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CJP के सौरव दास और आशुतोष रंका तिहाड़ जेल से रिहा, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं करने का दिया आश्वासन

1. मामले की पृष्ठभूमि

सिविल राइट्स और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले संगठन सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के सौरव दास और आशुतोष रंका की तिहाड़ जेल से रिहाई के बाद मामला चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों ने रिहाई के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं करने का आश्वासन दिया है। दोनों को 23 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना है।

इस घटनाक्रम में गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया, रिहाई की शर्तों और सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन के अधिकार जैसे कई अहम पहलू शामिल हैं। जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन का एक प्रमुख स्थान है, जहां विभिन्न सामाजिक संगठनों, नागरिक समूहों और अन्य संस्थाओं की ओर से अपनी मांगें उठाई जाती रही हैं।

सौरव दास और आशुतोष रंका की रिहाई के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उन्हें किन शर्तों पर छोड़ा गया और आगामी न्यायिक सुनवाई में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

CJP's Saurav Das, Ashutosh Ranka promise no Jantar Mantar protest after Tihar release, to appear before magistrate on Oct 23

2. सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद मिली रिहाई

सौरव दास और आशुतोष रंका को करीब सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद 21 अक्टूबर 2026 को रिहा करने का आदेश दिया गया। दोनों को 14 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में रखा गया था। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत ने पुलिस की ओर से हिरासत आगे बढ़ाने की मांग पर सुनवाई करते हुए उनके लिखित आश्वासन और शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड पर विचार किया।

दिल्ली पुलिस ने अदालत से उनकी न्यायिक हिरासत तीन दिन और बढ़ाने का अनुरोध किया था। पुलिस का तर्क था कि दोनों की रिहाई से सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। वहीं, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने माना कि इस चरण पर शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड और लिखित आश्वासन पर्याप्त हो सकते हैं। इसलिए आगे न्यायिक हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।

अदालत के आदेश के बाद तिहाड़ जेल प्रशासन को रिहाई वारंट भेजा गया और जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने पर दोनों बाहर आ गए। हालांकि, उनकी रिहाई का अर्थ यह नहीं है कि मामले की जांच या न्यायिक कार्यवाही समाप्त हो गई है।

3. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं करने की क्या है शर्त?

रिहाई के लिए दिए गए लिखित आश्वासन का सबसे अहम हिस्सा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से संबंधित है। सौरव दास और आशुतोष रंका ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे और जब तक जंतर-मंतर को कानून के अनुसार दोबारा अधिसूचित करके प्रदर्शन स्थल का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक वहां प्रदर्शन के लिए कोई आह्वान नहीं करेंगे।

दोनों ने अपने आश्वासन में कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी जताई। उन्होंने न्यायपालिका और विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में विश्वास व्यक्त किया।

साथ ही, दोनों ने कहा कि भविष्य में यदि कोई विरोध-प्रदर्शन किया जाता है, तो वह संविधान के दायरे में और कानून के अनुरूप होगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आश्वासन केवल तत्काल रिहाई की औपचारिकता नहीं है, बल्कि अदालत ने इसे अपने आदेश का हिस्सा बनाया है। दोनों को इसके साथ निर्धारित बॉन्ड की शर्तों का भी पालन करना होगा।

CJP's Saurav Das, Ashutosh Ranka promise no Jantar Mantar protest after Tihar release, to appear before magistrate on Oct 23

4. ₹50 हजार के निजी और जमानती बॉन्ड जमा करने का निर्देश

विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट रितु राज ने दोनों नेताओं को जांच की प्रक्रिया पूरी होने तक 50-50 हजार रुपये के निजी बॉन्ड और जमानती बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया। आवश्यक बॉन्ड और जमानतदारों की जानकारी पेश किए जाने के बाद अदालत ने उनकी रिहाई का आदेश दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों को सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर उपस्थित होना होगा। उन्हें शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखनी होगी तथा लिखित आश्वासन और बॉन्ड में दर्ज सभी शर्तों का पालन करना होगा।

इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारी को जमानतदारों के सत्यापन से संबंधित रिपोर्ट अगली सुनवाई पर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। दोनों नेताओं और उनके जमानतदारों को भी निर्धारित तारीख पर अदालत में मौजूद रहना होगा।

इस प्रकार, रिहाई के बाद भी दोनों नेताओं की कानूनी जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हुई हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच और आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रहेगी।

5. आखिर किस मामले में हुई थी गिरफ्तारी?

