Dharmendra

Dharmendra की अंतिम यात्रा: मौश्मी चटर्जी का दिल छू लेने वाला श्रद्धांजलि संदेश

समाचार ने मानो बिजली की तरह चेहरों पर झटका दिया — बॉलीवुड के युगीनायक Dharmendra अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके जाने से सिर्फ फिल्मों का एक सितारा नहीं, बल्कि एक पीढ़ी की यादें, उनका आत्मविश्वास और उनकी सरलता भी खो गई है।

उनकी पुरानी सह-कलाकार और दोस्त मौश्मी चटर्जी ने जो श्रद्धांजलि दी, वह आम शब्दों से कहीं गहराई में उतरती है। उन्होंने कहा,

“Dharmendra उनके आखिरी सांस तक एक आशीर्वाद बने रहे।”

यह पंक्ति सिर्फ एक संदेश नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का सार है — शक्ति, गर्मजोशी और एक इंसानियत जो अंत तक बनी रही।

Dharmendra का सिनेमा में अमिट योगदान

Dharmendra का जाना सिर्फ एक अभिनेता के निधन जैसा नहीं है, यह एक युग के खत्म होने जैसा है। छह दशकों से अधिक समय तक उन्होंने अपनी छवि, अभिनय और स्टारडम से दर्शकों के दिलों तक पहुंच बनाई।

उनकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई — फिल्मों जैसे दिल भी तेरा, हम भी तेरे। लेकिन असली पहचान उन्हें शोले (1975) के वीरू के किरदार से मिली, जहाँ उनकी जोड़ी और उनका हास्य आज भी याद किया जाता है।

फिर आई सीता और गीता (1972) — एक ही फिल्म में उनका डबल रोल, और स्क्रीन पर ज़िंदादिल जोड़ी। उनके साथ ही था हेमामालिनी, और यही उनकी असली और सिनेमाई जिंदगी को जोड़ता था।

300 से अधिक फिल्मों में, चाहे वह किसान का बेटा हो या सख्त पुलिसवाला, धर्मेंद्र ने हर किरदार में जान डाली। उनकी लेटेस्ट बड़ी हिट रही रॉकी और रानी की प्रेम कहानी (2023), जो साबित करती है कि 88 की उम्र में भी उनकी चमक में कमी नहीं आई थी। उन्हें पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा गया था, और उनकी फिल्मों ने आज की नज़र से भी बड़ी कमाई और लोकप्रियता हासिल की।

उद्योग और जनता का शोक

उनके जाने की खबर मिलते ही बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ गई। उनके बेटे सनी देओल ने सोशल मीडिया पर भावुक नोट साझा किया। अमिताभ बच्चन ने उन्हें “हाथी समान साथी” कहा।

When Dharmendra tried hiding beer as 'Lassi', Moushumi Chatterjee exposed  the prank

मुंबई में उनके आवास के बाहर फूलों की सौगात आई, प्रशंसकों ने श्रद्धांजलि दी। सोशल मीडिया पर #RIPDharmendra ट्रेंड हुआ — यह दिखाता है कि धर्मेंद्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक भावना, एक युग, एक आदर्श थे।

मौश्मी चटर्जी की शोक-संदेश सबसे अलग महसूस हुई क्योंकि वह केवल अभिनय की तारीफ नहीं कर रही थीं — वह दोस्त की, मानवीय आत्मा की बात कर रही थीं। उनकी भावनाएँ इतनी जमीनी थीं कि यह औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि परिवार का अलविदा लग रही थी।

Dharmendra का ऑन-स्क्रीन व्यक्तित्व

Dharmendra को “ही-मान” कहा गया — मसल्स, एक्शन, बुलंद आवाज़ और डॉन – वह इस छवि में फिट बैठे। लेकिन उनकी असली ताकत उनकी मल्टी-डायमेंशनल भूमिका थीं:

  • चुपके चुपके जैसे कॉमेडी में, वह मजाकिया, चंचल और बहुत प्यारे थे।

  • धरम वीर जैसी फिल्मों में उनकी आँखों में दर्द और जीवन की गंभीरता झलकती थी।

  • ऑफ़-स्क्रीन, उन्होंने नए कलाकारों की मदद की, पर मार्गदर्शन दिया — इससे पता चलता है कि उनका व्यक्तित्व सिर्फ बड़े पर्दे तक सीमित नहीं था।

