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अहमद पटेल के बेटे का तीखा वार: राहुल-प्रियंका ‘लॉस्ट गांधी’, क्या अब शशि थरूर को नेतृत्व संभालना चाहिए?

भारतीय राजनीति की कड़वी दुनिया में एक अप्रत्याशित हमला भी हलचल मचा देता है। Ex कांग्रेस दिग्गज अहमद पटेल के बेटे फैसल पटेल ने ऐसा ही धमाका किया है—उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को “लॉस्ट गांधी” कहा है। उनका मानना है कि अब दोनों को पीछे हटकर शशि थरूर जैसे नेताओं को आगे आने देना चाहिए।
यह केवल परिवार का मामला नहीं; यह कांग्रेस के भीतर उभरती दरारों का संकेत है। अहमद पटेल पार्टी को जोड़कर रखने वाले कद्दावर नेता थे, इसलिए उनके बेटे की आलोचना और भी ज्यादा असर करती है।

आइए समझते हैं कि यह टिप्पणी कांग्रेस के भविष्य, आंतरिक राजनीति, और नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं के लिए क्या मायने रखती है।

विरासत पर सवाल: अहमद पटेल की छाया-Ex 

अहमद पटेल: सहमति के निर्माता

अहमद पटेल ने दशकों तक पर्दे के पीछे रहकर कांग्रेस को संभाला। वे दिल्ली और राज्यों के नेताओं के बीच पुल की तरह थे। उनकी रणनीति व्यवहारिक थी—दिखावे से ज्यादा नतीजों पर ज़ोर।
2020 में उनकी मृत्यु के बाद पार्टी में वह सामंजस्य देखने को नहीं मिला। 2024 के चुनावों में कांग्रेस सिर्फ 99 सीटों पर सिमट गई—ऐसी चूकें जो शायद अहमद पटेल पहले ही भांप लेते।

वे पार्टी की ‘गोंद’ थे—जो विवादों को फटने से पहले ही सुलझा देते थे।

कांग्रेस में पीढ़ीगत टकराव-Ex

पुरानी पीढ़ी—जैसे अहमद पटेल—स्थानीय नेटवर्क, मेहनत और व्यावहारिक राजनीति पर चले।
नई पीढ़ी—राहुल और प्रियंका—आधुनिक चेहरा लेकर आई, लेकिन आलोचकों का कहना है कि उनका दायरा सीमित है और वे अपने करीबी सर्कल तक ही सीमित रहते हैं।

2025 के आंतरिक सर्वे में 60% कार्यकर्ताओं ने कहा कि पार्टी में संवाद की कमी है और फैसले शीर्ष नेतृत्व के छोटे दायरे से आते हैं।

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फैसल पटेल की राजनीतिक राह

अहमद पटेल की मृत्यु के बाद फैसल राजनीति में सक्रिय हुए, लेकिन उन्हें पार्टी से वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
उनकी नाराज़गी शायद इसी से उपजी।
उनका हालिया ट्वीट—“लॉस्ट गांधीज़”—कुछ ही दिनों में 50,000 से अधिक लाइक्स बटोर गया।

यह उनके राजनीतिक रुख में बड़ा मोड़ है।

‘लॉस्ट गांधी’ टिप्पणी को समझना-Ex

‘लॉस्ट’ का कांग्रेस की रणनीति में अर्थ

फैसल का मतलब साफ है—गांधी भाई-बहन दिशा खो चुके हैं।
वे जनता से कटे हुए नजर आते हैं।
हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन का उदाहरण दिया जा रहा है।

राहुल और प्रियंका भावनात्मक मुद्दों पर जोर देते हैं, लेकिन ग्रामीण और रोजगार संबंधित मुद्दों पर उनकी पकड़ कमजोर बताई जा रही है।

2019 के बाद से कांग्रेस का ग्रामीण वोट शेयर 20% गिरा—फैसल का तंज इसी पर है।

गांधी नेतृत्व बनाम संगठनात्मक हकीकत

2023 के मध्य प्रदेश चुनाव—कांग्रेस जीत के आसार होने के बावजूद बुरी तरह हार गई।
UP में प्रियंका की सक्रियता के बावजूद 2024 में कांग्रेस सिर्फ 7 सीटें ला सकी।