इस पूरे मामले की शुरुआत 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर आयोजित ‘लेहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन से जुड़ी है। रिपोर्टों के मुताबिक, CJP नेताओं और उनके समर्थकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। यह विरोध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर था।

रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान सौरव दास, आशुतोष रंका और समूह के अन्य सदस्यों ने जंतर-मंतर के बंद बैरिकेड पार किए और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया। पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश किया और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के काम में बाधा पहुंचाई।

इसी घटनाक्रम के बाद दोनों नेताओं को हिरासत में लिया गया और फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने उनकी गतिविधियों और भविष्य में शांति भंग होने की आशंका को देखते हुए हिरासत बढ़ाने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने लिखित आश्वासन और बॉन्ड की शर्तों के आधार पर उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों और अदालत में अंतिम रूप से साबित होने वाले तथ्यों में अंतर होता है। मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही संबंधित आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।

6. 23 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट के सामने होगी अगली पेशी

सौरव दास और आशुतोष रंका के मामले में अगली महत्वपूर्ण तारीख 23 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है। दोनों नेताओं को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में अपने जमानतदारों के साथ पेश होना है। अदालत में पुलिस की ओर से जमानतदारों के सत्यापन की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जानी है।

इस सुनवाई के दौरान अदालत यह देख सकती है कि निर्धारित शर्तों और बॉन्ड से संबंधित औपचारिकताओं का पालन किया गया है या नहीं। साथ ही, मामले की जांच और निवारक कार्यवाही आगे बढ़ेगी।

फिलहाल, यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगली सुनवाई में अदालत क्या निर्णय लेगी। इतना स्पष्ट है कि रिहाई के बावजूद दोनों नेताओं को अदालत के निर्देशों का पालन करना होगा और जांच में सहयोग करना होगा।

7. जंतर-मंतर विवाद और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार पर बहस

यह मामला केवल दो राजनीतिक कार्यकर्ताओं की रिहाई तक सीमित नहीं है। इसके साथ सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार जैसे व्यापक प्रश्न भी जुड़े हैं।

जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न आंदोलनों के लिए विरोध दर्ज कराने का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ऐसे में किसी स्थान को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित या गैर-अधिसूचित किए जाने का मुद्दा सार्वजनिक विरोध के आयोजन पर सीधा प्रभाव डालता है।

एक ओर प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखी जाए। दूसरी ओर, लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाए रखना न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया की प्रमुख चुनौती है।

सौरव दास और आशुतोष रंका ने अपने लिखित आश्वासन में भविष्य के विरोध-प्रदर्शनों को संविधान और कानून के दायरे में रखने की बात कही है। अब आगे की कार्यवाही में यह महत्वपूर्ण होगा कि अदालत की शर्तों का पालन किस प्रकार होता है और संबंधित मामले में जांच क्या निष्कर्ष सामने लाती है।

निष्कर्ष

CJP के सौरव दास और आशुतोष रंका को सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद लिखित आश्वासन और 50-50 हजार रुपये के बॉन्ड की शर्त पर तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया है। दोनों ने जंतर-मंतर के गैर-अधिसूचित प्रदर्शन स्थल बने रहने तक वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करने और सार्वजनिक शांति बनाए रखने का भरोसा दिया है।

अब 23 अक्टूबर को होने वाली पेशी पर नजर रहेगी, जहां दोनों नेताओं को अपने जमानतदारों के साथ उपस्थित होना है और पुलिस को सत्यापन रिपोर्ट पेश करनी है। मामले की जांच जारी है, इसलिए रिहाई को कार्यवाही का अंतिम अंत नहीं माना जा सकता।

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