Bihar विधानसभा चुनाव 2025: प्रशांत किशोर की शिक्षा यात्रा और शुरुआती जीवन – रणनीतिकार की बुनियाद
कल्पना कीजिए एक ऐसे व्यक्ति की, जो चुनावी अफरातफरी को योजनाबद्ध जीतों में बदल देता है। वही हैं प्रशांत किशोर—PK के नाम से मशहूर। Bihar के 2025 विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, उनका नाम हर ओर सुनाई देता है। वोटर सोचते हैं कि आखिर यह सादगीभरे पृष्ठभूमि वाला रणनीतिकार राजनीति का खेल कैसे बदल देता है। PK सिर्फ़ एक नाम नहीं—वे भारतीय राजनीति में बड़े बदलावों के दिमाग हैं। और उनकी कहानी चुनावों से बहुत पहले शुरू होती है। उनका शुरुआती जीवन और शिक्षा—उन्हीं ने उनकी तीक्ष्ण सोच की नींव रखी।
यह चुनाव जबरदस्त टक्कर वाला है। Bihar जैसे अप्रत्याशित राज्य में पार्टियाँ वोटरों को मनाने में जुटी हैं। PK की भूमिका? वे ऐसी रणनीतियाँ बनाते हैं जो करोड़ों वोटरों को प्रभावित करती हैं। लेकिन 2025 में उनकी योजनाओं को समझने के लिए उनके अतीत को जानना ज़रूरी है। उनकी शिक्षा यात्रा और शुरुआती जीवन बताते हैं कि वे वोटर की नब्ज़ इतनी आसानी से कैसे पकड़ लेते हैं।
तो अभी क्यों जानें ये बातें? क्योंकि 2025 के Bihar चुनाव रणनीति पर टिके होंगे, और PK का छोटा-शहर से वैश्विक सोच तक का सफर यह समझाता है कि वे कैसे काम करते हैं। चलिए देखते हैं वह आधार जिसने उनके आज के प्रभाव को गढ़ा।
बचपन: जड़ें और शुरुआती प्रभाव
PK की कहानी Bihar की धरती से शुरू होती है—जहाँ विचारों से प्रेम रखने वाला एक लड़का भविष्य का बड़ा राजनीतिक दिमाग बना।
बक्सर में जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
प्रशांत किशोर का जन्म 1977 में बक्सर ज़िले के बनियांपुर गाँव में हुआ। गाँव का सामान्य जीवन—खेती-किसानी और छोटे व्यापारों की दुनिया—इन्हीं के बीच वे बड़े हुए।
उनके पिता डॉक्टर थे, जिससे PK को बचपन से ही लोगों की समस्याओं को नज़दीक से देखने का मौका मिला। बक्सर की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
घर में आम जनता की परेशानियों पर चर्चा होती थी। वहीं से PK का मन समस्याओं को हल करने वाले कामों की ओर झुक गया। परिवार में मेहनत और ईमानदारी की सीख दी जाती थी। कोई विलासिता नहीं, लेकिन मजबूत समर्थन मिला। यही जड़ें आज भी उन्हें जमीन से जोड़े रखती हैं—चाहे 2025 की बिहार चुनावी जंग ही क्यों न हो।

शुरुआती पढ़ाई और अकादमिक चमक
PK की शिक्षा बक्सर के स्थानीय स्कूलों में शुरू हुई। शुरुआत से ही वे सवाल पूछने और विश्लेषण करने में आगे रहे।
मिडिल स्कूल तक आते-आते वे बहस और तर्क में निपुण हो चुके थे। गणित और विज्ञान उनके पसंदीदा विषय बन गए। दोस्तों और शिक्षकों की नज़र में वे वह छात्र थे जो चीज़ों को अलग ढंग से सोचता था।
यही दौर था जब उनके भीतर पैटर्न समझने और विश्लेषण की क्षमता बढ़ी—जो आगे चलकर चुनावी डेटा और वोटर बिहेवियर समझने में बहुत काम आई।
इंजीनियरिंग की ओर कदम: करियर की बदलती दिशा
किशोरावस्था में PK ने इंजीनियरिंग को चुना—तर्क, संरचना और समस्या-समाधान का संसार।
उन्होंने भुवनेश्वर के College of Engineering & Technology में प्रवेश लिया। यह उनके जीवन का बड़ा बदलाव था—पहली बार गाँव से बाहर, पहली बार विविध पृष्ठभूमि के साथियों के बीच।
इंजीनियरिंग ने उन्हें जटिल समस्याओं को टुकड़ों में बाँट कर हल करना सिखाया—यह सोच आगे जाकर उनकी चुनावी रणनीतियों की रीढ़ बनी।
उच्च शिक्षा: इंजीनियरिंग से पब्लिक हेल्थ तक
इंजीनियरिंग के बाद उनका सीखने का सफ़र रुका नहीं। उन्होंने तकनीक को समाज के साथ जोड़ने का रास्ता चुना।
इंजीनियरिंग डिग्री और शुरुआती नौकरी
PK ने 2000 के शुरुआती दशक में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन में डिग्री पूरी की। पहले कुछ वर्ष उन्होंने फार्मा क्षेत्र में काम किया, जिसमें उन्हें देशभर में घूमना पड़ा। इस दौर ने उनकी संवाद क्षमता और लोगों से जुड़ने की कला को निखारा।
लेकिन उन्हें लगा कि यह काम सीमित प्रभाव वाला है—वे समाज पर बड़े स्तर पर काम करना चाहते थे।

