Delhi

Delhi की छात्रा ने झूठा बताया एसिड अटैक: पुलिस ने खोला हैरान कर देने वाला सच

जब दर्दनाक खबर ने दिल्ली को हिला दिया

सोचिए, सुबह उठते ही खबर आती है — “Delhi में एक छात्रा पर एसिड अटैक।”
हर कोई सहम जाता है। ठीक ऐसा ही हुआ पिछले महीने, जब एक 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा घायल हालत में अस्पताल पहुंची और दावा किया कि दो अज्ञात बाइक सवारों ने उस पर एसिड फेंका।

पूरे शहर में गुस्सा फैल गया। महिला सुरक्षा पर बहस शुरू हुई। लेकिन कुछ ही दिनों में इस कहानी का ऐसा मोड़ आया जिसने सबको सन्न कर दिया — यह हमला हुआ ही नहीं था।

शुरुआती दावा: एसिड अटैक और जनता की प्रतिक्रिया

छात्रा ने पुलिस को बताया कि देर रात हॉस्टल के पास दो लोग बाइक से आए और उसके चेहरे व हाथों पर एसिड फेंककर भाग गए।
पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज किया और छात्रा को अस्पताल भेजा। परिवार और दोस्तों ने भी घटना की पुष्टि की।

मीडिया ने इसे बड़े पैमाने पर उठाया —
“Delhi में फिर एसिड हमला”,
सोशल मीडिया पर #JusticeForDelhiStudent ट्रेंड करने लगा।
लोग गुस्से में थे, सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे थे।

लेकिन कुछ लोगों को शुरुआत से ही कहानी में खामियां दिखीं — कोई चश्मदीद नहीं, कोई आवाज़ नहीं सुनी गई। फिर भी सहानुभूति की लहर चल पड़ी।

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पुलिस की जांच में मोड़: शक की शुरुआत

अस्पताल में डॉक्टरों ने देखा कि जलन के निशान असमान हैं — जैसे किसी ने खुद तरल गिराया हो, न कि तेज़ी से फेंका गया हो।
फॉरेंसिक रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात आई —
कपड़ों पर मिला “एसिड” असल में एक घरेलू क्लीनर था, न कि तेज़ सल्फ्यूरिक एसिड।

पुलिस ने आसपास के CCTV फुटेज खंगाले। वीडियो में छात्रा अकेली दिखाई दी, कोई बाइक या संदिग्ध नहीं था।
उसके मोबाइल लोकेशन डेटा ने भी यही बताया — वह जगह पर अकेली थी।
फोन रिकॉर्ड में भी “हमले” के ठीक पहले एक दोस्त से शांत बातचीत मिली।

अब शक पक्का था — कहीं यह खुद से रचा गया नाटक तो नहीं?

साजिश का खुलासा: झूठे हमले के पीछे की मंशा

जांच में पता चला कि छात्रा ने यह पूरी कहानी खुद गढ़ी थी
कारण था — परिवार का दबाव और मानसिक तनाव।
घरवाले चाहते थे कि वह पढ़ाई छोड़कर शादी करे, जबकि वह करियर बनाना चाहती थी। उसने सोचा कि अगर “हमले” की कहानी बनेगी, तो परिवार उसे अकेला छोड़ देगा और लोग सहानुभूति दिखाएँगे।

उसने डायरी में पूरा प्लान लिखा था —
सस्ते केमिकल से “एसिड अटैक” का नाटक रचने और मीडिया को बुलाने की योजना।
यहाँ तक कि उसने अपने अंकों और कॉलेज विवादों से ध्यान हटाने के लिए भी यह चाल चली।

पुलिस ने इसे एक “सोची-समझी साजिश” बताया — झूठा मामला बनाकर सहानुभूति और प्रसिद्धि पाने की कोशिश।

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अन्य शामिल लोग और कानूनी कार्रवाई

पुलिस जांच में एक दोस्त का नाम भी सामने आया, जिसने उसे घरेलू क्लीनर लाकर दिया था।
हालाँकि, आख़िरी वक्त पर वह पीछे हट गई और पुलिस को सब सच बता दिया।
अब दोनों पर झूठी एफआईआर (IPC 182) और धोखाधड़ी (420) के तहत मामला दर्ज है।

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, झूठे आरोप लगाने पर दो साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
ऐसे मामलों से असली पीड़ितों पर विश्वास कमजोर होता है।

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न्याय प्रणाली पर असर और सबक

ऐसे झूठे मामलों से पुलिस और समाज दोनों को नुकसान होता है।
Delhi में पिछले साल एसिड अटैक मामलों में 20% की बढ़ोतरी दर्ज हुई, और इस तरह की फर्जी रिपोर्टें वास्तविक पीड़ितों की आवाज़ को कमजोर करती हैं

विशेषज्ञ कहते हैं —
“महिला सुरक्षा के लिए बने कानूनों का दुरुपयोग असली पीड़ितों के लिए नुकसानदायक है।”
साथ ही, जांच एजेंसियों को भी सलाह दी गई कि वे किसी भी मामले की जल्दी पुष्टि करें ताकि दोनों पक्षों के साथ न्याय हो सके।

सच्चाई की जीत और सावधानी की ज़रूरत

यह कहानी दिखाती है कि झूठ कितनी दूर तक जा सकता है —
अस्पताल से मीडिया तक, सोशल मीडिया से अदालत तक।
पुलिस ने मेहनत और तकनीक के ज़रिए सच सामने लाया।

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