सिंगूर में पीएम मोदी: ममता बनर्जी के राजनीतिक गढ़ में ‘विकास को तेज़ करने वाली Central परियोजनाओं’ का अर्थ
बीस साल पहले पश्चिम बंगाल के सिंगूर की कुछ एकड़ ज़मीन ने ऐसा तूफान खड़ा किया था, जिसने राज्य की राजनीति की दिशा ही बदल दी। कारखाने के लिए ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ किसान सड़कों पर उतर आए थे और इस आंदोलन की अगुवाई ममता बनर्जी ने की। वही आंदोलन आगे चलकर उनके सत्ता में आने की नींव बना।
अब समय ने करवट ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी सिंगूर में खड़े होकर विकास को तेज़ करने वाली Central परियोजनाओं की घोषणा करते हैं—सड़क, रेल और रोज़गार पर फोकस के साथ, खासकर हुगली ज़िले में।
यह दौरा सिर्फ ईंट-पत्थर और परियोजनाओं की बात नहीं करता। यह पुराने घावों और नई योजनाओं के टकराव को भी दिखाता है। केंद्र की बीजेपी सरकार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिये बंगाल की अर्थव्यवस्था को गति देना चाहती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राज्य सरकार हर कदम पर नज़र रखे हुए है। सवाल यही है—क्या ये पहल पुराने जख्म भरेंगी या राजनीतिक तनाव को और बढ़ाएँगी? इसे समझने के लिए पहले जानना ज़रूरी है कि सिंगूर आज भी इतना प्रतीकात्मक क्यों है।
सिंगूर की ऐतिहासिक गूंज: आंदोलन से विकास केंद्र तक
सिंगूर, हुगली ज़िले का एक इलाका, जो कभी धान के खेतों और शांत गांवों के लिए जाना जाता था। लेकिन 2006 में यही जगह बड़े आंदोलन का केंद्र बन गई। उसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को राज्य की राजनीति में शिखर पर पहुँचाया। अब पीएम मोदी का यहां आना विकास की कहानी को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश है।
भूमि अधिग्रहण विवाद और उसका राजनीतिक असर
2006 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने टाटा नैनो कार फैक्ट्री के लिए 997 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की। किसानों ने विरोध किया—उनका कहना था कि यही ज़मीन उनके परिवारों की आजीविका है। ममता बनर्जी महीनों तक धरने पर बैठीं, सड़कों को रोका और यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस बन गया।
आख़िरकार 2008 में टाटा ने परियोजना गुजरात स्थानांतरित कर दी। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2016 में ज़मीन किसानों को लौटा दी गई। इसी संघर्ष ने 2011 में TMC को सत्ता में पहुँचाया और 34 साल का वाम शासन समाप्त हुआ। आज भी सिंगूर TMC का गढ़ है, लेकिन उद्योग खोने का दर्द और बेरोज़गारी की टीस बाकी है।

पीएम मोदी का दौरा इसी अतीत को स्वीकार करते हुए “नई शुरुआत” का संकेत देता है—मानो पुराने युद्धक्षेत्र में अब पुल बनाए जा रहे हों।
आंदोलन से लाभार्थी तक: बदली हुई कहानी
सिंगूर को चुनना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी है। मोदी सिंगूर को उद्योग-विरोधी आंदोलन के प्रतीक से निकालकर विकास और साझेदारी के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। ज़बरन ज़मीन अधिग्रहण की बात नहीं, बल्कि सहमति और अवसर की बात।
यह संदेश उन लोगों को भाता है जो राजनीति से थक चुके हैं और अब ठोस नतीजे चाहते हैं—बेहतर सड़कें, बाज़ार तक आसान पहुँच और रोज़गार।
‘विकास को तेज़ करने वाली Central परियोजनाएँ’: क्या-क्या घोषित हुआ?
