Bihar चुनाव 2024: बाबर, औरंगज़ेब और ओसामा से गर्म हुआ चुनावी मैदान
ज़रा सोचिए — Bihar की चुनावी रैली में जब नेता इतिहास के नामों को हथियार की तरह फेंक रहे हैं। बाबर, औरंगज़ेब, यहाँ तक कि ओसामा — ये नाम 2024 के बिहार चुनावों में गूंज रहे हैं। मतदाता देख रहे हैं कि कैसे पुरानी दुश्मनियाँ और धार्मिक प्रतीक आज के मुद्दों को ढँक देते हैं। नौकरियों और सड़कों की बात पीछे छूट जाती है, और भावनाएँ हावी हो जाती हैं। यही दिखाता है कि भारत की राजनीति में भावनाएँ कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए हैं।
योगी आदित्यनाथ का विवादित बयान और राजनीतिक प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने Bihar की एक रैली में आग भड़काने वाला बयान दिया। उन्होंने एक उम्मीदवार, ओसामा शहाब, को निशाना बनाते हुए कहा — “ओसामा शहाब अपने नाम पर खरे उतरते हैं।”
भीड़ ने तालियाँ बजाईं, लेकिन बयान ने विवाद खड़ा कर दिया। योगी ने बिना सीधे बोले उम्मीदवार के नाम को ओसामा बिन लादेन से जोड़ दिया — एक ऐसा नाम जो आतंक और डर की याद दिलाता है।
विपक्ष ने तुरंत हमला बोला। कांग्रेस ने इसे घृणास्पद भाषण बताया। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि यह असली मुद्दों — बाढ़, बेरोज़गारी, किसानों की हालत — से ध्यान भटकाने की कोशिश है। कुछ भाजपा सहयोगियों ने भी चिंता जताई कि यह मध्यम वर्ग के मतदाताओं को दूर कर सकता है। पटना में विरोध प्रदर्शन हुए और माफ़ी की मांग उठी। एक लाइन ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया।
“ओसामा शहाब अपने नाम पर खरे उतरते हैं” — इसका मतलब क्या?
योगी के शब्दों में गहरी राजनीति छिपी है। “ओसामा” नाम आतंक और हिंसा की याद दिलाता है। इसे उम्मीदवार शहाब से जोड़ना एक प्रतीकात्मक हमला है। शहाब खुद शिक्षा सुधार और युवाओं की नौकरियों पर बात कर रहे हैं, लेकिन यह बयान उन्हें “खतरा” दिखाने की कोशिश करता है।

बीजेपी समर्थक इसे “सच्चाई कहने” की हिम्मत मानते हैं, जबकि विपक्ष इसे डॉग-व्हिसल पॉलिटिक्स — यानी परोक्ष रूप से सांप्रदायिक संदेश — बताता है। कानूनी विशेषज्ञ भी बहस कर रहे हैं कि क्या यह मानहानि या नफरत फैलाने वाला भाषण है।
चुनावी बयानबाज़ी में बढ़ती ध्रुवीकरण की राजनीति
ऐसे बयान मतदाताओं को “हम बनाम वो” में बाँट देते हैं। Bihar जैसे राज्य में, जहाँ हिंदू-मुस्लिम साथ रहते हैं, यह तुरंत असर डालता है। रोजगार और विकास जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, और पहचान की राजनीति आगे आ जाती है।
2019 के उत्तर प्रदेश चुनावों में भी इसी तरह की भाषा से बीजेपी को फायदा मिला था। मगर अब नीतीश कुमार की पार्टी के नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह शहरी युवाओं को नाराज़ कर सकता है। हालिया CSDS सर्वे बताता है कि 40% मतदाता ऐसी बातों से “ध्रुवीकृत” महसूस करते हैं। यह अल्पकालिक लाभ तो देता है, लेकिन समाज में दीर्घकालिक दरारें छोड़ जाता है।
ऐतिहासिक नामों का चुनावी इस्तेमाल: बाबर और औरंगज़ेब फिर चर्चा में
Bihar के 2024 चुनावों में बाबर और औरंगज़ेब सबसे ज़्यादा उछाले जा रहे नाम हैं। बीजेपी नेताओं के लिए ये “आक्रमणकारियों” के प्रतीक हैं। एक रैली में कहा गया, “बाबर के वंशजों को बिहार पर हुकूमत न करने दें।”
