Jefferies क्यों मानता है कि भारत की स्थिति बदल सकती है: पुतिन की दिल्ली यात्रा का विश्लेषण
दुनिया के नेता जब हाथ मिलाते हैं और समझौते करते हैं, तो अक्सर सतह के नीचे बड़े बदलाव छिपे होते हैं। 2025 के अंत में व्लादिमीर पुतिन की दिल्ली यात्रा भी ऐसी ही थी। यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच रहा है और QUAD जैसे मंच भारत को पश्चिमी देशों के करीब ला रहे हैं—ऐसे माहौल में पुतिन का यह दौरा पुरानी दोस्तियों पर नए सवाल उठा रहा है।
इसी बीच Jefferies की रिपोर्ट बड़ा संकेत देती है—यह मानती है कि भारत अब रूस के करीब रहने की अपनी पारंपरिक नीति से धीरे-धीरे दूरी भी बना सकता है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत आज किसी एक खेमे में बंधना नहीं चाहता—वह अपना रास्ता खुद तैयार कर रहा है।
Jefferies विश्लेषण की परतें: रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
Jefferies का आकलन आर्थिक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक पहलुओं को जोड़कर समझने की कोशिश करता है कि भारत क्यों “हैजिंग स्ट्रैटेजी” की ओर जा रहा है—यानी संतुलित दूरी से सभी से संबंध रखना।
1. आर्थिक कारण: भारत की बदलती साझेदारियाँ
भारत-रूस व्यापार पहले मजबूत माना जाता था—तेल और हथियार इसकी रीढ़ थे। लेकिन जेफ़रीज़ नोट करता है कि अब तस्वीर बदल रही है।
2024 में भारत-अमेरिका व्यापार: $190 बिलियन
भारत-रूस व्यापार: लगभग $65 बिलियन
अंतर बहुत बड़ा है।
सस्ती रूसी तेल डीलें अच्छी हैं, लेकिन
सेमीकंडक्टर
ग्रीन एनर्जी
डिजिटल टेक
जैसे क्षेत्रों में अमेरिका और यूरोप भारत को कहीं बड़ा लाभ दे रहे हैं।
रूस पर निर्भरता का जोखिम—प्रतिबंध, अनिश्चितता—भारत को मजबूर करता है कि साझेदारों में विविधता रखी जाए।
Jefferies के अनुसार, यह बदलाव अगले दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि को 5-7% तक बढ़ा सकता है।

2. सुरक्षा समीकरण: रूसी हथियार बनाम पश्चिमी तकनीक
भारत की रक्षा ज़रूरतें वर्षों से रूस पर टिकी हैं।
लड़ाकू विमान
टैंक
मिसाइल
S-400 सिस्टम
लेकिन इसी S-400 पर अमेरिका की नज़रें तनीं, जिससे भारत के लिए पश्चिमी तकनीक के दरवाज़े आधे बंद होने लगे।
आज भारत को चाहिए:
ड्रोन तकनीक
साइबर हथियार
उन्नत निगरानी प्रणाली
जो रूस से उतनी आसानी से उपलब्ध नहीं।
Jefferies मानता है कि भारत भविष्य में रूस से कुछ हथियार खरीद धीरे-धीरे कम करेगा और
अमेरिका-फ्रांस-इज़राइल जैसी साझेदारियों को बढ़ाएगा।
3. भू-राजनीतिक दबाव: अमेरिका और चीन का असर
अमेरिका लगातार भारत के करीब आने की कोशिश में है—
सुरक्षा साझेदारी
टेक ट्रांसफर
सैन्य अभ्यास
वहीं दूसरी ओर रूस-चीन की बढ़ती नज़दीकी भारत के लिए असहज स्थिति बनाती है।
चीन भारत का प्रतिद्वंद्वी है—और रूस चीन के साथ खड़ा दिखे, तो संतुलन बिगड़ता है।
इसलिए भारत की “नॉन-अलाइनमेंट” नीति अब और पेचीदा हो गई है।
यह सब परिस्थितियाँ भारत को मजबूर करती हैं कि वह किसी एक के साथ पूरी तरह न खड़ा होकर “स्मार्ट पोजिशनिंग” अपनाए।
भारत की स्थिति जहाँ अभी भी अस्पष्ट है
रूस से दूरी बढ़ रही है—लेकिन पूरी दूरी नहीं। भारत कुछ क्षेत्रों में तटस्थ रुख बनाए हुए है।
1. यूक्रेन पर भारत की ‘न्यूट्रल डिप्लोमेसी’
भारत ने रूस के खिलाफ UN में कड़े वोटों से दूरी बनाई है—अधिकतर अस्थायी रहा है।
पुतिन की यात्रा के दौरान भी मोदी ने “शांति और संवाद” की बात कही, लेकिन रूस का खुला समर्थन नहीं किया।
ORF के एक विशेषज्ञ कहते हैं:
“G20 में भारत की भाषा बदलना दर्शाता है कि भारत कूटनीति को शांत और संतुलित रखना चाहता है।”
