Election आयोग की सख़्त चेतावनी: पश्चिम बंगाल के गैर-अनुपालन संकट की पड़ताल
भारत के Election परिदृश्य में एक बार फिर तनाव उभर आया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल की राज्य मशीनरी पर तीखी नाराज़गी जताई है। ज़रा सोचिए—लोकतंत्र के प्रहरी, जिन पर निष्पक्ष और स्वतंत्र Election कराने की ज़िम्मेदारी है, अब एक बड़े राज्य से टकराव की स्थिति में हैं। हालिया लोकसभा चुनावों और उपचुनावों में आयोग ने बार-बार ऐसे मामलों को चिन्हित किया है जहाँ नियमों का पालन नहीं हुआ। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र में लोगों के भरोसे पर सीधा प्रहार है।
संविधान के तहत Election आयोग की भूमिका पवित्र मानी जाती है। उसका काम है चुनावों को निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी बनाए रखना। जब राज्य सरकारें आदेशों को नज़रअंदाज़ करती हैं या टालमटोल करती हैं, तो लोकतंत्र की नींव हिलती है। मतदाता सोचने लगते हैं—क्या उनके वोट की सच में कोई अहमियत है? आइए समझते हैं कि पश्चिम बंगाल के गैर-अनुपालन को लेकर चुनाव आयोग की नाराज़गी आखिर क्यों चरम पर है।
Election आयोग की नाराज़गी के मूल कारण
पश्चिम बंगाल का Election माहौल अक्सर तनावपूर्ण रहा है। आयोग की चेतावनियाँ साफ़ तौर पर प्रशासनिक विफलताओं की ओर इशारा करती हैं। ये छोटी-मोटी चूक नहीं, बल्कि सुरक्षा, निष्पक्षता और नियम पालन जैसे बुनियादी मुद्दे हैं।
गैर-अनुपालन के प्रमुख क्षेत्र
राज्य अधिकारियों पर चुनाव आयोग के आदेशों को समय पर लागू न करने के आरोप लगे हैं। Election के दौरान केंद्रीय बलों की तैनाती बेहद ज़रूरी होती है, खासकर संवेदनशील इलाकों में। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार जैसे जिलों में केंद्रीय बलों को प्रवेश की अनुमति देने में देरी हुई।
फरवरी 2026 की एक प्रेस विज्ञप्ति में आयोग ने इस देरी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे मतदान के दिन अव्यवस्था फैल सकती है।
मतदाता सूची भी एक बड़ा मुद्दा है। आयोग ने पाया कि वोटर लिस्ट को अपडेट करने में अनावश्यक देरी की गई, जिससे फर्जी नाम शामिल होने का खतरा बढ़ता है। कुछ जिलों में अधिकारियों ने नामों के त्वरित सत्यापन के निर्देशों को नज़रअंदाज़ किया। यही समस्या 2024 के उपचुनावों में भी सामने आई थी।
एक हालिया सलाह में आयोग ने इन चूकों को “सुचारु Election में अस्वीकार्य बाधाएँ” बताया और वरिष्ठ राज्य अधिकारियों को तलब किया। यदि सुधार नहीं हुए, तो आने वाले चुनावों में जोखिम और बढ़ सकता है।

आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन
आदर्श आचार संहिता Election मैदान में रेफरी की तरह काम करती है। यह सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और भड़काऊ भाषणों पर रोक लगाती है। पश्चिम बंगाल में आयोग ने कई ऐसे उल्लंघनों पर आपत्ति जताई है जहाँ सरकारी कामकाज और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रचार के बीच की रेखा धुंधली हो गई।
उदाहरण के तौर पर, Election के दौरान सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया गया—जबकि MCC का अनुच्छेद 4 इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है। कोलकाता के उपनगरों में पिछले वर्ष ऐसी घटनाओं पर आयोग ने जुर्माना लगाया और प्रचार विज्ञापनों को हटाने के आदेश दिए।
यह क्यों मायने रखता है? क्योंकि जब एक पक्ष नियम तोड़ता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। भाजपा और सीपीआई(एम) जैसी विपक्षी पार्टियों ने 2024 से अब तक MCC उल्लंघन को लेकर दर्जनों शिकायतें दर्ज कराई हैं। जब राज्य प्रशासन इन पर त्वरित कार्रवाई नहीं करता, तो पक्षपात की आशंका और गहरी होती है।
प्रशासनिक देरी और सहयोग की कमी
Election में लॉजिस्टिक्स बेहद अहम होते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में पुलिस और जिला प्रशासन आयोग के निर्देशों—जैसे पक्षपाती अधिकारियों के तबादले या कार्यक्रमों की अनुमति—को लागू करने में पीछे रहा है।
नंदीग्राम के एक उपचुनाव में बलों की तैनाती को लेकर हफ्तों तक पत्राचार चलता रहा। राज्य विभाग इसे प्रक्रियागत बाधा बताते हैं, लेकिन आयोग इसे जानबूझकर की गई देरी मानता है।
2026 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक रूप से जुड़े 50 से अधिक अधिकारियों के तबादले अब तक लंबित थे। ग्रामीण इलाकों में तो हालात और खराब रहे—मतदान केंद्र देर से तैयार हुए, जिससे मतदाताओं में असंतोष फैला। आयोग का कहना है कि ऐसी देरी अविश्वास को जन्म देती है।
