Himachal प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कांग्रेस सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगाए गए नए ‘विधवा और अनाथ उपकर’ (Widow and Orphan Cess) को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।
सरकार का कहना है कि इस उपकर से जुटाया गया पैसा आर्थिक रूप से कमजोर विधवाओं और अनाथ बच्चों के कल्याण पर खर्च किया जाएगा। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले का विरोध करते हुए इसे आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि यह उपकर 12 अगस्त 2026 से लागू हो गया है और फिलहाल इसकी दर 60 पैसे प्रति लीटर रखी गई है।
क्या है नया ईंधन उपकर?
Himachal सरकार ने पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल पर ‘विधवा और अनाथ उपकर’ लगाने का फैसला किया है। मार्च 2026 में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विधानसभा में इससे संबंधित विधेयक पेश किया था। विधानसभा ने इसे विपक्ष के विरोध और BJP विधायकों के वॉकआउट के बीच पारित किया था। कानून के तहत सरकार को अधिकतम 5 रुपये प्रति लीटर तक उपकर लगाने का अधिकार दिया गया है, जबकि वर्तमान में वास्तविक दर 60 पैसे प्रति लीटर निर्धारित की गई है।
यह सामान्य VAT बढ़ोतरी से अलग है। उपकर से मिलने वाली राशि को विशेष रूप से अनाथों और विधवाओं के कल्याण के लिए इस्तेमाल करने का उद्देश्य रखा गया है। सरकार का कहना है कि इससे इन योजनाओं के लिए एक नियमित और समर्पित वित्तीय स्रोत तैयार होगा।
सरकार का तर्क क्या है?
Himachal मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का तर्क है कि विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए चलाए जा रहे कल्याणकारी कार्यक्रमों को लगातार वित्तीय सहायता की जरूरत होती है। केवल सामान्य बजट पर निर्भर रहने के बजाय एक अलग फंड तैयार करने से इन योजनाओं को स्थायी वित्तीय आधार मिल सकता है।
सरकार चाहती है कि उपकर से प्राप्त धन को एक समर्पित Orphan and Widow Welfare Fund में रखा जाए और उसका इस्तेमाल लक्षित सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में किया जाए। सरकार के अनुसार यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करने में मदद करेगी कि इस मद में जुटाया गया पैसा किसी अन्य उद्देश्य में इस्तेमाल न हो।
सुक्खू ने विधानसभा में यह भी तर्क दिया था कि केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर पहले से ही विभिन्न प्रकार के सेस लगाती है। उन्होंने केंद्र के ईंधन उपकर का उदाहरण देते हुए कहा था कि राज्यों को भी अपने सामाजिक कार्यक्रमों के लिए संसाधन जुटाने के अधिकार होने चाहिए।
आम आदमी पर कितना असर?
फिलहाल 60 पैसे प्रति लीटर का अतिरिक्त भार बहुत बड़ा दिखाई नहीं देता। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति 40 लीटर पेट्रोल भरवाता है तो केवल इस उपकर के कारण लगभग 24 रुपये अतिरिक्त देने होंगे। 50 लीटर डीजल पर यह राशि लगभग 30 रुपये होगी।
लेकिन राजनीतिक विवाद केवल वर्तमान 60 पैसे को लेकर नहीं है। विपक्ष की चिंता इस बात को लेकर भी है कि कानून सरकार को भविष्य में 5 रुपये प्रति लीटर तक उपकर लगाने की अनुमति देता है। इसलिए BJP का सवाल है कि यदि आने वाले समय में दर बढ़ाई गई तो इसका असर वाहन मालिकों, परिवहन कारोबार, किसानों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
BJP क्यों कर रही विरोध?
