कपिल मिश्रा एफआईआर विवाद: Delhi विधानसभा ने पंजाब पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को किया तलब
कल्पना कीजिए—दो राज्यों के बीच सियासी टकराव, जहां सीमाओं के पार आरोप-प्रत्यारोप तेज हो जाएं। कुछ ऐसा ही इस समय देश की राजनीति में देखने को मिल रहा है। Delhi विधानसभा ने पंजाब पुलिस के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी कर तलब किया है। मामला दिल्ली बीजेपी नेता कपिल मिश्रा और अन्य के खिलाफ पंजाब में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है।
यह कदम केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संघीय ढांचे में अधिकारों की सीमा और राजनीतिक टकराव का बड़ा सवाल खड़ा करता है। Delhi के विधायकों का आरोप है कि पंजाब पुलिस ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की है, जबकि पंजाब सरकार इसे कानून के तहत की गई वैध कार्रवाई बता रही है।
Delhi विधानसभा की कार्रवाई का कानूनी आधार
विधानसभा के विशेषाधिकार और अधिकार क्षेत्र
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 194 के तहत राज्य विधानसभाओं को अपने सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करने का अधिकार है। इसके तहत विधानसभा किसी भी ऐसे मामले की जांच कर सकती है, जो उसके सदस्यों के कामकाज या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करे।
Delhi विधानसभा का कहना है कि कपिल मिश्रा के खिलाफ पंजाब में दर्ज एफआईआर विधानसभा विशेषाधिकारों पर सीधा हमला है। उनके मुताबिक, यह कार्रवाई दिल्ली के एक राजनीतिक नेता की आवाज दबाने की कोशिश है और यह राज्य की सीमाओं से बाहर जाकर की गई है।
विधानसभा नियमों के तहत नोटिस जारी कर किसी भी व्यक्ति को तलब किया जा सकता है। अनुपालन न करने पर विशेषाधिकार हनन (Privilege Breach) की कार्यवाही भी हो सकती है।
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एफआईआर से नोटिस तक: पूरा घटनाक्रम
यह विवाद नवंबर 2025 में शुरू हुआ, जब अमृतसर में कुछ किसानों की शिकायत पर कपिल मिश्रा और उनके सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
समयरेखा:
10 नवंबर 2025: अमृतसर में कपिल मिश्रा और दो अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज
दिसंबर 2025: Delhi बीजेपी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए विधानसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया
15 जनवरी 2026: Delhi विधानसभा सचिवालय ने पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया
1 फरवरी 2026: अधिकारियों से जवाब देने की अंतिम तारीख तय
एफआईआर में IPC की धारा 153A (वैमनस्य फैलाने) जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
तलब किए गए पंजाब पुलिस अधिकारी कौन हैं?
नोटिस पाने वाले तीन प्रमुख अधिकारी
डीजीपी गौरव यादव – पंजाब पुलिस के प्रमुख, जिन पर एफआईआर को मंजूरी देने का आरोप
एसएसपी राजिंदर सिंह (अमृतसर) – जिन्होंने मामले की जांच की निगरानी की
इंस्पेक्टर हरप्रीत कौर – जिन्होंने एफआईआर दर्ज की
Delhi विधानसभा का कहना है कि इन अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव में काम किया, जबकि पंजाब पुलिस इसे अपनी नियमित कानूनी जिम्मेदारी बता रही है।
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पंजाब सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया
पंजाब पुलिस ने Delhi विधानसभा के नोटिस को “बेबुनियाद” बताया है। डीजीपी गौरव यादव ने बयान जारी कर कहा कि एफआईआर पूरी तरह कानून के तहत और पंजाब की सीमा में दर्ज की गई है।
पंजाब के मुख्यमंत्री और गृह विभाग ने भी स्पष्ट किया कि दिल्ली विधानसभा को पंजाब पुलिस को निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है। जरूरत पड़ने पर इस नोटिस को अदालत में चुनौती दी जाएगी।
फिलहाल कोई भी अधिकारी Delhi विधानसभा के सामने पेश नहीं हुआ है। दोनों राज्यों के कानूनी प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जरूर हुई है, लेकिन कोई सहमति नहीं बनी।
राजनीतिक असर और अंतर-राज्यीय टकराव
दो अलग-अलग राजनीतिक कथाएं
Delhi बीजेपी का आरोप: यह आम आदमी पार्टी की राजनीतिक बदले की कार्रवाई है
पंजाब आप का दावा: कपिल मिश्रा के बयान भड़काऊ थे और कानून सबके लिए समान है
Delhi की मुख्यमंत्री ने इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया, जबकि आम आदमी पार्टी ने मिश्रा को “नफरत फैलाने वाला नेता” करार दिया।
यह विवाद आने वाले चुनावों से पहले दोनों पक्षों के लिए राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है।
ऐसे मामलों की मिसालें और आगे की राह
भारत में पहले भी राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर टकराव हुए हैं। कई मामलों में अंततः अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
मामला हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है
अदालत यह तय करेगी कि विधानसभा की समन शक्ति कहां तक है
यह फैसला भविष्य में राज्यों के बीच ऐसे विवादों की दिशा तय करेगा
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आगे क्या हो सकता है?
संभावित परिदृश्य:
अधिकारी पेश हों और विधानसभा में बयान दें
अधिकारी पेश न हों, तो विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही
मामला अदालत में जाए और कानूनी फैसला आए
दोनों राज्य किसी समझौते पर पहुंचें
इस पूरे विवाद में कपिल मिश्रा के खिलाफ मूल एफआईआर अब पीछे छूटती दिख रही है, जबकि केंद्र में आ गया है—संघीय ढांचे में शक्ति संतुलन का सवाल।
अधिकार बनाम कानून की जंग
Delhi विधानसभा और पंजाब पुलिस के बीच यह टकराव केवल एक एफआईआर का मामला नहीं है। यह सवाल उठाता है कि राज्य विधानसभाओं की शक्तियां कहां तक हैं और पुलिस की स्वायत्तता की सीमा क्या है।
आने वाले दिनों में अदालतों की भूमिका अहम होगी। यह मामला तय करेगा कि भविष्य में कोई राज्य दूसरे राज्य के अधिकारियों को कितनी आसानी से तलब कर सकता है।
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