अंतरराष्ट्रीय पब्लिक हेल्थ की ओर झुकाव (USA)
इसके बाद वे पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका गए। इस क्षेत्र में डेटा, जनसांख्यिकी और सामुदायिक समस्याओं का मिश्रण होता है—जो उनके विश्लेषणात्मक दिमाग को खूब जँचा।
यहाँ उन्होंने बड़े पैमाने पर आबादी को समझने, पैटर्न पकड़ने और समाधान बनाने की कला सीखी—वही कला जो आज चुनावों में उनकी खास पहचान है।
संयुक्त राष्ट्र और WHO: वैश्विक अनुभव
डिग्री के बाद PK ने UN और WHO के साथ विभिन्न देशों में पब्लिक हेल्थ प्रोजेक्ट्स पर काम किया।
उन्होंने अफ्रीका और एशिया में जमीनी सर्वे, डेटा मैनेजमेंट और प्रोजेक्ट नेतृत्व जैसे कार्य संभाले। यह दौर उनके लिए निर्णायक साबित हुआ।
यहाँ वे सीखे—
बड़े समूहों के व्यवहार का अध्ययन
आंकड़ों की सही व्याख्या
रणनीति बनाकर उसका क्रियान्वयन
चुनावी क्षेत्र में इन कौशलों ने चमत्कार किया।
भारत वापसी: वैश्विक रणनीति का स्थानीय इस्तेमाल
2014 लोकसभा चुनाव: PK की धमाकेदार एंट्री
2012 में वे भारत लौटे और नरेंद्र मोदी की रणनीतिक टीम से जुड़ गए।
यहाँ उन्होंने:
“चायवाला” कथा
बूथ-स्तर युवा अभियान
डेटा आधारित वोटर आउटरीच
जैसी योजनाएँ तैयार कीं।
2014 में BJP की भारी जीत के बाद PK का काम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया।

I-PAC की स्थापना: आधुनिक चुनावी रणनीति का जन्म
चुनाव 2014 के बाद उन्होंने Indian Political Action Committee (I-PAC) बनाई।
यह भारत में डेटा-ड्रिवन कैंपेनिंग की शुरुआत थी।
तरीके:
माइक्रो सर्वे
ग्राउंड इंटेलिजेंस
डिजिटल नैरेटिव बिल्डिंग
I-PAC ने चुनाव प्रबंधन को प्रोफेशनल रूप दिया।
शुरुआती जीतें और PK की खास रणनीतियाँ
PK ने बिहार 2015 में महागठबंधन को जीत दिलाई।
फिर पंजाब में कांग्रेस को जीत मिली।
यह सब उनकी विधियों का असर था—
बूथ मैपिंग
जनभावना सर्वे
डिजिटल माइक्रो-टार्गेटिंग
मुद्दों के इर्द-गिर्द कहानी गढ़ना
इन्होने PK को “चुनाव के डॉक्टर” का दर्जा दिलाया।
2025 के लिए खाका: PK की यात्रा कैसे बनेगी हथियार
PK का अतीत सिर्फ कहानी नहीं—2025 के बिहार चुनाव के लिए मार्गदर्शक है।
डेटा एनालिसिस: पब्लिक हेल्थ का चुनावी रूप
जैसे महामारी का ग्राफ पढ़ा जाता है—वैसे ही PK वोटर ट्रेंड पढ़ते हैं।
उनकी रणनीति डेटा पर टिकी होती है—न कि भावनाओं पर।
ग्राउंड वर्क + टॉप लेवल रणनीति का मिश्रण
UN के समय की जमीनी समझ और अमेरिका वाली शीर्ष रणनीति—जब दोनों मिलती हैं तो PK की खास शैली बनती है।
यह तरीका बिहार में खास असर करता है।
विशेषज्ञों की नजर में PK
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं:
“सड़क की नब्ज़ और डेटा दिमाग—PK इन्हें जोड़ते हैं।”
2014 से 2025 तक PK का सफर उन्हें चुनावी खेल का “किंगमेकर” बनाता है।

एक रणनीतिकार की शिक्षा का स्थायी प्रभाव
PK की जीवन यात्रा—बक्सर की गलियों से लेकर UN की मीटिंग रूम तक—एक अनोखा मिश्रण है।
गाँव की सादगी
इंजीनियरिंग की तर्कशक्ति
विदेश में पब्लिक हेल्थ की विश्लेषण कला
UN का जमीनी अनुभव
भारतीय राजनीति का परीक्षण
इन सबने उन्हें ऐसा रणनीतिकार बनाया है जो पैटर्न पहचानने में माहिर है।
2025 के Bihar विधानसभा चुनाव में उनकी यही बुनियाद नई चालें लाएगी।
Tejashwi यादव का आरोप है कि एनडीए बिहार चुनाव नतीजों में हेरफेर कर सकता है
Follow us on Facebook

