Delhi कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी के खिलाफ लैंड-फॉर-जॉब्स घोटाले में आरोप तय किए
भारतीय राजनीति को हिला देने वाले फैसले में Delhi की एक अदालत ने बहुचर्चित लैंड-फॉर-जॉब्स (नौकरी के बदले ज़मीन) मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। यह मामला यूपीए सरकार के दौरान लालू यादव के रेल मंत्री रहते हुए कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा है। आरोप है कि रेलवे में नौकरियां देने के बदले लालू परिवार को ज़मीनें दिलाई गईं। अब आरोप तय होने के बाद मुकदमे की सुनवाई पूरी तरह शुरू होगी, जिसका असर राजनीति और जनता के भरोसे—दोनों पर पड़ सकता है।
CBI चार्जशीट और कानूनी प्रक्रिया की पड़ताल
इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने की। वर्षों की जांच, छापेमारी और गवाहों के बयान के बाद अदालत ने आरोप तय करने का फैसला लिया।
जांच की समयरेखा
2017: CBI ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की।
2017–2021: बिहार सहित कई जगहों पर छापे, दस्तावेज़ जब्त।
2022: अहम चार्जशीट दाखिल, दर्जनों लोगों को आरोपी बनाया गया।
2023: Delhi की राउज़ एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई शुरू।
दिसंबर 2025: अदालत ने IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय किए।
प्रमुख आरोप
CBI के अनुसार, 2004–2009 के दौरान रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने ग्रुप-D पदों पर बिना विज्ञापन और परीक्षा के नियुक्तियां कराईं। बदले में नौकरी चाहने वालों से ज़मीनें औने-पौने दामों पर या गिफ्ट के तौर पर लालू परिवार के सदस्यों/संस्थाओं के नाम करवाई गईं।
राबड़ी देवी और परिवार के अन्य सदस्यों पर इन ज़मीन सौदों में लाभ लेने का आरोप है। जांच एजेंसी का कहना है कि रिश्वत को संपत्ति सौदों की आड़ में छिपाया गया।

आरोप तय होने का मतलब
आरोप तय होने का अर्थ है कि अदालत को प्रथम दृष्टया सबूत पर्याप्त लगे हैं और अब पूरा ट्रायल चलेगा। यह केस खारिज होने के चरण से आगे बढ़ चुका है।
कथित लैंड-फॉर-जॉब्स घोटाले की कार्यप्रणाली
ज़मीन का मूल्यांकन और ट्रांसफर
जांच में सामने आया कि कई ज़मीनें बाजार कीमत से बेहद कम पर या बिना भुगतान के ट्रांसफर हुईं। पटना और आसपास की ज़मीनें परिवार से जुड़ी कंपनियों/ट्रस्ट्स के नाम गईं। आज जिनकी कीमत करोड़ों में है, वे तब मामूली रकम में दर्ज हुईं।
लाभार्थी और नियुक्तियां
CBI के मुताबिक करीब 50 लोगों को इस तरीके से नौकरी मिली। अधिकांश नियुक्तियां मेरिट प्रक्रिया को दरकिनार कर की गईं। दस्तावेज़ों में ज़मीन दाताओं और नियुक्तियों के बीच संबंध दर्शाए गए हैं।
शेल कंपनियों की भूमिका
आरोप है कि कुछ शेल कंपनियों/बेनामी व्यवस्थाओं के ज़रिए ज़मीनें इकट्ठी की गईं, ताकि लेन-देन का सीधा रिश्वत संबंध छिपाया जा सके। छापों में ऐसे काग़ज़ात मिलने का दावा किया गया है।

राजनीतिक असर और बचाव की रणनीति
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार का बड़ा सबूत बताया।
आरजेडी ने आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहा।
तेजस्वी यादव सहित पार्टी नेताओं ने निष्पक्ष जांच की मांग की।
सोशल मीडिया और सियासी मंचों पर तीखी बहस देखने को मिली।
कानूनी बचाव
लालू यादव के वकीलों का तर्क है कि ज़मीन सौदे कानूनी और उस समय के बाज़ार भाव पर हुए, और नौकरी से सीधा रिश्वत संबंध साबित नहीं होता। गवाहों की विश्वसनीयता और सबूतों पर सवाल उठाए जाने की उम्मीद है।
बिहार की राजनीति पर असर
मामले की छाया बिहार की राजनीति और आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकती है। गठबंधन सहयोगी भी स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं।
व्यापक प्रभाव और नज़ीर
यह मामला सार्वजनिक नियुक्तियों में पारदर्शिता पर न्यायिक सख्ती को रेखांकित करता है। अन्य भर्ती घोटालों की तरह, यह भी संदेश देता है कि नौकरियां खरीदी नहीं जा सकतीं। इससे भविष्य में डिजिटल भर्ती, ऑडिट और संपत्ति जांच जैसे सुधारों को बल मिल सकता है।

आगे क्या?
अब ट्रायल शुरू होगा, जिसमें गवाहों और सबूतों के आधार पर फैसला होगा। लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के लिए आने वाले महीने निर्णायक हो सकते हैं।
मुख्य बातें संक्षेप में
IPC 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप तय।
50 से अधिक कथित अनियमित नियुक्तियों से जुड़ा मामला।
दिल्ली की अदालत में पूरा ट्रायल होगा।
राजनीतिक असर: बिहार और राष्ट्रीय स्तर पर हलचल।
संदेश: सार्वजनिक नौकरियों में मेरिट और पारदर्शिता अनिवार्य।
यह मामला आगे क्या मोड़ लेता है—नज़र बनाए रखें। आपकी राय में यह निष्पक्ष जांच है या राजनीतिक खेल?
Odisha में दो बसों के बीच ऑटो कुचल गया, चालक की मौत हो गई।
Follow us on Facebook

