Bihar उपचुनाव की किरकिरी: उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के सामने कांग्रेस की बड़ी दुविधा
Bihar के उपचुनावों ने मानो बिजली गिरा दी हो—विपक्ष की रणनीति डगमगा गई है, और अब निगाहें सीधे उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने कठिन मोड़ है:
बीजेपी से मुकाबले के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ तालमेल भी रखना है और अपने ही गढ़ में खुद को हाशिए पर जाने से भी बचाना है।
यह उलझन नई नहीं है—SP और कांग्रेस के रिश्ते वर्षों से उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों मिलकर सिर्फ 15 सीटें जीत पाए थे। कुछ सीटों पर उम्मीद जगाने वाली जीत मिली, लेकिन बड़े पैमाने पर हार ने कई सवाल खड़े किए। अब बिहार में INDIA गठबंधन के खराब प्रदर्शन ने अखिलेश पर और दबाव बढ़ा दिया है कि वह अपनी रणनीति पर दोबारा सोचे।
Bihar का झटका: कांग्रेस और यूपी की राजनीति के बीच अखिलेश की तनी हुई रस्सी
Bihar में INDIA ब्लॉक का प्रदर्शन
Bihar के ताज़ा उपचुनावों ने विपक्ष की एकजुटता की कमजोरी को उजागर कर दिया। उम्मीदें ऊँची थीं, लेकिन INDIA गठबंधन कुछ ही सीटें निकाल पाया।
केंद्र की राजनीति के नारों से ज़्यादा असर डाला स्थानीय मुद्दों और जातीय समीकरणों ने।
तराई जैसे इलाकों में यादव-मुस्लिम वोट अपनी परंपरागत खेमेबाज़ी में टिके रहे।
तेजस्वी यादव की RJD ने कुछ पकड़ बनाए रखी, लेकिन कांग्रेस लगभग नज़र नहीं आई।
बीजेपी विकास और कानून-व्यवस्था के एजेंडे के सहारे प्रमुख सीटों पर साफ़ जीत ले गई।
नतीजा यह कि विपक्ष के लिए यह एक सख्त संदेश है—गठबंधन कागज़ पर अच्छा दिखता है, लेकिन ज़मीन पर तालमेल और रणनीति ही उसे जीत दिलाते हैं।

Bihar के बाद अखिलेश यादव की रणनीति
अखिलेश बिहार को एक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। अगर Bihar में गठबंधन बिगड़ा, तो यूपी में बड़ी बाज़ी क्यों लगाई जाए?
वह यूपी में नेतृत्वकारी भूमिका चाहते हैं, न कि किसी के पीछे चलने वाली।
कांग्रेस की राष्ट्रीय ताकत राज्य चुनावों में अक्सर फीकी पड़ती है—Bihar ने यह फिर दिखाया है।
इसलिए अखिलेश यूपी की 80 में से करीब 60 सीटें SP के हिस्से में चाह सकते हैं।
छोटे दल—RLD और BSP—भी Bihar के नतीजों के बाद अपने हिस्से बढ़ाने की कोशिश करेंगे।
अब सवाल यह है—अखिलेश अकेले दम पर मजबूती दिखाएँगे या जोखिम उठाकर गठबंधन को जोड़े रखेंगे?
कांग्रेस के साथ यूपी में पुरानी गठबंधन छाया-Bihar
2017 विधानसभा चुनाव: गठबंधन की भूलें-Bihar
2017 में SP और कांग्रेस ने मिलकर BJP को चुनौती दी थी। सीटें बाँटकर चुनाव लड़ा, लेकिन:
SP को 47 सीटें,
कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं।
वहीं बीजेपी ने 312 सीटों के साथ शानदार जीत दर्ज की।
मोदी लहर, स्थानीय मुद्दों पर अस्पष्टता, नेतृत्व में टकराव—इन सबने मिलकर गठबंधन को भारी झटका दिया।
सीट-वाटपाट की नई दुविधा: मांगें बनाम वास्तविकता-Bihar
2024 पर विचार करते हुए समीकरण और कठिन हो जाते हैं। कांग्रेस कमज़ोर है, इसलिए SP की बार्गेनिंग पावर बढ़ गई है।
2019 में:
कांग्रेस ने 66 सीटें लड़ीं, सिर्फ 1 सीट जीती।
SP ने 37 लड़ीं और 5 सीटें जीतीं।

डेटा बताता है:
SP अकेले 20–25 सीटों पर अच्छा करती है, लेकिन गठबंधन कुल वोट जोड़कर 10% तक बढ़ा सकता है।
अब मामला यह है—क्या अखिलेश 50-50 जैसे किसी फार्मूले पर तैयार होंगे या अपनी बढ़त बरकरार रखेंगे?
समाजवादी पार्टी के भीतर की राजनीति: यादव फैक्टर-Bihar
SP की ताकत स्थानीय मुद्दों और MY (मुस्लिम-यादव) वोटबैंक में है।
अखिलेश यूपी-केंद्रित राजनीति को प्राथमिकता देते हैं।
कांग्रेस से गहरी गठबंधन की स्थिति SP की “स्थानीय पहचान” को कमजोर कर सकती है।
2022 के उपचुनावों में SP की बेहतर सोलो परफॉर्मेंस ने यह साबित भी किया है।
जोखिम: अगर गठबंधन फेल हुआ तो?
बीजेपी को लाभ
दलितों का दूसरे विकल्पों (जैसे BSP) की ओर झुकाव
गैर-यादव OBC का SP पर भरोसा कम होना
पिछले चुनावों जैसा 7% वोटशेयर का नुकसान
इसीलिए SP को अपनी बूथ मशीनरी, प्रशिक्षण और संसाधन मजबूत रखने होंगे—even alliance or no alliance।
कांग्रेस की स्थिति: यूपी में प्रासंगिकता की लड़ाई-Bihar
कांग्रेस की स्थिति यूपी में लगातार कमजोर होती गई है।
ज़मीनी संगठन फीका, कोई मजबूत नेतृत्व नहीं, और 2022 में शून्य सीटें।
इसलिए कांग्रेस को SP की ज़रूरत है—UP में दोबारा पाँव जमाने के लिए।

कांग्रेस की मूल माँगें:
10–15 सुरक्षित सीटें
संयुक्त रैलियाँ
साझा डेटा व रणनीति
पर Bihar के नतीजों ने उसका मोलभाव और कम कर दिया है।
2024 की ओर बढ़ता हुआ तनाव-Bihar
अखिलेश यादव एक पतली रस्सी पर चल रहे हैं—
गठबंधन की मजबूती और अपनी राजनीतिक बढ़त के बीच संतुलन बैठाना सबसे बड़ी चुनौती है।
Bihar बताता है—गठबंधन “भरोसे” से नहीं, स्पष्ट समीकरणों से चलते हैं।
SP की ज़मीनी ताकत अखिलेश को ऊँची भूमिका देती है।
कांग्रेस को गठबंधन की ज़रूरत है, पर SP को अपनी नेतृत्व भूमिका की।
संभावना है कि व्यावहारिकता जीते—SP के नेतृत्व में गठबंधन बने और विपक्ष 15–20 सीटों में वापसी कर सके।
लेकिन अगर अखिलेश अकेले चलते हैं, तो उनका झंडा यूपी में और ऊँचा रह सकता है।
अंततः सब कुछ निर्भर है—जमीनी माहौल, रैलियों की गूँज और सीटों की डील पर।
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