Bihar चुनाव 2025
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरण पहले ही जटिल हो चले हैं। मुख्य गठबंधन — NDA और महागठबंधन — अपने-अपने समीकरण कस चुके हैं। इस बीच, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भाजपा नेतृत्व को अपनी अपेक्षित उम्मीदवार सूची (टिकट सूची) सौंपने का दावा किया है। उनके इस दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह संकेत देता है कि NDA में HAM की भूमिका सिर्फ सहायक नहीं बल्कि निर्णायक बनने की हो सकती है।
नीचे हम इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करते हैं:
पृष्ठभूमि: मांझी, HAM एवं बिहार राजनीति
मांझी की मांगें और दावे
NDA में सीट बंटवारे की जटिलताएँ
मांझी द्वारा सूची सौंपने का राजनीतिक संकेत
संभावित चुनौतियाँ और विपक्ष की प्रतिक्रिया
रणनीतिक असर और चुनावी नतीजों पर प्रभाव
निष्कर्ष और संभावित भविष्य
पृष्ठभूमि: मांझी, HAM और बिहार की राजनीति
जीतन राम मांझी और HAM की स्थिति
जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति में एक विवादित और ध्रुवीकरणकारी व्यक्तित्व रहे हैं। वे पहले मुख्यमंत्री भी बने थे तथा दल-बदल राजनीति के एक उदाहरण के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM / HAM (Secular)) की स्थापना की, जो मुख्य रूप से दलित और पिछड़ा वर्ग वोटबैंक पर दावा करती है।
पिछले चुनावों में HAM की सफलता सीमित रही। उन्हें 2020 विधानसभा चुनावों में कुछ सीटें मिली थीं, लेकिन राज्यव्यापी असर नहीं बन पाए। इसलिए 2025 में मांझी की रणनीति अधिक महत्वाकांक्षी दिख रही है — वे HAM को एक राज्य स्तरीय दल बनाना चाहते हैं।
कुछ प्रमुख पृष्ठभूमि बिंदु:
उन्होंने पहले कहा कि HAM को 20 से अधिक सीटों की जरूरत है, ताकि पार्टी विधानसभा में अपनी आवाज़ रख सके।
जुलाई 2024 में उन्होंने दावा किया था कि वे कम से कम 25 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, और उनकी तैयारी 75-100 सीटों तक की है।
HAM ने पहले ही एक प्रत्याशी की घोषणा कर दी है — पूर्णिया जिले के कस्बा (Kasba) से राजेंद्र यादव।
दूसरी ओर, HAM ने पहले भी आरोप लगाया है कि उन्हें NDA में उपेक्षा किया जा रहा है — उन्हें कम सीटें दी जाने की बात पर विरोध जताया है।
इस पृष्ठभूमि में, मांझी का भाजपा आलाकमान को सूची सौंपने का दावा एक रणनीतिक पहल माना जाना चाहिए।

मांझी की मांगें और दावे
सीटों की मांग और न्यूनतम स्वीकार्य स्तर
एक प्रमुख बिंदु है कि मांझी ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि उन्हें न्यूनतम स्तर की सीटें नहीं मिलीं, तो HAM गठबंधन छोड़ सकती है या चुनाव नहीं लड़ सकती। उन्होंने कहा है:
“15 सीटों से कम मंजूर नहीं” — यदि NDA उन्हें इतनी सीट नहीं देता, तो यह स्वीकार्य नहीं होगा।
“15 सीटें नहीं मिलीं तो चुनाव नहीं लड़ेंगे” — यह चेतावनी उन्होंने गठबंधन को दे दी है।
इस बिंदु तक कि उन्होंने कहा है कि “जो कहेंगे मानना ही पड़ेगा …”, यानी अंतिम निर्णय BJP और राष्ट्रीय नेतृत्व का होगा।
यानि मांझी अपनी पार्टी की प्रतिष्ठा बनाए रखना चाहते हैं — कि HAM सिर्फ एक गुलाम सहयोगी नहीं है, बल्कि गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी वाली पार्टी है।
सूची सौंपने का दावेदार पक्ष
मांझी ने संकेत दिया है कि उन्होंने भाजपा आलाकमान को अपनी अंतिम उम्मीदवार सूची (ticket list) सौंप दी है। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने न सिर्फ मांगें रखीं, बल्कि एक प्रस्तावित सूची तैयार कर दी है — यह एक दबाव भी है और एक दिखावा कि वे गठबंधन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