जनवरी 2026 के दौरे में पीएम मोदी ने हुगली और सिंगूर के लिए कई अहम परियोजनाओं की घोषणा की। इनका मकसद परिवहन, कनेक्टिविटी और रोज़गार के अवसर बढ़ाना है। कुल निवेश हज़ारों करोड़ रुपये का है।
सड़क, रेल और कनेक्टिविटी पर ज़ोर
भारत माला परियोजना के तहत सिंगूर से कोलकाता को जोड़ने वाला 45 किमी लंबा चार लेन हाईवे शुरू किया गया। इससे यात्रा समय दो घंटे से घटकर एक घंटे से भी कम हो जाएगा।
हावड़ा–बर्दवान कॉर्ड लाइन का उन्नयन किया गया है, जिससे माल ढुलाई क्षमता में 30% की बढ़ोतरी होगी।
सिंगूर के पास एक लॉजिस्टिक्स हब बनाया जाएगा, जिससे स्थानीय कारोबारियों की लागत करीब 20% घटेगी।
इन परियोजनाओं से न सिर्फ यातायात आसान होगा, बल्कि कृषि और उद्योग दोनों को फायदा मिलेगा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर फोकस
पीएम-किसान योजना के तहत 50,000 स्थानीय किसानों को सीधी आर्थिक मदद।
जल जीवन मिशन के अंतर्गत 10,000 एकड़ में माइक्रो-इरिगेशन, जिससे फसल उत्पादन 25% तक बढ़ने की उम्मीद।
युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट सेंटर, जहां ऑटो पार्ट्स और एग्रो-प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग दी जाएगी—पहले साल 5,000 नौकरियों का लक्ष्य।
आर्थिक असर: विकास की खाई पाटने की कोशिश
इन परियोजनाओं के लिए लगभग ₹5,000 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है—जो पहले के ज़िला-स्तरीय खर्च से कई गुना ज़्यादा है। अनुमान है कि इससे हुगली ज़िले की जीडीपी में 15% तक बढ़ोतरी हो सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सड़क और रेल में निवेश का मल्टीप्लायर इफेक्ट होता है—हर एक रुपया तीन रुपये की आर्थिक गतिविधि पैदा कर सकता है। हालांकि बिजली और स्थानीय प्रशासन की क्षमता जैसी चुनौतियाँ भी बनी रहेंगी।
राजनीतिक मायने: केंद्र–राज्य संबंधों की परीक्षा
सिंगूर बीजेपी के लिए प्रतीकात्मक रूप से संवेदनशील इलाका है। मोदी का संदेश “सभी बंगालियों के लिए विकास” का है, जबकि TMC इसे केंद्र का राजनीतिक दखल मान सकती है।
परियोजनाओं की 70% फंडिंग केंद्र से है, लेकिन ज़मीन और क्रियान्वयन में राज्य की भूमिका अहम है। सहयोग हुआ तो विकास तेज़ होगा, टकराव हुआ तो देरी।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया मिली-जुली है। एक किसान ने कहा, “पुरानी लड़ाई छोड़िए, हमें काम चाहिए।” यही भावना शायद इन योजनाओं की असली कसौटी बनेगी।

सिंगूर का भविष्य: फिर से इतिहास लिखेगा?
दो दशक पहले सिंगूर आंदोलन का केंद्र था, जिसने सत्ता बदली। आज वही सिंगूर विकास की प्रयोगशाला बनने की कोशिश में है। हाईवे, रेल, स्किल सेंटर और कृषि योजनाएँ अगर ज़मीन पर उतरीं, तो यह इलाका आर्थिक रूप से नई पहचान बना सकता है।
मुख्य बातें
₹2,000 करोड़ का हाईवे सबसे बड़ी परियोजना, जिससे व्यापार और रोज़गार को बढ़ावा
कृषि और कौशल पर ज़ोर, ताकि स्थानीय लोगों को सीधा लाभ
राजनीति से ऊपर उठकर विकास की कोशिश—पर सफलता सहयोग पर निर्भर
अगर आप बंगाल की राजनीति या भारत के विकास मॉडल में रुचि रखते हैं, तो सिंगूर पर नज़र बनाए रखें। यही जगह फिर से बदलाव की कहानी लिख सकती है। आपकी राय क्या है—क्या ये परियोजनाएँ पुराने जख्म भर पाएंगी?
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