहायता जरूरी है।
सहनशक्ति से परिभाषित न्याय
कुलदीप सेंगर की सजा पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर Unnao पीड़िता की असाधारण हिम्मत का सम्मान है।
लेकिन उनका निर्भया वाला बयान हमें याद दिलाता है—
न्याय सिर्फ फैसला नहीं, उसके बाद की ज़िंदगी भी है।
मुख्य बातें साफ हैं:
ताकतवर भी कानून से ऊपर नहीं
ज़िंदा पीड़ितों की लड़ाई ज्यादा कठिन
समर्थन, सुरक्षा और तेज़ न्याय अनिवार्य
अब जिम्मेदारी हमारी है।
अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाइए, पीड़ित सहायता संगठनों का साथ दीजिए।
क्योंकि सुरक्षित कल की शुरुआत आज से होती है।
US के इस दावे के बाद कि प्रधानमंत्री मोदी रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत हो गए हैं, रूस ने दिल्ली का समर्थन किया।
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