यह दावा यह दर्शाता है:
HAM ने संभावित सीटें और उम्मीदवार पहले से तय कर लिए हैं — यह तैयार रणनीति का संकेत है।
यह सूची भाजपा को झुकाव में ला सकती है, यदि भाजपा चाहता है कि HAM न सिरे से नाराज हो।
यह कदम अन्य NDA दलों, जैसे JDU, LJP आदि को चेतावनी देता है कि HAM को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
NDA में सीट बंटवारे की जटिलताएँ
NDA में सीट बंटवारे की प्रक्रिया हर चुनाव में तनावपूर्ण रही है। बिहार में यह और भी जटिल हो जाती है क्योंकि:
BJP, JDU और अन्य सहयोगी दल (जैसे HAM, LJP(RV) आदि) के बीच वोट बैंक, क्षेत्रीय प्रभुत्व, जातिगत संतुलन की मांगें बड़ी होती हैं।
अधिक दबाव डालने वाले सहयोगी दलों को उचित हिस्सेदारी देना, ताकि वे न नाराज़ हों या गठबंधन से बाहर न निकलें।
सीटों की संख्या सीमित है, और प्रत्येक दल चाहता है कि वह अधिक सीटों पर उम्मीदवार दे ताकि उसकी शक्ति बढ़े।
पूर्व अनुभवों में भी साझेदार दलों ने सीट बंटवारे पर नाराज़गी जताई है, और सीटों की मांगें बढ़ाई हैं।
स्थानीय स्तर पर, हर सीट की सुरक्षा स्तर, प्रत्याशी की जमीनी लोकप्रियता, अंतिम चुनावी प्रदर्शन आदि पर विचार किया जाता है।
मांझी का यह दावा कि उन्होंने सूची सौंप दी है, इस पूरे तनाव को और बढ़ा सकता है, क्योंकि यह सुझाव देता है कि HAM अब रक्षात्मक कदम नहीं बल्कि आक्रमक कदम उठा रही है।

मांझी द्वारा सूची सौंपने का राजनीतिक संकेत
यह दावा सिर्फ एक तकनीकी कदम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत है। इसके कुछ महत्वपूर्ण अर्थ हैं:
घटक नहीं बल्कि साझेदार बनने की आकांक्षा
मांझी यह दिखाना चाह रहे हैं कि HAM केवल गठबंधन का छोटा घटक नहीं है, बल्कि वह निर्णायक भूमिका लेना चाहता है। सूची सौंपने का मतलब है कि उन्होंने “इसकी भूमिका” तय कर ली है।दबाव की रणनीति
इस तरह का दावा भाजपा नेतृत्व पर दबाव डालने की कोशिश है — “हमें या तो हमारी मांगें मानो या हम विकल्प देखेंगे।” यह गठबंधन को मजबूर कर सकता है कि HAM को बेहतर हिस्सेदारी दी जाए, ताकि वह नाराज़ होकर गठबंधन से बाहर न हो जाए।लोक-प्रमोचन (public signaling)
घोषणा सार्वजनिक रूप से की जा रही है ताकि HAM समर्थकों और जनता में यह संदेश जाए कि उनकी पार्टी सक्रिय भूमिका निभा रही है, हार मानने वाली नहीं है। यह पार्टी की छवि को मजबूत करता है।आगे की बातचीत को शक्ति‑स्थित करना
यदि भाजपा आलाकमान द्वारा सूची स्वीकार की जाती है — अर्थात वह HAM की सूची को अधिकांश रूप से स्वीकार करता है — तो यह HAM के लिए एक जीत होगी। यदि नहीं, तो HAM के पास नैतिक आरोप लगाने का आधार होगा कि गठबंधन ने उसका नियम उल्लंघन किया।
संभावित चुनौतियाँ और विपक्ष की प्रतिक्रिया
चुनौतियाँ
स्वीकृति का दबाव
भाजपा नेतृत्व या अन्य NDA दल HAM की सूची को स्वीकार न करें। यदि सूची खारिज हो जाए, तो HAM की मांगें और नाराज़गी बढ़ सकती है।घोटाले और झड़प
यदि HAM की सूची में विवादित उम्मीदवार हों या उन सीटों का विरोध हो जहां JDU या BJP ने पहले से दावेदारी जताई थी, तो अंदरूनी संघर्ष हो सकते हैं।विश्वसनीयता का प्रश्न
यदि सूची और दावे को सार्वजनिक कर दिया जाए लेकिन अंतिम रूप से सूची न मानी जाए या बहुत बदलाव हो, तो HAM की छवि को क्षति हो सकती है — “दावा बनाम हकीकत” की खाई दिखाई दे सकती है।समर्थकों का दबाव