इस तरह की बातें सीधे तौर पर मुस्लिम उम्मीदवारों को निशाना बनाती हैं।
हालाँकि विपक्ष इसे झूठा इतिहास कहता है। लेकिन भीड़ पर असर होता है। हिंदुत्व की राजनीति में इतिहास एक भावनात्मक औज़ार बन जाता है — एक ऐसा बटन जो भीड़ को तुरंत उकसाता है।
“नाम बनाम काम” की बहस
बीजेपी कहती है, “नाम नहीं, काम देखिए।” पोस्टरों पर लिखा है — “काम बोलेगा, झूठ नहीं।” वहीं आरजेडी का पलटवार है — “नफरत से डरने वाले नहीं, काम करने वाले हैं।”
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Bihar के मतदाताओं के लिए असली मुद्दे बाढ़, बेरोज़गारी और शिक्षा हैं। NSSO डेटा बताता है कि 25% युवा बेरोज़गार हैं। लेकिन जब भावनाएँ भड़कती हैं, तो तर्क पीछे छूट जाता है। पटना यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया कि 30% मतदाता अब भी “पहचान” के आधार पर वोट डालते हैं।
चुनाव आयोग और आचार संहिता की भूमिका
चुनाव आयोग (ECI) की मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) साफ़ कहती है — किसी भी भाषण में धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर नफरत नहीं फैलानी चाहिए। व्यक्तिगत हमले भी वर्जित हैं।
योगी का बयान इस सीमा के बेहद करीब है। आयोग ने अभी तक औपचारिक नोटिस नहीं भेजा, लेकिन निगरानी जारी है। पिछली बार ऐसे मामलों में चेतावनी और प्रतिबंध दोनों लगाए गए थे।
मीडिया की भूमिका और जनमत निर्माण
टीवी चैनलों पर यह बयान “ब्रेकिंग न्यूज़” बना रहा। NDTV, Aaj Tak, और Times Now ने लगातार डिबेट्स चलाईं। ट्विटर पर #OsamaShahab ट्रेंड हुआ, हजारों मीम्स और ट्वीट्स के साथ।
सोशल मीडिया पर झूठी खबरें भी फैलीं — एक वीडियो में योगी को “आतंकियों की तारीफ करते” दिखाया गया, जो फेक निकला। Alt News जैसी फैक्ट-चेक साइटें लगातार डिबंक कर रही हैं।
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विशेषज्ञों की राय
पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, “Bihar जैसी टूटी हुई सामाजिक संरचना में यह बयानबाज़ी वोट जुटाने का आसान तरीका है।”
राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी का कहना है, “औरंगज़ेब जैसे नाम लोगों को स्कूल की किताबों की याद दिलाते हैं — इसलिए तुरंत असर करते हैं।”
दीर्घकाल में यह रणनीति समाज में विश्वास तोड़ती है। लोकनीति (2022) के अध्ययन के अनुसार, सांप्रदायिक बयानबाज़ी से असहिष्णुता बढ़ रही है।
मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर
डर एक शक्तिशाली भाव है। जब डर जगता है, तो लोग ज़्यादा मतदान करते हैं। “ओसामा” जैसे नाम 10% तक मतदान बढ़ा सकते हैं — पर शांतिप्रिय मतदाता घर बैठे रह जाते हैं।
ऐसे माहौल में उम्मीद की राजनीति कमजोर होती जाती है। लोग कहते हैं — “सभी एक जैसे हैं।”
Bihar चुनाव की सीख
2024 के Bihar चुनाव में इतिहास और पहचान की राजनीति अपने चरम पर है। योगी का “ओसामा” बयान और बाबर-औरंगज़ेब की चर्चा दिखाती है कि मुद्दों से ज़्यादा भावनाएँ चुनाव चला रही हैं।
चुनाव आयोग देख रहा है, मीडिया बहस कर रहा है, और जनता दो हिस्सों में बँटती जा रही है।
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