Election आयोग का नोटिस प्रशांत किशोर को: दो राज्यों की वोटर लिस्ट में नाम, बड़ा विवाद
राजनीतिक गलियारों में हलचल तब मच गई जब देश के सबसे चर्चित चुनाव रणनीतिकारों में से एक प्रशांत किशोर को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से नोटिस मिला।
आरोप है कि उनका नाम दो अलग-अलग राज्यों — बिहार और आंध्र प्रदेश — की वोटर लिस्ट में दर्ज है।
Election आयोग ने इसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) के संभावित उल्लंघन के रूप में देखा है।
मुख्य विवाद: एक व्यक्ति, दो वोटर लिस्ट
भारत के चुनाव कानून के अनुसार, कोई भी नागरिक एक समय में केवल एक निर्वाचन क्षेत्र (constituency) में ही वोटर के रूप में पंजीकृत हो सकता है।
धारा 23 (Section 23) के तहत यह स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम दो सूचियों में पाया जाता है, तो यह अवैध माना जाएगा।
ऐसी स्थिति में नाम रद्द किया जा सकता है और सजा या जुर्माना भी संभव है।
ECI की जांच में पता चला कि प्रशांत किशोर का नाम
बिहार की एक निर्वाचन सूची में (जहाँ वे रहते हैं और सक्रिय राजनीति में हैं),
और
आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा क्षेत्र की लिस्ट में
दोनों जगह दर्ज है।
अब आयोग ने उनसे जवाब मांगा है कि यह गलती कैसे हुई।
कानून और “वन एन्लोलमेंट” सिद्धांत
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 में “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत की गारंटी दी गई है।
अगर कोई नागरिक स्थान बदलता है, तो उसे पुरानी वोटर लिस्ट से नाम हटवाकर नई जगह पंजीकरण करवाना चाहिए।
अगर यह कदम छोड़ा जाता है, तो “डुप्लिकेट एनरोलमेंट” बन जाता है।

ECI अब डिजिटल सॉफ्टवेयर से पूरे देश की मतदाता सूचियों को मिलान करता है ताकि डुप्लिकेट नामों को पकड़ा जा सके।
नियमों के उल्लंघन पर ₹1000 तक का जुर्माना या तीन महीने तक की जेल हो सकती है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और प्रशांत किशोर की सफाई
नोटिस के बाद राजनीति में बयानबाज़ी तेज़ हो गई।
भाजपा नेताओं ने इसे “Election ईमानदारी की रक्षा के लिए जरूरी कदम” बताया।
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इसे “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” कहा, यह दावा करते हुए कि सरकार के आलोचकों को निशाना बनाया जा रहा है।
नीतीश कुमार खेमे ने इस पर चुप्पी साधी, लेकिन सूत्रों के अनुसार, पुराने मतभेदों के चलते इसमें राजनीतिक रंग भी देखा जा रहा है।
प्रशांत किशोर की प्रतिक्रिया:
उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि “आंध्र प्रदेश की एंट्री मेरे छात्रकाल की पुरानी गलती है। मैं अब बिहार में स्थायी रूप से रहता हूँ और इसे जल्द सुधार लूँगा।”
उनकी टीम ने भी आयोग से पूरा सहयोग देने की बात कही है।
चुनाव आयोग की भूमिका और निष्पक्षता पर सवाल
ECI का कहना है कि वह हर नागरिक पर समान नियम लागू करता है — चाहे वह आम वोटर हो या बड़ा नेता।
आयोग ने पहले भी कई नेताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की है।
2019 में भी उत्तर प्रदेश में हजारों फर्जी नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे।
हालाँकि, कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि
ऐसे मामलों में पारदर्शिता और समानता ज़रूरी है ताकि पक्षपात के आरोपों से बचा जा सके।
ECI ने कहा है कि वह राज्य के चुनाव अधिकारियों से पूरी जांच रिपोर्ट मांगेगा और
यदि यह गलती मात्र तकनीकी है, तो केवल अतिरिक्त नाम हटाया जाएगा।
आगे की प्रक्रिया और संभावित परिणाम
प्रशांत किशोर को कुछ हफ्तों में जवाब देना होगा।
ECI उनके पते और दस्तावेजों की जांच करेगा।
यदि यह “अनजाने में हुई त्रुटि” साबित हुई, तो सिर्फ एक प्रविष्टि हटाई जाएगी।
अगर जानबूझकर किया गया माना गया, तो धारा 31 के तहत दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि “यह मामला अदालत तक जा सकता है,
और इसके नतीजे भविष्य में अन्य राजनीतिक हस्तियों के लिए भी मिसाल बनेंगे।”
लोकतंत्र में नियम सबके लिए समान
यह घटना हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की नींव साफ़-सुथरी वोटर लिस्टों पर टिकी है।
चाहे आम नागरिक हो या बड़ा राजनीतिक चेहरा —
हर किसी को एक वोट, एक नाम, एक स्थान के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
मुख्य बातें:
दो राज्यों में नाम होना कानून का उल्लंघन है।
ECI की सख्ती पारदर्शी चुनाव के लिए ज़रूरी है।
नागरिकों को अपने वोटर रिकॉर्ड की समय-समय पर जांच करनी चाहिए।
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