Bihar चुनावी समीक्षा: ‘अप्रत्याशित’ प्रदर्शन पर कांग्रेस की आत्मपरीक्षण प्रक्रिया शुरू
Bihar विधानसभा चुनावों के नतीजे जैसे ही आए, उन्होंने कांग्रेस में निराशा की लहर पैदा कर दी। महागठबंधन में मज़बूत वापसी की उम्मीद करने वाली कांग्रेस केवल 70 सीटों में से 19 ही जीत सकी—2015 की 27 सीटों की तुलना में यह बड़ा गिरावट है। राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने इस परिणाम को “अप्रत्याशित” बताते हुए विस्तृत समीक्षा का ऐलान किया है। यह सिर्फ औपचारिक बयान नहीं, बल्कि यह संकेत है कि पार्टी भविष्य की तैयारियों से पहले कड़वी सच्चाइयों का सामना करने के लिए तैयार है।
भूमिका: बिहार में निराशा की गूँज
इस बार Bihar के मतदाताओं ने साफ संदेश दिया है। एनडीए 125 सीटों के साथ आगे रहा, जबकि महागठबंधन 110 सीटों तक सिमट गया। सबसे ज्यादा चोट कांग्रेस को लगी। प्री-पोल सर्वेक्षणों में कांग्रेस के लिए शहरी इलाकों और युवाओं में बेहतर समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन मतदान परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे।
सिंह की साफ स्वीकारोक्ति ने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की ज़रूरत को और पुख्ता कर दिया है। Bihar जैसे राज्य में, जहाँ स्थानीय समीकरण, जाति-राजनीति और ज़मीनी मुद्दे बेहद प्रभावशाली हैं, यह समीक्षा भविष्य की रणनीति को नया स्वरूप दे सकती है।
सेक्शन 1: हार का नक्शा — कांग्रेस के प्रदर्शन का गणित
सीट विश्लेषण: पिछले चुनावों से सीधी तुलना
कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 19 पर जीत पाई—2015 की 27 सीटों की तुलना में यह बड़ा गिरावट है। वोट शेयर भी लगभग 8.6% के आसपास ही अटका रहा, जबकि राजद 23% से ऊपर निकल गया।
पटना जिले में कांग्रेस ने चार में से तीन प्रमुख सीटें गंवा दीं। आरक्षित (SC-ST) सीटों पर भी प्रदर्शन कमजोर रहा, जहाँ एनडीए ने 5–10% के अंतर से बढ़त बनाई।
मुख्य तथ्य:
हार: फुलवारी शरीफ—लगभग 2,500 वोटों से
जीत: अमौर जैसे अपवादस्वरूप नतीजे
संदेश: महागठबंधन का कुल आंकड़ा कांग्रेस की वास्तविक कमजोरी छुपा नहीं सका

स्थानीय मुद्दों पर पकड़ कमजोर पड़ना
Bihar में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है—हालिया सर्वे बताते हैं कि 40% से अधिक युवा बेरोजगार हैं। कांग्रेस ने राष्ट्रीय योजनाओं पर जोर दिया, जबकि लोग स्थानीय समाधान चाहते थे।
उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में स्थिरता का मुद्दा भारी पड़ा और कांग्रेस 15 जिलों में कमजोर पड़ी।
गठबंधन और सीट बंटवारे की जटिलताएँ
महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस को कुल 70 सीटें ही मिलीं, जबकि आरजेडी ने 144 सीटों पर दावेदारी की। कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इससे पार्टी अपने पारंपरिक मजबूत क्षेत्रों में लड़ने से चूक गई।
समस्या:
कई क्षेत्रों में वोट ट्रांसफर केवल 60% तक सीमित रहा
देर से टिकट वितरण और समन्वय की कमी
तेजस्वी यादव का अभियान हावी, कांग्रेस की आवाज़ दब गई
सेक्शन 2: सिंह का सुधार एजेंडा — अंदरूनी समीक्षा की प्रक्रिया
समीक्षा समिति का दायरा और समयसीमा
एक पाँच सदस्यीय पैनल तीन महीने में पूरी रिपोर्ट सौंपेगा। 45 दिनों में अंतरिम रिपोर्ट आएगी।
मुख्य कार्यों में बूथ-स्तर विश्लेषण, उम्मीदवार चयन की समीक्षा, और संगठनात्मक कमजोरियों की पहचान शामिल है।
ग्रामीण नेटवर्क की असफलताएँ
40% से अधिक हारी गई सीटों में बूथ-स्तर पर ‘गेट-आउट-द-वोट’ अभियान कमजोर था।
कई जिलों में पदाधिकारी अनुपस्थित रहे।
केंद्रीय संदेश गाँवों तक नहीं पहुँच पाया।
उम्मीदवार चयन की खामियाँ
टिकट वितरण में अनुभव को प्राथमिकता दी गई, जबकि लोकप्रियता और स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज़ किया गया।
ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) के प्रतिनिधित्व में भी कमी रही।

सेक्शन 3: रणनीतिक गलतियाँ — संदेश और नेतृत्व का असर
अभियान की विफल कथा
कांग्रेस का संदेश स्थानीय समस्याओं से जुड़ नहीं पाया।
सोशल मीडिया में कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ी और युवाओं तक पहुँच सीमित रही।
रैलियों में भी उत्साह कम दिखा।
स्टार प्रचारक और नेतृत्व प्रोजेक्शन
राहुल गांधी की रैलियों में संदेश स्पष्ट था, लेकिन युवाओं और महिलाओं के मुद्दों पर पर्याप्त ठोस प्रस्ताव नहीं दिखे।
स्थानीय और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी भी सामने आई।
एंटी-इनकंबेंसी का फायदा न उठा पाना
हालाँकि नीतीश सरकार के खिलाफ कुछ असंतोष था, लेकिन कांग्रेस उस ऊर्जा को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल नहीं रही।
मुस्लिम वोटों में भी 55% से आगे वोट ट्रांसफर नहीं हो पाया।
सेक्शन 4: आगे की राह — सुधार और पुनर्निर्माण के कदम
राज्य नेतृत्व में संभावित बदलाव
समीक्षा रिपोर्ट आने के बाद कई बड़े पदों पर फेरबदल संभव है।
पार्टी युवाओं और स्थानीय नेताओं को अधिक ज़िम्मेदारियाँ देने पर जोर दे सकती है।
गठबंधन रणनीति पर पुनर्विचार
कांग्रेस भविष्य में बेहतर सीट बंटवारे की माँग कर सकती है या कुछ क्षेत्रों में अकेले चुनाव लड़ने पर विचार कर सकती है।

ग्राउंड-लेवल संगठन को मजबूत करना
5 लाख नए सदस्य जोड़ने की योजना
युवा विंग को डिजिटल प्रशिक्षण
गाँव-स्तरीय बैठकें और बूथ मैपिंग
ऐप आधारित वॉलंटियर मॉनिटरिंग
स्वीकारोक्ति के बाद नई शुरुआत
Bihar चुनाव में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन पार्टी के लिए चेतावनी है।
समीक्षा प्रक्रिया संगठन से लेकर रणनीति तक कई स्तरों पर बदलाव ला सकती है।
मुख्य सबक यह है कि ज़मीनी नेटवर्क, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और गठबंधन समन्वय—तीनों में सुधार जरूरी है।
अब देखना होगा कि कांग्रेस इन सुझावों को कितना प्रभावी रूप से लागू करती है और आने वाले चुनावों में अपनी स्थिति कैसे सुधारती है।
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