संवैधानिक अधिकार और Election आयोग की शक्तियाँ
Election आयोग सिर्फ़ चेतावनी नहीं देता—उसके पास ठोस अधिकार भी हैं। पश्चिम बंगाल के साथ चल रहा यह टकराव उन्हीं शक्तियों की असली परीक्षा है।

अनुच्छेद 324 के तहत अधिकार
संविधान का अनुच्छेद 324 Election आयोग को चुनाव से जुड़े हर पहलू पर पूर्ण अधिकार देता है—मतदाता सूची से लेकर मतदान प्रक्रिया तक। कोई भी राज्य सरकार इन अधिकारों को चुनौती नहीं दे सकती।
पश्चिम बंगाल के मामले में यही अनुच्छेद आयोग को सख़्त रुख अपनाने की ताकत देता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आयोग का “ट्रम्प कार्ड” है, जिससे वह बिना अदालत की देरी के तुरंत कार्रवाई कर सकता है।
प्रवर्तन के साधन: कारण बताओ नोटिस और निगरानी
आयोग के पास “कारण बताओ नोटिस” जैसे प्रभावी हथियार हैं। 2025 में बलों की तैनाती में देरी को लेकर कई जिला मजिस्ट्रेटों को ऐसे नोटिस भेजे गए।
यदि जवाब संतोषजनक न हो, तो आयोग मुख्य सचिवों को तलब कर सकता है या राज्यपाल से हस्तक्षेप की सिफारिश कर सकता है। पिछले वर्ष दो आईपीएस अधिकारियों का तबादला आयोग की आपत्तियों के बाद हुआ।
इसके अलावा, विशेष पर्यवेक्षकों की तैनाती कर ज़मीनी स्तर पर निगरानी बढ़ाई जाती है। बंगाल में 20 से अधिक संवेदनशील क्षेत्रों को अतिरिक्त निगरानी में रखा गया है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: पश्चिम बंगाल में चुनावी टकराव का इतिहास
यह पहली बार नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाटपाड़ा जैसे इलाकों में हिंसा पर आयोग और राज्य के बीच टकराव हुआ। 2021 के विधानसभा चुनावों में MCC उल्लंघनों को लेकर 100 से अधिक निर्देश जारी किए गए।
2024 के उपचुनावों में दक्षिण 24 परगना में मतदाता सूची से जुड़ी वही पुरानी समस्याएँ दोहराईं गईं। साफ़ है—जहाँ मुकाबला कड़ा होता है, वहाँ तनाव भी बढ़ता है।
अन्य राज्यों से तुलना करें तो केरल और तमिलनाडु में चुनाव अपेक्षाकृत शांत रहे, इसलिए आयोग का हस्तक्षेप भी कम रहा। वहीं उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हिंसा और प्रशासनिक खींचतान के कारण सख़्ती ज़्यादा दिखती है।
Election निष्पक्षता और मतदाता विश्वास पर असर
गैर-अनुपालन का असर सीधा आम नागरिक पर पड़ता है। जब सुरक्षा में देरी होती है या अधिकारी पक्षपाती लगते हैं, तो लोग मतदान से कतराने लगते हैं।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर खतरा
विपक्षी दलों का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल के प्रभाव में प्रशासन निष्पक्षता खो देता है। नागरिक संगठनों का भी कहना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रशासन का तटस्थ होना ज़रूरी है।
जब मतदाता को डर या दबाव महसूस हो, तो लोकतंत्र कमज़ोर पड़ता है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
2024 के उपचुनावों में जिन जिलों में नियमों का पालन हुआ, वहाँ मतदान प्रतिशत 75% तक रहा। वहीं समस्याग्रस्त इलाकों में यह घटकर 62% रह गया। राज्य में 300 से अधिक अनियमितताओं की शिकायतें दर्ज हुईं—जबकि अन्य राज्यों में यह संख्या लगभग आधी थी।
जहाँ केंद्रीय बल समय पर पहुँचे, वहाँ हिंसा में 40% तक कमी देखी गई। इससे साफ़ है कि अनुपालन का सीधा असर Election माहौल पर पड़ता है।
अनुपालन और जवाबदेही की राह
पश्चिम बंगाल में चुनावी गैर-अनुपालन का संकट अब निर्णायक मोड़ पर है। Election आयोग की सख़्त चेतावनी साफ़ संकेत है—अब और ढील नहीं।
Election आयोग की “रेड लाइन”
बलों की तैनाती: केंद्रीय बलों को बिना देरी तैनात किया जाए
MCC का पालन: विज्ञापनों और भाषणों में नियमों का सख़्त पालन
प्रशासनिक गति: समय पर तबादले और मतदाता सूची अपडेट
सहयोग: जिला अधिकारी साप्ताहिक रिपोर्ट आयोग को दें
ये शर्तें अटल हैं। अगर राज्य प्रशासन ने अब भी सुधार नहीं किया, तो लोकतांत्रिक विश्वास और कमजोर होगा।
आगे की राह साफ़ है—पारदर्शिता, सहयोग और ईमानदार अनुपालन। जब चुनाव निष्पक्ष होते हैं, तो मतदाता का भरोसा बढ़ता है और लोकतंत्र मज़बूत होता है।
आप क्या सोचते हैं? पश्चिम बंगाल इस स्थिति से कैसे उबर सकता है? आइए, निष्पक्ष चुनावों के लिए मिलकर आवाज़ उठाएँ।
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