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स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ शांति से रह ही नहीं सकते, जब तक कि वे स्वतंत्रता से न रहें।

विवाह दोनों पर ही एक भारी बोझ है एक जेल में रहने जैसी यातना है।पुरुष और स्त्री शांतिपूर्वक केवल मित्र की ही भांति रह सकते हैं पति-पत्नी के रूप में नहीं।
प्रत्येक संबंध एक बंध है,
लेकिन इसे संभव बनाने के लिए स्त्री को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना होगा, पुरुष के बराबर शिक्षित होना होगा। राजनीतिक, सामाजिक और हर तरह से उसे विकसित होने के लिए समान अवसर मिलने की आवश्यकता है।
मेरे लिए यही स्त्री की मुक्ति और स्वतंत्रता है और साथ ही पुरुष की भी। दोनों ने ही एक दूसरे को गुलाम बनाकर रखा हुआ है इसीलिए वे निरंतर लड़ रहे हैं।
जिसने तुम्हें गुलाम बनाकर रखा है, तुम उससे प्रेम नहीं कर सकते। तुम उसे सजा देने के लिए उससे बदला जरूर लोगे।
स्त्री के पास बदला लेने के लिए अपने अलग तरीके हैं…सिरदर्द उनमें से कारगर विधि है जब भी पुरुष उससे प्रेम करना चाहता है तो या तो बहुत थकी हुई होती है वह अथवा उसका मूड नहीं होता-लेकिन सामान्य रूप् से अधिकतर उसके सिर में दर्द होता है।
सिरदर्द एक ऐसी चीज है, जिसे सिद्ध करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं।यहां तक कि एक चिकित्सक को भी तुम्हारी बात पर विश्वास करना पड़ता है, वह कोई भी निर्णय नहीं दे सकता कि वास्तव में तुम्हें सिरदर्द हो रहा है अथवा नहीं।
लेकिन यह एक स्वाभाविक परिणाम है। स्त्री यह अनुभव करती है कि उसका एक वस्तु की भांति, एक सेक्स पूर्ति के खिलौने के रूप में प्रयोग किया जा रहा है और उसे एक मनुष्य जैसा सम्मान नहीं दिया जा रहा है।
चीन में तो सदियों से यह विश्वास किया जाता है कि स्त्री के पास कोई आत्मा होती ही नहीं।
इसलिए चीन के कानून के अनुसार यदि पति अपनी पत्नी को जान से मार दे तो यह कोई अपराध नहीं है, क्योंकि उसके पास कोई आत्मा ही नहीं, वह मात्र एक फर्नीचर या एक वस्तु मात्र है और यदि कुर्सी का मालिक अपनी कुर्सी को तोड़ सकता है तो अपनी पत्नी को भी नष्ट कर सकता हैं। वहां सदियों से स्त्री को बाजार में ठीक दूसरी वस्तुओं की भांति बेचा जाता था।
पुरुषों और स्त्रियों को जब तक वे साथ रहना चाहें, एक दूसरे के मित्र बनकर रहना चाहिए। जिस दिन वे महसूस करें कि चीजें तल्ख बनती जा रही हैं तो बिना किसी शिकायत-शिकवे के उन लोगों को अलग हो जाना चाहिए,
लेकिन उनमें एक दूसरे के प्रति महान कृतज्ञता और अहोभाव होना चाहिए, उन सुंदर क्षणों और उस समय के लिए, जो उन्होंने साथ-साथ व्यतीत किया।
यह न केवल सम्भव है, बल्कि यही होने जा रहा है, क्योंकि पुरुष और स्त्री अब और अधिक बरदाश्त नहीं कर सकते। यही सदी पुराने सड़े हुए ढांचे का अंत देखेगी और एक नये मनुष्य तथा नई मनुष्यता का शुभारम्भ होगा।
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