नई दिल्ली, 02 मई दिल्ली हाई कोर्ट ने निजी एवं सार्वजनिक अस्पतालों में काम करने वाले
कर्मचारियों को मिलने वाले मुआवजे की नीति पर दिल्ली सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार
को 25 मई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
जनवरी में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि कोरोना अनुदान देने में छोटे और बड़े अस्पतालों के स्टाफ में फर्क सही
नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान छोटे नर्सिंग होम के डॉक्टरों और
पैरामेडिकल स्टाफ ने भी हजारों मरीजों का इलाज किया। ऐसे में छोटे नर्सिंग होम और दिल्ली सरकार द्वारा
अधिग्रहित अस्पतालों में काम करने वालों के बीच आर्थिक राहत देने के मामले में फर्क करना सही नहीं है।
कोर्ट ने
कहा था कि छोटे नर्सिंग होम की कम क्षमता होने की वजह से उन्हें अधिगृहित नहीं किया गया।
लेकिन यह भी
तथ्य है की ऐसे नर्सिंग होम में काम करने वाले डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी खुद को कोरोना से संक्रमित
होने के खतरे में डाल रहे थे और उनकी जान भी जा रही थी।
दरअसल हाई कोर्ट जून 2020 में कोरोना की पहली लहर के दौरान एक डॉक्टर की मौत से संबंधित मामले की
सुनवाई कर रहा है। मृत डॉक्टर हरीश कुमार की पत्नी की याचिका में कहा गया है कि उनके पति जीटीबी नगर के
न्यू लाइफ अस्पताल में कार्यरत थे और कोविड ड्यूटी दे रहे थे। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने याचिकाकर्ता से
पूछा की क्या उन्होंने दिल्ली सरकार की ओर से फ्रंटलाइन वर्कर्स को दी जाने वाली अनुदान राशि के लिए आवेदन
किया था और उन्हें कोई राशि मिली।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने इसके लिए आवेदन दिया था लेकिन ने कोई
राहत नहीं मिली।