अहमद पटेल के दौर में संगठन बेहद मजबूत था—अब फैसले अक्सर वफादारी पर आधारित बताए जाते हैं, क्षमता पर नहीं।

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हाई कमांड कल्चर का असर

कांग्रेस का हाई कमांड मॉडल—जहाँ हर फैसला दिल्ली से आता है—लोगों में असंतोष पैदा कर रहा है।
2025 के एक सर्वे में 45% कार्यकर्ताओं ने इसे समस्या बताया।

फैसल पटेल की आलोचना इसी दर्द को उजागर करती है।

शशि थरूर: बदलाव की संभावित दिशा?-Ex

थरूर: बौद्धिक और आधुनिक चेहरा

शशि थरूर कांग्रेस में एक अलग पहचान रखते हैं—वैश्विक अनुभव, किताबें, भाषण, और डिजिटल कनेक्ट।
वह गांधी परिवार के दबाव से मुक्त हैं, इसलिए बदलाव की मांग करने वालों को वे पसंद आते हैं।

युवा वोटरों में उनकी अपील है—वे कांग्रेस के ‘आधुनिक चेहरे’ की तरह उभरे हैं।

थरूर की नेतृत्व क्षमता: आंकड़ों और अनुभव से विश्लेषण-Ex

  • वे केरल की तिरुवनंतपुरम सीट तीन बार बड़े अंतर से जीत चुके हैं।

  • उनकी ताकत भाषण, नीतिगत समझ और दृष्टि में है।

  • उनकी कमजोरी—मजबूत जमीनी ढांचे का अभाव और ‘अत्यधिक शहरी’ छवि।

India Today के 2025 सर्वे में 30% लोगों ने कहा कि थरूर प्रधानमंत्री चेहरे के रूप में विकल्प हो सकते हैं।

G23 और अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

G23 समूह—जिसने 2020 से कांग्रेस में सुधार की मांग की थी—थरूर को सकारात्मक विकल्प मानता है।
मनीष तिवारी जैसे नेताओं ने भी खुले नेतृत्व चुनाव की मांग दोहराई।

बीजेपी इसे कांग्रेस की कमजोरी बताकर प्रचार कर रही है, लेकिन पार्टी के अंदर इसे सुधार के मौके के रूप में देखा जा रहा है।

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कांग्रेस की एकता और भविष्य पर असर-Ex

आंतरिक असंतोष को बढ़ावा

फैसल पटेल की टिप्पणी पार्टी में हलचल मचा सकती है—क्योंकि यह एक बड़े नेता के परिवार से आई है।
इससे अन्य असंतुष्टों को भी बोलने का साहस मिल सकता है।

2022 जैसी टूट—जब 20 सांसद पार्टी छोड़ गए—दोबारा हो सकती है।

गांधी परिवार की चुनौती: संदेश और रणनीति-Ex

राहुल और प्रियंका एक कठिन स्थिति में हैं—

  • प्रतिक्रिया दें तो विवाद बढ़ेगा,

  • चुप रहें तो आलोचना मजबूत होगी।

उन्हें या तो संवाद बढ़ाना होगा या आंतरिक सुधार की दिशा में कदम उठाने होंगे।

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समाधान: पुराने और नए का संतुलन-Ex

कांग्रेस को आंतरिक विश्वास बहाल करने के लिए चाहिए:

  • वरिष्ठ नेताओं और पुराने परिवारों को रणनीति में स्थान

  • राज्य इकाइयों को अधिक अधिकार

  • युवा नेताओं को प्रशिक्षण

  • निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता

यही कदम पार्टी को पुनर्जीवित कर सकते हैं।

आंतरिक मतभेदों की कीमत-Ex

फैसल पटेल का “लॉस्ट गांधीज़” बयान एक चेतावनी है—कांग्रेस की गहरी समस्याओं का संकेत।
गांधी परिवार बनाम बदलाव की मांग—यह टकराव आगे और बढ़ सकता है।

भारत की राजनीति में विपक्ष की मज़बूती जरूरी है।
कांग्रेस तभी उभर सकती है जब वह आलोचना सुने, सत्ता साझा करे और नए नेताओं को जगह दे।

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