वो मजबूत पेड़ की तरह थे — शाखाएँ उनकी एक्शन भूमिकाओं की, और जड़े उनकी संवेदनशीलता की। यह मिश्रण ही ऐसा था, जिसने उन्हें सभी उम्र और पृष्ठभूमि के दर्शकों का प्रिय बनाया।

मौश्मी चटर्जी: न सिर्फ़ सह-कलाकार, बल्कि दोस्त

मौश्मी चटर्जी और धर्मेंद्र का रिश्ता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था।

  • पहली बार उन्होंने साथ काम किया रोटी कपड़ा और मकान (1974) में, जहां धर्मेंद्र एक यूनियन नेता बने और मौश्मी उनकी पत्नी।

  • उसी साल डो चोर जैसी फिल्मों में उनकी केमिस्ट्री ने दर्शकों का मन जीत लिया।

सेट पर उनकी बातचीत, चाय की चुस्कियाँ, मुश्किल शूट के दिनों की साझा यादें — यह सब दर्शाता है कि वे सिर्फ सह-कलाकार नहीं, बल्कि दोस्त भी थे। मौश्मी ने कई बार बताया कि धर्मेंद्र ने उन्हें कठिन समय में हौसला दिया, उनकी मदद की।

उनकी यह दोस्ती सालों तक चली। पुरस्कार समारोहों में हाथ पकड़कर हँसना, पुरानी यादें शेयर करना — उनकी बॉन्डिंग “काम से आगे” थी।

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“आशीर्वाद तक आखिरी सांस तक” — विश्लेषण

मौश्मी की यह पंक्ति बहुत गहरी है। यह सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं — एक दर्शन है:

  • वह बता रही हैं कि धर्मेंद्र ने अपनी ज़िन्दगी के अंतिम पलों में भी दूसरों के लिए आशीर्वाद बने रहे।

  • उनकी आखिरी दिनचर्या शांत और गरिमापूर्ण थी — बीमारी या पीड़ा के बावजूद, उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों को अपने उत्साह और अपनत्व से महसूस कराया।

  • यह वाक्य ये दर्शाता है कि उनकी “दीप” हमेशा जलती रही — मौत उनका प्रकाश नहीं बुझा सकी।

यह श्रद्धांजलि हमें सांत्वना देती है। यह कहती है कि मृत्यु उनका चरित्र या आत्मा नहीं छीन सके—वो हमेशा एक “आशीर्वाद” रहेंगे, हमारी यादों में।

अंतिम संस्कार की झलक

Dharmendra की अंतिम यात्रा मुंबई के एक शांत स्मशान घाट में हुई। मौश्मी चटर्जी वहाँ सबसे पहले पहुँची थीं, आँखों में आंसू, पर कदम स्थिर। उन्होंने पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज़ के साथ अंतिम संस्कार संपन्न किया — चंदन की खुशबू, मंत्रोच्चार और पुष्पांजलियाँ चारों ओर थीं।

मौश्मी ने बताया कि उनका चेहरा शांत था, ऐसे लग रहा था जैसे वे मुस्कुरा रहे हों। लोग एक-एक कर बैठे, कुछ चुपचाप मंत्र जपते, कुछ उनकी पुरानी फिल्मों की यादें साझा करते।

मौजूद प्रमुख हस्तियाँ और भावुक दृश्य

संस्कार में फिल्म जगत की कई बड़ी शख्सियतें शामिल थीं:

  • हेमा मालिनी, उनकी जीवनसंगीनी, उनकी तस्वीर पकड़े रो रही थीं।

  • उनके बेटे बॉबी देओल और सनी देओल भावुक और गर्वित बने रहे।

  • रेखा, जीतेन्द्र, रणधीर कपूर जैसे सितारे भी धर्मेंद्र को अंतिम श्रद्धांजलि देने आए।

मौमशी ने सबको गले लगाया, कुछ पुरानी यादें साझा कीं, और यह दिखाया कि यह सिर्फ सार्वजनिक अलविदा नहीं, बल्कि बेहद निजी था।

