President भारत में जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण होने जा रहा है।
केंद्र सरकार ने जन्म और मृत्यु के देर से पंजीकरण की प्रक्रिया को और सख्त बनाने के उद्देश्य से Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 लोकसभा में पेश किया है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 12 अगस्त 2026 तक उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार यह विधेयक अभी लंबित है और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल कानून बन चुका बताना सही नहीं होगा।
यह विधेयक Registration of Births and Deaths Act, 1969 में संशोधन करने के लिए लाया गया है। सरकार का मुख्य उद्देश्य जन्म और मृत्यु की घटनाओं का समय पर पंजीकरण सुनिश्चित करना, सरकारी रिकॉर्ड को अधिक विश्वसनीय बनाना और लंबे समय बाद होने वाले पंजीकरण में संभावित गलतियों या फर्जीवाड़े की गुंजाइश कम करना है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में यह विधेयक पेश किया था।
दो साल से ज्यादा देरी पर न्यायिक जांच
प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू देर से होने वाले पंजीकरण से जुड़ा है। सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि यदि किसी जन्म या मृत्यु की जानकारी घटना के दो साल से अधिक समय बाद दी जाती है, तो उसका पंजीकरण केवल सामान्य प्रशासनिक अनुमति से नहीं किया जा सकेगा। ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी।
सरकार का तर्क है कि जन्म और मृत्यु जैसे महत्वपूर्ण नागरिक रिकॉर्ड में लंबे समय की देरी होने पर रिकॉर्ड की वास्तविकता और प्रमाणिकता की जांच आवश्यक है। लंबे समय बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के मामलों में पहचान, उम्र और स्थान से संबंधित दस्तावेजों की जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी तरह मृत्यु का रिकॉर्ड सही तरीके से दर्ज होना सरकारी योजनाओं, मतदाता सूची और अन्य प्रशासनिक रिकॉर्ड के लिए जरूरी है।
मौजूदा व्यवस्था क्या है?
मौजूदा कानून में भी देरी से जन्म या मृत्यु के पंजीकरण के लिए अलग-अलग स्तर की प्रक्रिया निर्धारित है। वर्तमान व्यवस्था के तहत 30 दिन के बाद लेकिन एक साल के भीतर सूचना देने पर संबंधित अधिकारी की लिखित अनुमति और निर्धारित शुल्क की जरूरत होती है। एक साल से अधिक देरी होने पर सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश और रिकॉर्ड की सत्यता की जांच की आवश्यकता होती है।
2026 का प्रस्तावित संशोधन इसी व्यवस्था को और कड़ा करने की दिशा में है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग जन्म या मृत्यु की जानकारी वर्षों तक लंबित न रखें और महत्वपूर्ण नागरिक रिकॉर्ड समय पर सरकारी डेटाबेस में दर्ज हो जाएं।
जन्म प्रमाणपत्र का बढ़ता महत्व
जन्म प्रमाणपत्र आज केवल जन्म की तारीख का प्रमाण नहीं रह गया है। 2023 के संशोधन के बाद जन्म प्रमाणपत्र को कई महत्वपूर्ण सरकारी और नागरिक सेवाओं में उम्र और जन्मस्थान के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था मजबूत हुई है। इनमें स्कूल में प्रवेश, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता सूची, विवाह पंजीकरण, सरकारी नौकरी और पासपोर्ट जैसे कार्य शामिल हैं।
इसका मतलब है कि बच्चे के जन्म के बाद समय पर पंजीकरण कराना परिवार के लिए बेहद जरूरी है। यदि जन्म प्रमाणपत्र बनने में लंबी देरी होती है, तो भविष्य में बच्चे के स्कूल, पहचान दस्तावेजों और अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़े कामों में अतिरिक्त दस्तावेज और जांच की जरूरत पड़ सकती है।
डिजिटल रिकॉर्ड पर भी जोर
सरकार पिछले कुछ वर्षों से जन्म और मृत्यु पंजीकरण प्रणाली को डिजिटल बनाने पर भी जोर दे रही है। 2023 के संशोधन ने डिजिटल रजिस्ट्रेशन और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत किया। इसके बाद नागरिकों के लिए ऑनलाइन माध्यम से जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में काम किया गया है।
राष्ट्रीय और राज्य स्तर के डेटाबेस को जोड़ने से सरकार को जनसंख्या, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए अधिक सटीक आंकड़े प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। सही जन्म रिकॉर्ड से बच्चों की संख्या, उम्र और क्षेत्रवार जनसंख्या का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। इसी प्रकार मृत्यु का सही रिकॉर्ड स्वास्थ्य व्यवस्था और मृत्यु दर से संबंधित नीतियां तैयार करने में उपयोगी होता है।
फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने की कोशिश
सरकार के अनुसार जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड में सटीकता बढ़ाना प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति का जन्म रिकॉर्ड वर्षों बाद बिना पर्याप्त जांच के तैयार हो जाए, तो गलत उम्र, पहचान या अन्य विवरण दर्ज होने की संभावना पैदा हो सकती है।
मृत्यु के रिकॉर्ड का सही होना भी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका रिकॉर्ड सरकारी डेटाबेस में अपडेट न होने से विभिन्न प्रशासनिक रिकॉर्ड प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सरकार समय पर पंजीकरण को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ देरी से होने वाले मामलों में जांच की व्यवस्था मजबूत करना चाहती है।
आम नागरिकों के लिए क्या संदेश?
इस प्रस्तावित बदलाव का सबसे सीधा संदेश यही है कि जन्म और मृत्यु का पंजीकरण समय पर कराना चाहिए। माता-पिता को बच्चे के जन्म के बाद निर्धारित अवधि में जन्म पंजीकरण पूरा कर लेना चाहिए। इसी तरह परिवार को मृत्यु होने की स्थिति में भी संबंधित रजिस्ट्रार को समय पर सूचना देनी चाहिए।
हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों, प्रवासी परिवारों और उन लोगों के लिए विशेष ध्यान जरूरी होगा जो प्रशासनिक सुविधाओं से दूर हैं। देरी का कारण हमेशा लापरवाही नहीं होता; कई बार जानकारी की कमी, दस्तावेजों का अभाव या स्थानीय प्रशासन तक पहुंच की समस्या भी जिम्मेदार हो सकती है। इसलिए सख्त नियमों के साथ-साथ नागरिकों को सरल प्रक्रिया और पर्याप्त सहायता देना भी महत्वपूर्ण होगा।
2023 और 2026 के बीच अंतर
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि 2023 का संशोधन पहले ही कानून बन चुका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2023 को 11 अगस्त 2023 को मंजूरी दी थी।
इसके विपरीत, 2026 का नया विधेयक अभी प्रस्तावित संशोधन है। इसका उद्देश्य देर से पंजीकरण की प्रक्रिया को और कड़ा करना है, खासकर दो साल से अधिक पुराने मामलों में न्यायिक निगरानी बढ़ाना। उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड में 2026 के बिल को अभी लंबित बताया गया है।
कुल मिलाकर, प्रस्तावित कानून का लक्ष्य भारत की जन्म-मृत्यु पंजीकरण प्रणाली को अधिक सटीक, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना है। यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो लंबे समय बाद जन्म या मृत्यु दर्ज कराने वाले लोगों के लिए प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक औपचारिक और जांच-आधारित हो सकती है। इसलिए नागरिकों के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि जन्म और मृत्यु दोनों का पंजीकरण निर्धारित समय सीमा के भीतर कराया जाए और प्रमाणपत्र को सुरक्षित रखा जाए।

