Chirag पासवान का तीखा वार: महागठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद पर मुस्लिम प्रतिनिधित्व शून्य
बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने महागठबंधन सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पदों पर मुस्लिम समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह मुद्दा और तेज हो गया है। सवाल उठने लगे हैं — जब राज्य की बड़ी आबादी मुस्लिम है, तो उन्हें सत्ता के ऊँचे पदों से दूर क्यों रखा गया?
Chirag पासवान का आरोप: मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझा गया
Chirag पासवान ने अपने बयान में कहा कि महागठबंधन “धर्मनिरपेक्षता” की बात तो करता है, लेकिन वास्तव में मुस्लिमों के लिए शीर्ष स्तर पर कोई जगह नहीं देता।
उन्होंने कहा —
“चुनाव के समय मुस्लिम वोट मांगे जाते हैं, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी देने की बारी आती है तो कुर्सी खाली रहती है।”
Chirag पासवान का कहना है कि 17% से ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाले बिहार में इस समुदाय की उपेक्षा लोकतंत्र के साथ अन्याय है। उनका आरोप है कि महागठबंधन ने मुसलमानों को सिर्फ वोट देने वाला वर्ग मान लिया है, भागीदार नहीं।
यह बयान चिराग की राजनीति की पुरानी शैली के अनुरूप है — वे अक्सर अपने विरोधियों पर सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर निशाना साधते हैं।
महागठबंधन की कैबिनेट पर एक नज़र
बिहार की मौजूदा कैबिनेट में कुल 30 मंत्री हैं, जिनमें से सिर्फ दो मुस्लिम मंत्री हैं। उन्हें भी अपेक्षाकृत छोटे विभाग दिए गए हैं — जैसे अल्पसंख्यक कल्याण या छोटे पैमाने के उद्योग।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जेडीयू) हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव (राजद) और दो अन्य नेताओं को भी अहम पद मिले हैं — लेकिन कोई भी मुस्लिम चेहरा नहीं।

राज्य विधानसभा की 243 सीटों में से मुस्लिम विधायकों की संख्या केवल 19 है, और उनमें से भी किसी को शीर्ष पद नहीं मिला। जनवरी में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में भी मुस्लिमों को अहम भूमिका नहीं दी गई।
पासवान इसी तथ्य को हथियार बनाकर कहते हैं कि महागठबंधन “समानता” नहीं, बल्कि “जातिगत समीकरण” चला रहा है।
धर्मनिरपेक्ष राजनीति पर सवाल
महागठबंधन ने 2020 के चुनावों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का वादा किया था। आरजेडी और कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि बिहार सभी धर्मों और वर्गों का राज्य बनेगा।
लेकिन अब चिराग पूछ रहे हैं —
“जब 60–70% मुसलमान आपको वोट देते हैं, तो क्या उन्हें सिर्फ भाषणों में याद किया जाएगा?”
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार में मुस्लिम मंत्री महत्वपूर्ण विभाग संभालते हैं। केरल में भी यह संतुलन देखने को मिलता है। मगर बिहार इस मामले में पिछड़ रहा है — और यही तुलना अब पासवान के बयान को और वजन देती है।
बिहार की राजनीति में मुस्लिमों की भूमिका
बिहार की 12 करोड़ आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी लगभग 17% है।
किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिलों में उनका प्रभाव निर्णायक है। लगभग 40 से 50 विधानसभा सीटों पर उनका वोट नतीजे तय कर सकता है।
2015 में जब उन्होंने महागठबंधन का समर्थन किया था, तब बीजेपी को झटका लगा था। लेकिन अब उनमें असंतोष बढ़ता दिख रहा है।
युवा मुसलमान बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों को लेकर निराश हैं। शीर्ष नेतृत्व में उनकी कमी से वे खुद को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।
बीजेपी और एनडीए की प्रतिक्रिया
भाजपा नेताओं ने चिराग पासवान के बयान का समर्थन किया।
केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने कहा —
“यह महागठबंधन की असली सच्चाई है — वे धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, पर असल में जातिवाद चलाते हैं।”
एनडीए इस मुद्दे को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
2025 के विधानसभा चुनाव से पहले यह हमला महागठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
हालांकि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सफाई दी कि “कैबिनेट गठबंधन की संरचना पर आधारित होती है, किसी कोटा पर नहीं।” लेकिन यह दलील ज़्यादा प्रभावी नहीं लगी।
बिहार में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का इतिहास
अगर इतिहास देखें तो बिहार में कभी भी कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री नहीं रहा।
लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में कुछ मुस्लिम मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन शीर्ष पद कभी नहीं मिला।
नीतीश कुमार के शासन में शुरुआती वर्षों में बीजेपी गठबंधन के कारण मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा। बाद में जब वे महागठबंधन में लौटे, तब भी तस्वीर में खास बदलाव नहीं हुआ।
आजादी के बाद से अब तक बनी सभी कैबिनेट में औसतन 10% से भी कम मंत्री मुस्लिम रहे हैं।

आगे की राह: क्या बदलेगा समीकरण?
Chirag पासवान का यह हमला बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ गया है —
क्या मुस्लिमों को सत्ता में असली हिस्सेदारी मिलेगी या वे केवल चुनावी गणित का हिस्सा बने रहेंगे?
महागठबंधन को आत्ममंथन करना होगा।
“सच्ची धर्मनिरपेक्षता” सिर्फ वोट मांगने में नहीं, बल्कि नेतृत्व में समान अवसर देने में है।
अगर यह सवाल अनुत्तरित रहा, तो यह मुद्दा 2025 के चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
क्योंकि बिहार तभी आगे बढ़ेगा, जब हर समुदाय की आवाज़ सत्ता के गलियारों में गूंजे।
Chirag पासवान का यह बयान सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की पुरानी बहस को फिर से जगा देता है। बिहार जैसे विविध राज्य में संतुलन और समावेश ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
अब देखना यह है कि क्या महागठबंधन इस आलोचना से सबक लेकर बदलाव की ओर कदम बढ़ाएगा, या विपक्ष इस मुद्दे को अपनी रणनीति का नया केंद्र बना लेगा।
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