HAM कार्यकर्ता और समर्थक अपेक्षा करेंगे कि सूची में उनके प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। यदि कहीं छूट हो, समर्थन टूट सकता है।वोट विभाजन का खतरा
यदि HAM कुछ सीटें न मिले और वह उम्मीदवार खड़ा कर दे, तो NDA के वोट विभाजित हो सकते हैं, लाभ विपक्ष को मिल सकता है।
विपक्ष एवं अन्य दलों की प्रतिक्रिया
महागठबंधन / RJD और अन्य दल HAM के दावों को “स्वार्थी” या “गठबंधन धुरी बदलने की रणनीति” कह सकते हैं।
यदि HAM कहीं अपना उम्मीदवार उतारे, विपक्ष इसका उपयोग कर सकेगा कि गठबंधन मजबूत नहीं है।
अन्य NDA दलों जैसे JDU या LJP(RV) नाराज़ हो सकते हैं कि HAM अधिक हिस्सेदारी मांग रहा है, और दबाव डालने की कोशिश कर रहा है।
वो कह सकते हैं कि HAM को “जमीनी समर्थन” साबित करना चाहिए, न कि दावा करना चाहिए।

रणनीतिक असर और चुनावी नतीजों पर संभावित प्रभाव
HAM के लिए लाभ
यदि HAM को सूची स्वीकार होती है और प्रत्याशी जीतते हैं, तो HAM विधानसभा में अच्छी संख्या में विधायक भेज सकती है, जिससे उनकी भूमिका बढ़ेगी।
HAM का दायरा बढ़ सकता है — वे सिर्फ “सहयोगी” नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति बन सकते हैं।
यदि उनकी सूची सार्वजनिक रूप से स्वीकार न हो, तो HAM को एक न्यायसंगत समझौते न मिलने का नैतिक और राजनीतिक दायरा मिलता है।
NDA के लिए जोखिम और रणनीति
यदि HAM नाराज़ हो जाए, NDA गठबंधन में दरार आ सकती है। इसका असर सीटों पर हो सकता है और गठबंधन की मजबूती पर।
BJP और JDU को यह ध्यान रखना होगा कि HAM को उपेक्षित न करें क्योंकि उस से समर्थक तिरछे हो सकते हैं।
गठबंधन को यह सुनिश्चित करना होगा कि HAM और अन्य दलों की मांगों को संतुलित तरीके से देखते हुए सीट बंटवारा किया जाए — अधिक हिस्सेदारी देने का जोखिम है, लेकिन गठबंधन टूटने का जोखिम भी है।
चुनावी नतीजों पर प्रभाव
यदि HAM कुछ “तह” सीटें जीत लेती है, तो NDA को बहुमत की ओर बढ़ने में मदद मिल सकती है।
यदि HAM की मांगें न मानी जाएँ और वे सीट लड़ने का विकल्प चुनें, तो NDA के वोट बंट सकते हैं, जिससे विपक्ष को लाभ हो सकता है।
HAM की छवि और दावों की सार्वजनिक स्वीकार्यता मतदाताओं पर असर डाल सकती है — “हिस्सेदारी के लिए लड़ता दल” बनना या “मांग पर जोर देने वाला दल” बनना।
संभावित भविष्य
जीवन में राजनीति में दावों और कार्रवाई के मध्य संतुलन महत्वपूर्ण है। जीतन राम मांझी द्वारा भाजपा आलाकमान को अंतिम उम्मीदवार सूची सौंपने का दावा इस संतुलन को बदलने की कोशिश है — यह एक दबाव रणनीति, एक प्रतिज्ञा और एक राजनीतिक संकेत है कि HAM अब छोटा घटक नहीं है।
मुख्य बातें:
मांझी की मांगें (15 सीटों से कम न स्वीकार करना आदि) यह दिखाती हैं कि HAM इस चुनाव में अपना अस्तित्व साबित करना चाहता है।
सूची सौंपने का दावा यह संकेत देता है कि HAM विकल्पों में से नहीं है, बल्कि गठबंधन की दिशा निर्धारक बनने की कोशिश कर रहा है।
NDA के भीतर सीट बंटवारे की जटिलताएँ इस दावे को और अधिक विवादात्मक बनाती हैं, और विरोध तथा आंतरिक टकराव संभव हैं।
यदि HAM की सूची स्वीकार हो जाए और उम्मीदवार जीतें, तो इसका प्रभाव सिर्फ चुनाव नतीजों तक नहीं, बल्कि अगले राजनीतिक समीकरणों तक होगा।
लेकिन यदि दावे और वास्तविकता के बीच अंतर रह जाए, HAM की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
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