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राहुल गांधी पर मानहानि सजा के बाद संसद में घमासान: मीडिया की चुप्पी पर तीखा हमला, BJP सांसद ने सदस्यता रद्द करने की मांग की

भारत की संसद में उस समय राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द करने की मांग उठी। एक ओर 2019 के बयान से जुड़े मानहानि मामले में उनकी सजा का मुद्दा है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी ने मीडिया पर पक्षपातपूर्ण कवरेज का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है। यह पूरा घटनाक्रम कानून, राजनीति और मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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मानहानि मामले की पृष्ठभूमि और अदालत का फैसला

2019 में कर्नाटक के कोलार में एक चुनावी रैली के दौरान राहुल गांधी ने “मोदी सरनेम” को लेकर टिप्पणी की थी। इस बयान के खिलाफ बीजेपी नेता पूर्णेश मोदी ने मानहानि का मामला दायर किया।

23 मार्च 2023 को सूरत की एक अदालत ने राहुल गांधी को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा पाने पर सांसद की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। इसके तुरंत बाद उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई।

यह फैसला भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ, क्योंकि इससे यह संदेश गया कि अदालत का फैसला किसी भी बड़े राजनीतिक नेता पर समान रूप से लागू हो सकता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और कांग्रेस का रुख-BJP

फैसले के तुरंत बाद कांग्रेस ने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई नेताओं ने इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। देश के कई हिस्सों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए।

राहुल गांधी ने कहा कि वे कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे और पीछे नहीं हटेंगे। पार्टी ने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता से जोड़ते हुए व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप दिया।

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कानूनी अपील और राहत

राहुल गांधी ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील दायर की। बाद में उच्चतम न्यायालय से उन्हें राहत मिली और उनकी सजा पर रोक लगाई गई, जिसके बाद उनकी लोकसभा सदस्यता बहाल हो गई।

हालांकि, मूल मामला अब भी कानूनी प्रक्रिया में है। यह पूरा प्रकरण इस बात को रेखांकित करता है कि अदालतों का अंतिम निर्णय राजनीतिक भविष्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

मीडिया कवरेज पर राहुल गांधी का हमला

कथित पक्षपात और “गोदी मीडिया” का आरोप

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कुछ प्रमुख टीवी चैनलों और मीडिया संस्थानों ने उनके खिलाफ एकतरफा माहौल बनाया। उनका कहना था कि सजा की खबर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, लेकिन अपील और कानूनी प्रक्रिया के पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

उन्होंने “गोदी मीडिया” शब्द का इस्तेमाल करते हुए आरोप लगाया कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं और विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा है।

विपक्ष बनाम सत्तारूढ़ दल: कवरेज में अंतर?

राहुल गांधी और कांग्रेस का दावा है कि विपक्षी नेताओं से जुड़े मामलों में मीडिया ज्यादा आक्रामक रुख अपनाता है, जबकि सत्ताधारी दल से जुड़े विवादों में अपेक्षाकृत नरमी दिखाई जाती है।

यह आरोप भारतीय मीडिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर बहस को फिर से तेज कर देता है। कई सर्वेक्षणों में भी यह सामने आया है कि जनता का एक वर्ग मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।

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BJP सांसद की सदस्यता रद्द करने की मांग

मानहानि मामले के शिकायतकर्ता और BJP सांसद पूर्णेश मोदी ने राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने की मांग की। उनका तर्क था कि दोषसिद्धि के आधार पर संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए कड़ी कार्रवाई जरूरी है।

हालांकि, कानूनी राहत मिलने के बाद स्थिति बदली। संसद में किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया नियमों और स्पीकर के विवेक पर निर्भर करती है। इस पूरे मामले ने संसद की कार्यप्रणाली और अधिकारों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया।

2024 चुनावों से पहले राजनीतिक असर

यह प्रकरण केवल एक कानूनी विवाद नहीं रहा, बल्कि 2024 के आम चुनावों से पहले विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन गया।

  • विपक्ष ने इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बताया।

  • BJP ने इसे कानून के पालन और जवाबदेही का मामला कहा।

इस विवाद ने विपक्षी दलों के बीच एकजुटता बढ़ाने में भी भूमिका निभाई।

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जागरूक मतदाताओं के लिए संदेश-BJP

लोकतंत्र में मतदाताओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों में जरूरी है कि:

  • अलग-अलग स्रोतों से खबरें पढ़ें।

  • अदालत के आधिकारिक आदेशों और संसदीय रिकॉर्ड को देखें।

  • तथ्यों की पुष्टि करें और भावनात्मक प्रचार से बचें।

सूचित निर्णय ही लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।

राहुल गांधी की मानहानि सजा, सदस्यता रद्द होना, और फिर कानूनी राहत — इन सबने भारतीय राजनीति में गहरा प्रभाव डाला है। साथ ही, मीडिया की भूमिका और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

यह मामला केवल एक नेता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता-विपक्ष के संतुलन की परीक्षा बन गया है।

आने वाले समय में अदालतों और जनता — दोनों के फैसले इस राजनीतिक अध्याय की दिशा तय करेंगे।

सूत्रों के अनुसार, विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के बाद Om बिरला ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।

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