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US दबाव के चलते 13 देशों ने ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया, ईरान का दावा

ईरान ने दावा किया है कि US के कूटनीतिक दबाव के कारण कम से कम 13 देशों ने ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने से दूरी बनाई या अपने प्रतिनिधिमंडल का स्तर कम कर दिया। यह दावा ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी तस्नीम ने एक वरिष्ठ सूत्र के हवाले से किया है। हालांकि, अमेरिका ने इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और स्वतंत्र रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और अमेरिका तथा ईरान के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। खामेनेई के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में ईरानी नागरिकों के साथ कई देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए, लेकिन कुछ देशों की अनुपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया।

ईरान का क्या दावा है?

US समाचार एजेंसी के अनुसार, US प्रशासन ने अंतिम संस्कार से पहले विभिन्न देशों से संपर्क कर उन्हें समारोह में भाग लेने से हतोत्साहित किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमेरिकी दूतावासों और राजनयिक मिशनों को निर्देश दिए थे कि वे मेजबान देशों को यह संदेश दें कि समारोह में भागीदारी को वॉशिंगटन “मैत्रीपूर्ण कदम” नहीं मानेगा और इसका द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ अफ्रीकी देशों को अमेरिकी विकास सहायता प्रभावित होने की चेतावनी दी गई, जबकि कुछ अरब देशों के नेताओं से भी सीधे संपर्क किया गया। ईरान का कहना है कि इसी दबाव के कारण 13 देशों ने या तो अपनी भागीदारी रद्द कर दी या अपने प्रतिनिधिमंडल का स्तर घटा दिया।

किन देशों का नाम नहीं बताया गया

ईरानी रिपोर्टों में यह नहीं बताया गया कि वे 13 देश कौन-कौन से थे। केवल इतना कहा गया कि इनमें पूर्वी यूरोप, अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र और पूर्वी एशिया के देश शामिल थे। इसी कारण इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं हो सकी है।

US की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं

अब तक US प्रशासन ने इन आरोपों की न तो पुष्टि की है और न ही उनका औपचारिक खंडन किया है। इस कारण यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में ऐसी कोई आधिकारिक कूटनीतिक मुहिम चलाई गई थी या नहीं।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को देखते हुए दोनों पक्ष एक-दूसरे पर इस प्रकार के आरोप लगाते रहे हैं। इसलिए ऐसे दावों का मूल्यांकन स्वतंत्र प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

अंतिम संस्कार में कई देशों की मौजूदगी

इन दावों के बावजूद खामेनेई के अंतिम संस्कार में कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, विभिन्न देशों के सरकारी प्रतिनिधि, संसद अध्यक्ष, मंत्री और धार्मिक नेता तेहरान पहुंचे। समारोह में बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक भी शामिल हुए और इसे देश के हालिया इतिहास के सबसे बड़े सार्वजनिक आयोजनों में से एक बताया गया।

ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन का संकेत बताया, जबकि पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि अधिकांश प्रमुख पश्चिमी देशों के शीर्ष नेताओं ने समारोह में भाग नहीं लिया।

पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक तनाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान का दावा सही साबित होता है तो यह अमेरिका की उस नीति का हिस्सा माना जा सकता है जिसके तहत वह ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग रखने की कोशिश करता रहा है। दूसरी ओर, यदि इन आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने नहीं आते हैं तो यह दावा केवल ईरानी पक्ष का आधिकारिक आरोप माना जाएगा।

हाल के वर्षों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों और सैन्य गतिविधियों को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ मतभेद लगातार बने हुए हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि किसी भी देश के शीर्ष नेता के अंतिम संस्कार में भागीदारी केवल राजनीतिक निर्णय नहीं होती, बल्कि उसमें सुरक्षा, कूटनीतिक प्राथमिकताओं और द्विपक्षीय संबंधों जैसे कई पहलुओं की भी भूमिका होती है।

US pressure led 13 countries to skip Khamenei's funeral in Iran: Reports

इसी कारण किसी देश का प्रतिनिधिमंडल भेजना या न भेजना हमेशा केवल बाहरी दबाव का परिणाम हो, यह आवश्यक नहीं है। हालांकि ईरान ने अपने आरोपों को लेकर विस्तृत जांच या दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए हैं।

ईरान का दावा है कि अमेरिकी दबाव के कारण 13 देशों ने आयतुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भाग नहीं लिया या अपनी भागीदारी सीमित कर दी। दूसरी ओर, अमेरिका ने इन आरोपों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है।

ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम को फिलहाल ईरानी पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जा रहा है। यदि भविष्य में अमेरिका या अन्य संबंधित देशों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया या अतिरिक्त साक्ष्य सामने आते हैं, तो इस मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल यह मुद्दा पश्चिम एशिया की जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों और अमेरिका-ईरान के तनावपूर्ण संबंधों का एक नया अध्याय बनकर उभरा है।

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