शोक और सम्मान की वातावरण

संस्कार के समय वहां की हवा भारी थी — धूप, धूप – दान, हवन की खुशबू, और चुप्पी जो इंसानियत की गहराई बयां कर रही थी। लेकिन उस उदासी में भी कभी-कभी हल्की मुस्कान उभर जाती थी, जब यादों के किस्से सुनाए जाते।

मौश्मी ने एक कविता जैसा संदेश भी दिया — उसकी आवाज़ टूट रही थी, लेकिन शब्दों में विश्वास और प्यार था। कुछ पल गंभीर थे, कुछ लम्हे हास्य की याद दिला रहे थे—ठीक उसी तरह जैसे धर्मेंद्र की ज़िंदगी थी।

सिनेमा में दोस्ती, और दोस्ती में सिनेमा

मौश्मी की श्रद्धांजलि हमें यह याद दिलाती है कि बॉलीवुड सिर्फ ग्लैमर नहीं है—यह बंधनों, दोस्ती और लंबे सफर की जगह भी है। धर्मेंद्र सिर्फ एक बड़े अभिनेता नहीं थे; वह एक साथी, एक मार्गदर्शक और एक इंसान थे।

उनकी दोस्ती और संबंधों की गहराई उन्हें और भी प्यारा बनाती है। और मौश्मी का शब्द—“आशीर्वाद” —यह दर्शाता है कि उनका प्रभाव सिर्फ पर्दे तक सीमित न था, बल्कि उनकी ज़िंदगी में हर रिश्ते में बसा था।

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पिछली श्रद्धांजलियों से तुलना

जब कोई महान हस्ती चली जाती है, तो श्रद्धांजलियाँ आती हैं — लेकिन मौماشमी का संदेश कुछ अलग था:

  • कई सितारे औपचारिक शब्दों में उन्हें “दिग्गज” कह रहे थे,

  • महापुरुषों की उपलब्धियाँ गिना रहे थे,

  • लेकिन मौश्मी ने अपनी अंतरंग जुड़ाव की बात कही — दोस्ती, आत्मीयता और इंसानी स्पर्श।

यह ठीक उतना ही असरदार था जितना कि किसी पुरस्कार समारोह की बड़ी घोषणा; क्योंकि यह याद दिलाता है कि मेंहदी और रील लाइफ से बढ़कर असली जीवन था।

उनकी विरासत को जीवित रखने का तरीका

Dharmendra की याद को सिर्फ़ शब्दों में ही नहीं, कर्मों में भी ज़िंदा रखा जा सकता है:

  1. उनकी फिल्मों को फिर देखेंशोले, सीता और गीता, चुपके चुपके जैसी क्लासिक्स को दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें।

  2. उनकी कहानियाँ फैलाएँ — सोशल मीडिया पर उनके प्रेरणादायक संवाद शेयर करें।

  3. सिनेमा संग्रह और संरक्षण को सपोर्ट करें — फिल्म संग्रहालयों या आर्काइव्स में योगदान दें।

इन छोटे मगर अर्थपूर्ण कदमों से उनकी विरासत सिर्फ याद नहीं बनेगी, बल्कि आगे भी रोशन रहेगी।

Dharmendra का अमर अध्याय

Dharmendra की अंतिम यात्रा हमें यह सिखाती है कि महानता सिर्फ प्रदर्शन में नहीं, इंसानियत में होती है।
उनका जीवन — चढ़ावों, हँसी, दोस्ती और संघर्षों से भरा — हमें याद दिलाता है कि स्क्रीन के बाहर भी एक सच्चा हीरो था।

मौश्मी चटर्जी की श्रद्धांजलि — “एक आशीर्वाद उनकी आखिरी सांस तक” — हमें ये एहसास कराती है कि उनकी आत्मा, उनकी गरिमा और उनका प्यार आज भी हमारे बीच जीवन्त है।

हमने एक सितारे को खोया है, लेकिन उनका प्रकाश, उनकी गर्मजोशी, उनकी कहानियाँ — सब हमारे साथ हैं।

उनकी फिल्मों को याद करें, उनकी बातें दोहराएँ, और उनके चरित्र को जीने दें — यही उनका सबसे बड़ा सम्मान होगा।

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