“दोनों गांधी आपस में लड़ रहे हैं”: bjp मंत्री का राहुल–प्रियंका पर अजीब दावा
भारतीय राजनीति में बयानबाज़ी का पारा अक्सर चढ़ा रहता है। हाल ही में एक bjp मंत्री ने यह कहकर हलचल मचा दी कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच सब ठीक नहीं है। चुनावी माहौल के बीच आए इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिए—क्या यह सच है या सिर्फ़ राजनीतिक तंज?
यह दावा गांधी परिवार को बंटा हुआ दिखाने की कोशिश करता है और कांग्रेस पार्टी पर उनकी पकड़ पर सवाल उठाता है। आगामी चुनावों को देखते हुए, ऐसे बयान मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
यह सिर्फ़ गॉसिप नहीं है। यह कांग्रेस की एकजुटता और विपक्ष की रणनीति से जुड़ा मामला है। आइए इसे क्रम से समझते हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि: गांधी परिवार में कथित तनाव
बयान देने वाले मंत्री और संदर्भ
bjp के केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश में एक रैली के दौरान यह दावा किया। वे रेल और आईटी मंत्री हैं। कार्यक्रम स्थानीय मुद्दों पर था, लेकिन उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर हमला बोल दिया।
वैष्णव ने कहा कि दोनों भाई-बहन पार्टी नियंत्रण को लेकर टकरा रहे हैं। यह बीजेपी की उस रणनीति से मेल खाता है जिसमें विपक्ष को निशाने पर लिया जाता है। भीड़ ने तालियां बजाईं, मगर आलोचकों ने इसे निराधार बताया।
यह बयान राज्य चुनावों से पहले कांग्रेस को कमजोर दिखाने की कोशिश माना जा रहा है। इसके समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया गया, लेकिन मीडिया में चर्चा तेज़ हो गई।
राहुल और प्रियंका की सार्वजनिक गतिविधियों का विश्लेषण
हालिया घटनाओं पर नज़र डालें। नवंबर 2025 में दोनों दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में साथ नज़र आए। उन्होंने एक-दूसरे के प्रयासों की सराहना की—कहीं भी तनाव के संकेत नहीं दिखे।

भारत जोड़ो यात्रा के विस्तार के दौरान प्रियंका ने राहुल की अगुवाई का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने राहुल के नाम पर जनसभाएं कीं। तस्वीरें और वीडियो उनके तालमेल को दिखाते हैं।
अक्टूबर की एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों ने किसान मुद्दों पर साथ बात की। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह टकराव नहीं बल्कि समन्वय है।
कांग्रेस में गुटबाज़ी की पुरानी धारणाएं
गांधी परिवार में मतभेद की अफ़वाहें नई नहीं हैं। 2019 में राहुल के इस्तीफ़े और प्रियंका की सक्रिय भूमिका को लेकर भी अटकलें लगी थीं।
लेकिन पार्टी सूत्र इन दावों को खारिज करते हैं। राहुल ने संगठन सुधार के लिए पद छोड़ा, जबकि प्रियंका को यूपी की ज़िम्मेदारी दी गई ताकि जनसंपर्क मज़बूत हो।
इन अफ़वाहों से विपक्ष को बयानबाज़ी का मौका मिलता है, मगर तथ्य साझा लक्ष्यों की ओर इशारा करते हैं। हालिया उपचुनावों में कांग्रेस की बढ़त को दोनों की साझा रणनीति का नतीजा माना गया।
मंत्री के दावे की पड़ताल
“दोनों गांधी आपस में लड़ रहे हैं” – इस वाक्य का मतलब?
अश्विनी वैष्णव का बयान सत्ता संघर्ष का संकेत देता है—जैसे नेतृत्व या नीति को लेकर टकराव हो। लेकिन उन्होंने कोई ठोस उदाहरण नहीं दिया।
कोई तारीख़, घटना या संदर्भ सामने नहीं रखा गया। विशेषज्ञों के मुताबिक यह सिर्फ़ संदेह पैदा करने के लिए दिया गया अस्पष्ट बयान है।
राजनीति में पारिवारिक ड्रामा का सहारा लेना आम है, लेकिन यहां सबूत नदारद हैं।
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस ने तुरंत पलटवार किया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे “सस्ती राजनीति” बताया और गांधी परिवार की एकजुटता पर ज़ोर दिया।
राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत में इसे हँसी में उड़ा दिया—“हम इससे भी ज़्यादा झेल चुके हैं।” प्रियंका ने सोशल मीडिया पर पारिवारिक तस्वीरें साझा कर यही संदेश दिया।
जयराम रमेश जैसे नेताओं ने इसे हताशा बताया और bjp के अंदरूनी मतभेदों की ओर इशारा किया। कांग्रेस की प्रतिक्रिया एकजुट दिखी।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इसे चुनावी शोर करार दिया। उनके मुताबिक, यह बेरोज़गारी जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश है।
पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कहा कि बिना सबूत ऐसे हमले टिकते नहीं। सर्वे बताते हैं कि कांग्रेस की एकता बरकरार है।
थिंक टैंक से जुड़े विशेषज्ञ इसे मनोवैज्ञानिक रणनीति मानते हैं—विपक्षी मतदाताओं में संदेह पैदा करने की कोशिश। लेकिन आंकड़े गांधी नेतृत्व के तालमेल की पुष्टि करते हैं।
bjp की रणनीति: परिवार पर हमला
विपक्ष को कमजोर करने की राजनीति
सत्ताधारी दल अक्सर विरोधियों के पारिवारिक रिश्तों पर हमला करते हैं। बीजेपी ने पहले भी ऐसा किया है। इसका मकसद समर्थकों के बीच शक पैदा करना होता है।
वंशवाद पर सवाल उठाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यह कांग्रेस की बुनियाद को हिलाने की कोशिश मानी जाती है।
कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाने का उद्देश्य
मकसद साफ़ दिखता है—कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराना और बीजेपी के आर्थिक रिकॉर्ड से ध्यान हटाना।
यूपी जैसे राज्यों में इससे वोटों पर असर डालने की उम्मीद की जाती है। अगर रणनीति चली, तो ऐसे हमले और बढ़ सकते हैं।

