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प्रयागराज: कहा जाता है कि प्रयाग की धरती पर कदम रखते ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. प्रयागराज के अरैल में भगवान भोलेनाथ का मंदिर है.

पुराणों में वर्णित है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी. चंद्रदेव को दक्ष प्रजापति ने श्राप दे दिया था. इस श्राप की वजह से चंद्रदेव क्षय रोग से पीड़ित हो गए थे,

जिसके बाद चंद्रदेव श्राप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी के पास गए, तब ब्रह्माजी ने चंद्रदेव से प्रयाग में विधि-विधान पूर्वक शिवलिंग की स्थापना कर शिवजी की आराधना करने के लिए कहा था. तब चंद्रदेव ने इसी जगह पर शिवलिंग की स्थापना

कर हजारों वर्षों तक भगवान शिव की तपस्या की थी. तब भोलेनाथ ने चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें श्रापमुक्त कर डिय था. कहा जाता है

कि भगवान भोलेनाथ ने चंद्रदेव को दो पक्षों में वरदान दिया शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष तभी से चंद्रदेव शुक्ल पक्ष में बड़े होते हुए नजर आते हैं और कृष्ण पक्ष में ढलने लगते हैं.

साथ ही साथ भगवान भोलेनाथ ने चंद्र देव को प्रसन्न होकर अपने माथे पर विराजमान कर लिया, क्योंकि चंद्रदेव को सोमदेव भी कहा जाता है इसी कारण इस शिवलिंग का नाम सोमेश्वर महादेव पड़ा.

मंदिर के मुख्य पुजारी शैलेंद्र पुरी उर्फ शैलपुरी महाराज ने बताया कि यह मंदिर उत्तरमुखी है. आम दिनों में मंदिर सुबह 4:00 बजे खुल जाता है और रात 9:30 बजे बंद कर दिया जाता है

लेकिन श्रावण मास में यह मंदिर सुबह 4:00 बजे खुलता है और रात 10:30 बजे बंद कर दिया जाता है. वहीं सोमवार के दिन यह मंदिर रात 11:00 बजे तक खुला रहता है.

पूरे वर्ष इस मंदिर में अनुष्ठान चलते रहते हैं. दूर-दूर से भक्त यहां पर रुद्राभिषेक व ग्रहों की शांति के लिए पूजा पाठ कराने आते हैं.

चंद्रदेव को क्यों मिला था श्राप
कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं.

सभी की शादी चंद्रदेव से की गई थी, लेकिन चंद्रदेव 27 पत्नियों में सिर्फ एक पत्नी पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते थे. अन्य 26 पत्नियां इस बात से परेशान हो गईं

तो उन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति से इसकी शिकायत की. दक्ष प्रजापति ने इस विषय पर चंद्रदेव से बात कर उन्हें समझाया कि उनकी 27 पत्नियां हैं तो वह सभी के साथ खुशी-खुशी रहें,

लेकिन कुछ समय बाद फिर दक्ष प्रजापति की 26 पुत्रियों ने उन्हें बताया कि चंद्रदेव उन पर ध्यान ही नहीं देते, वह सिर्फ अपनी एक पत्नी पर ही ध्यान केंद्रित रखते हैं. जिसके बाद दक्ष प्रजापति ने क्रोधित होकर चंद्रदेव को श्राप दे दिया था.

कहा जाता है कि औरंगजेब ने सोमेश्वर महादेव को कई बार तोड़ने की कोशिश की. लेकिन जब भी वह मंदिर के परिसर में घुसने की कोशिश करता था अचानक से मधुमक्खियों का झुंड उसकी सेना पर टूट पड़ता था.चार,पांच बार के प्रयास के

बाद औरंगजेब ने इस मंदिर की तरफ कदम भी नहीं रखा और वह वापस चला गया.

श्रावण मास में दूर-दूर से भक्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन के लिए आते हैं. ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से इस मंदिर में आकर मन्नत मांगता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.