यह बदलाव दर्शाता है कि भारत रूस का बचाव अब उस भावुकता से नहीं करता जैसा पहले करता था।
2. ऊर्जा पर निर्भरता बनाम विविधता
2022 के प्रतिबंधों के बाद भारत ने सस्ते रूसी तेल की बड़े पैमाने पर खरीद की—जो आर्थिक रूप से फायदे की रही।
पर Jefferies कहता है:
यह दीर्घकालिक रणनीति नहीं है।
भारत
सऊदी
UAE
अमेरिका
गैस LNG समझौतों
के जरिए अपनी ऊर्जा टोकरी को 2030 तक काफी विविध बनाने की ओर बढ़ रहा है।
3. बहुपक्षीय मंचों में भारत की भूमिका (BRICS और SCO)
BRICS और SCO में भारत, रूस और चीन एक साथ हैं।
लेकिन रूस-चीन की नज़दीकी इन मंचों में चीन के प्रभाव को बढ़ा रही है।
जेफ़रीज़ के अनुसार, भारत भविष्य में ऐसी संस्थाओं में
ब्राज़ील
साउथ अफ्रीका
जैसे देशों के साथ मिलकर संतुलन बनाना चाहेगा।
भारत की घरेलू राजनीति का प्रभाव
विदेश नीति अकेले नहीं चलती—घरेलू राजनीतिक दबाव भी दिशा तय करते हैं।
1. रूसी रक्षा सामान का घरेलू महत्व
रूसी हथियारों पर भारत ने अरबों रुपये खर्च किए हैं।
यह तंत्र अचानक बदला नहीं जा सकता—नौकरियाँ और रक्षा प्रणालियाँ भी दांव पर हैं।
इसलिए बदलाव धीरे-धीरे होगा।
2. ऐतिहासिक रिश्ता: भावनात्मक और रणनीतिक विरासत
सोवियत दौर में रूस ने भारत का साथ दिया—यह इतिहास आज भी भारतीय राजनीति और जनमानस में गहरी छाप रखता है।
इसीलिए भारत रूस से “कट” नहीं रहा—बल्कि “धीरे-धीरे दूरी” रणनीति अपना रहा है।
जेफ़रीज़ इसे strategic patience कहता है।
3. जनता और मीडिया की धारणा
भारतीय मीडिया ने पुतिन-मोदी शिखर बैठक को संतुलित अंदाज में कवर किया—
कुछ ने उपलब्धियाँ गिनाईं, कुछ ने सीमाएँ।
सर्वे बताते हैं—
60% लोग रूस के साथ करीबी चाहते हैं
लेकिन 70% लोग अमेरिका के साथ संबंध सुधारने को भी सही मानते हैं
यानी जनता भी संतुलित रुख पसंद करती है।
निवेशकों और विश्लेषकों के लिए रिपोर्ट के व्यावहारिक संकेत
यह रिपोर्ट सिर्फ कूटनीतिक नहीं—निवेश संकेत भी देती है।
1. भारत की ‘De-Risked’ सप्लाई चेन में अवसर
जैसे-जैसे भारत रूस के बजाय पश्चिमी तकनीक अपनाएगा:
सेमीकंडक्टर
हाई-टेक डिफेंस
ग्रीन एनर्जी
में निवेश बढ़ेगा।
उच्च संभावना वाले सेक्टर:
गुजरात में चिप प्लांट
रक्षा उत्पादन में संयुक्त उपक्रम
नवीकरणीय ऊर्जा स्टार्टअप
अनुमानित वृद्धि: 15–20% अगले पाँच वर्षों में
2. भारत की रणनीतिक दिशा के संकेत कैसे पहचानें?
भारत के नए रक्षा टेंडर—यदि गैर-रूसी कंपनियाँ जीतें, बदलाव पक्का।
मोदी की उच्च-स्तरीय विदेश यात्राएँ—जैसे अमेरिका/फ्रांस।
UN में रूस से संबंधित भारत का वोटिंग पैटर्न।
ये सब निवेशकों के लिए संकेत हैं।
ग्लोबल साउथ में भारत का भविष्य
भारत यदि रूस से थोड़ा दूर और पश्चिम के करीब संतुलित स्थिति अपनाता है, तो
उसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी
वह ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और मजबूत कर सकता है
यह इसे प्रमुख “मध्य शक्ति” (middle power) के रूप में स्थापित करता है।
भारत-रूस साझेदारी की नई दिशा
Jefferies रिपोर्ट साफ तस्वीर देती है—
भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दे रहा है।
पुरानी दोस्ती बनी रहेगी, लेकिन
आर्थिक रुझान
सुरक्षा ज़रूरतें
भू-राजनीतिक दबाव
भारत को नए रास्ते पर ले जा रहे हैं।
भारत अब किसी एक खेमे में खड़ा नहीं—बल्कि अपने हितों के अनुसार संतुलन साध रहा है।
निवेशकों और विश्लेषकों के लिए संदेश:
आँखें भारत पर रखें—यहीं सबसे बड़े बदलाव और अवसर उभर रहे हैं।
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