BJP का सबसे बड़ा तर्क है कि पेट्रोल और डीजल पहले से ही महंगे हैं और इन पर कोई भी अतिरिक्त शुल्क परिवहन लागत बढ़ा सकता है। विधानसभा में विपक्ष ने इस फैसले का विरोध किया और बाद में BJP विधायकों ने वॉकआउट भी किया। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने विशेष रूप से ईंधन कीमतों और महंगाई के दबाव का मुद्दा उठाया।
BJP का तर्क है कि यदि पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो उसका असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता। ट्रकों, बसों, टैक्सियों और अन्य व्यावसायिक वाहनों की परिचालन लागत बढ़ सकती है। इसके बाद परिवहन महंगा होने पर खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव आ सकता है।
विपक्ष का एक अन्य तर्क यह है कि हिमाचल जैसे पर्यटन और परिवहन पर निर्भर राज्य में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पड़ोसी राज्यों से प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है। यदि हिमाचल में ईंधन महंगा हो गया तो कुछ वाहन मालिक पंजाब, हरियाणा या अन्य पड़ोसी राज्यों में ईंधन भरवाने को प्राथमिकता दे सकते हैं। BJP ने विधानसभा में इसी तरह की आशंका जताई थी।
सरकार और BJP के बीच असली राजनीतिक टकराव
इस मुद्दे की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना यह है कि दोनों पक्ष कल्याण और जनता के हित की बात कर रहे हैं, लेकिन रास्ता अलग-अलग है।
सुक्खू सरकार कहती है कि विधवाओं और अनाथ बच्चों जैसे कमजोर वर्गों के लिए पैसा जुटाना जरूरी है और ईंधन पर लगाया गया छोटा उपकर इसके लिए स्थायी स्रोत बन सकता है। वहीं BJP का कहना है कि सामाजिक कल्याण की जिम्मेदारी सरकार के सामान्य बजट से पूरी होनी चाहिए, न कि ईंधन खरीदने वाले हर व्यक्ति पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर।
यानी विवाद सिर्फ 60 पैसे प्रति लीटर का नहीं है। असली सवाल यह है कि सामाजिक कल्याण योजनाओं का वित्तीय बोझ किस पर डाला जाए और सरकार किस तरह अपने राजस्व संसाधनों का इस्तेमाल करे।
क्या लाभार्थियों को भी उपकर देना पड़ेगा?
इस व्यवस्था पर एक दिलचस्प सवाल यह भी उठता है कि यदि कोई विधवा स्वयं वाहन चलाती है या उसके परिवार को ईंधन की जरूरत है, तो वह भी पेट्रोल या डीजल खरीदते समय उपकर देगी। यानी कल्याण योजना के लिए बनाए गए फंड में योगदान समाज के लगभग सभी ईंधन उपभोक्ताओं से आएगा।
सरकार का दृष्टिकोण यह है कि छोटी राशि में व्यापक आधार से धन जुटाकर कमजोर वर्गों के लिए लक्षित सहायता तैयार की जा सकती है। दूसरी तरफ आलोचक इसे अप्रत्यक्ष कर का ऐसा रूप मानते हैं जिसमें उपभोक्ता को अपनी खरीद के साथ अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 12 अगस्त से 60 पैसे प्रति लीटर का उपकर लागू हो चुका है। हालांकि कानून में अधिकतम 5 रुपये प्रति लीटर तक की सीमा रखी गई है। इसलिए आने वाले महीनों में सरकार इस दर को बढ़ाती है या वर्तमान स्तर पर बनाए रखती है, यह राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा।
अगर सरकार इस फंड के उपयोग में पारदर्शिता बनाए रखती है और यह स्पष्ट करती है कि कितनी राशि जुटाई गई तथा कितने अनाथों और विधवाओं को इसका लाभ मिला, तो योजना को सामाजिक समर्थन मिल सकता है। लेकिन यदि ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है और उपकर की दर भी बढ़ाई जाती है, तो विपक्ष का विरोध और तेज होना स्वाभाविक है।
कुल मिलाकर, हिमाचल का नया ईंधन उपकर देश में कल्याणकारी योजनाओं की फंडिंग को लेकर एक बड़ी बहस का उदाहरण बन गया है। सरकार इसे कमजोर वर्गों के लिए समर्पित वित्तीय सुरक्षा का साधन बता रही है, जबकि BJP इसे जनता पर अतिरिक्त कर का बोझ मान रही है। आने वाले समय में इस योजना की असली सफलता इस बात से तय होगी कि इससे जुटाया गया पैसा कितनी पारदर्शिता के साथ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचता है।

