नई दिल्ली, 18 अप्रैल दिल्ली के जहांगीरपुरी समेत देश के कई हिस्सों में दंगों के बावजूद दोबारा
दिल्ली में भावनाएं भड़काने की कोशिश की गई। विकासपुरी रणहौला के विकास नगर इलाके में रविवार को
रामनवमी की शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें सैकड़ों की तादाद में युवा और किशोर हथियार लहराते हुए शामिल
हुए। शोभायात्रा के दौरान जमकर नारेबाजी और माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई।
खुली तलवारें, चाकू, बेस बॉल
स्टिक, लाठियां और हथौड़े तक लहराते हुए बजरंग दल के समर्थक देखे गए।
इस दौरान बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक सोहन सिंह ने भीड़ को लगातार भड़काने और इलाके में दंगे कराने के
लिए भड़काऊ भाषण दिए। उन्होंने कहा कि जब से यह धरती है तभी से हिंदू है। हिन्दू न कभी पैदा हुआ और न
कभी मरेगा। हिन्दू तो सदा के लिए अजर-अमर है। मरना तो उन्हें पड़ेगा जो पैदा हुए हैं।
इसके बाद उन्होंने कहा
कि देश में एनआरसी लागू करके इन्हें भगाना होगा।
रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों का नाम लेकर वह
लगातार माहौल गरमाने की कोशिश में लगे रहे।
इस दौरान उनके साथ मंच पर कई अन्य हिन्दूवादी संगठनों के
नेता भी उपस्थित रहे।
देश के हालात लगातार तनावपूर्ण होने के बावजूद धर्म और शोभायात्रा के नाम पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की
गई। हैरानी की बात तो ये है कि जिस पुलिस को ऐसे भड़काऊ भाषण देने वाले को गिरफ्तार करके जेल में डालने
की जिम्मेदारी है। वही पुलिस ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुरक्षा में लगी रही। कई जिलों की पुलिस के
संरक्षण में यह शोभायात्रा निकाली गई। जो पुलिस चाकू के साथ पकड़े जाने पर किसी संदिग्ध की हिस्ट्रीशीट
खंगालने लगती है। उसी दिल्ली पुलिस के तमाम अधिकारी और कई थानों के वर्दीधारी चाकू, तलवारें, डंडे और ऐसे
कई हथियार लहराती भीड़ की सुरक्षा कर रहे थे। इस दौरान शोभायात्रा मुस्लिम इलाकों से भी गुजरी।
गनीमत रही
कि ऐसे तनावपूर्ण माहौल में भी कोई बड़ी हिंसक घटना नहीं घटी।
भीड़ भड़काऊ नारेबाजी और इशारे करके माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रही थी। पुलिस के जिम्मेदार अधिकारी
चुप्पी साधे अपनी ड्यूटी बजा रहे थे। ये हाल तब है जब कि दो रोज पहले ही जहांगीरपुरी इलाके में दंगा हो चुका
है। भारी पुलिस फोर्स और अन्य सुरक्षा बलों को इलाके में तैनात किया गया है। दिल्ली पुलिस की ये नाकामी तब
है, जब कि जहांगीरपुरी में दंगों के बाद एक पक्षीय कार्रवाई के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
दिल्ली पुलिस और ऐसे
हिंदूवादी नेता क्या देश को दंगों की आग में ही झोंकना चाहते हैं। आख़िर इनकी नीयत क्या है?
किसी दौर में शोभा यात्राएं सद्भावना और धर्म का संदेश देती थीं। अब ऐसे प्रदर्शनों से क्या संदेश देने की कोशिश
की जा रही है। शोभा यात्राएं किसी भी धर्म,
मजहब या संप्रदाय की हों। क्या इन्हें हथियारों और भड़काऊ भाषणों
की बजाय महापुरुषों की शिक्षाओं,
संदेशों और हाथों में प्यार का प्रतीक फूल लेकर या ऐसे अन्य प्रतीकों के साथ
नहीं निकाला जा सकता? क्या हथियार किसी भी दशा में सद्भाव और प्रेम का प्रतीक हो सकते हैं।
अगर सब कुछ
ऐसे ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियां धर्म की क्या छवि पाएंगी और इससे क्या सीख पाएंगी?
कहीं हम इस
तरह के प्रदर्शन और आयोजनों से इंसानियत को भटकाने का गुनाह तो नहीं कर रहे हैं?