ऐतिहासिक उदाहरण
2014 में सोनिया–राहुल पर ऐसे ही तंज कसे गए थे। क्षेत्रीय दलों के पारिवारिक नेतृत्व पर भी हमले हुए।
2023 में आम आदमी पार्टी के नेताओं पर भी इसी तरह के आरोप लगे, जो बिना सबूत के खत्म हो गए। इतिहास बताता है कि एकता बनी रहे तो ऐसे हमले उलटे पड़ते हैं।
गांधी परिवार की एकता: सबूत और उदाहरण
संयुक्त चुनावी अभियान
2024 के लोकसभा अभियान में राहुल और प्रियंका साथ दिखे। प्रियंका ने राहुल के एजेंडे पर 50 सीटों पर प्रचार किया।
भारत जोड़ो न्याय यात्रा में वे कई दिनों तक साथ चले। भीड़ ने उन्हें एक टीम के रूप में देखा, जिससे कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा।
यूपी की हालिया रैलियों में दोनों ने एक ही मंच से न्याय के नारे लगाए।
प्रियंका गांधी की संगठनात्मक भूमिका
2023 में प्रियंका को महासचिव बनाया गया, जिनके पास यूपी और बिहार जैसे अहम राज्य हैं। इससे राहुल के विज़न को ज़मीन पर उतारने में मदद मिली।
उन्होंने युवाओं और महिलाओं से संवाद बढ़ाया। लक्षित इलाकों में कांग्रेस की सदस्यता बढ़ी, जो नेतृत्व को मज़बूत करती है।
विश्लेषकों के मुताबिक, यह भूमिका बंटवारा है—टकराव नहीं।

पार्टी अनुशासन और कार्यकर्ताओं का समर्थन
ज़मीनी कार्यकर्ता दोनों नेताओं का समर्थन करते हैं। ज़िला बैठकों में राहुल और प्रियंका दोनों के लिए समान उत्साह दिखता है।
2025 के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज़्यादा कांग्रेस कार्यकर्ता नेतृत्व को एकजुट मानते हैं। यही आधार ऐसे हमलों से पार्टी को बचाता है।
बयानबाज़ी बनाम हकीकत
bjp मंत्री का दावा सुर्खियाँ तो बना सकता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रियाएँ और सार्वजनिक घटनाएँ एकता दिखाती हैं।
लंबे समय में मतदाता महंगाई और रोज़गार जैसे मुद्दों पर ध्यान देंगे, न कि पारिवारिक आरोपों पर।
कुल मिलाकर, यह राजनीतिक रणनीति ज़्यादा लगती है, असली फूट नहीं। गांधी परिवार फिलहाल एकजुट नज़र आता है। आने वाले चुनाव बताएँगे कि ऐसी बयानबाज़ी का कितना असर पड़ता है—अक्सर एकता ही जीत दिलाती है।
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