जब राष्ट्रवाद टकराता है राजनीति से: बिहार चुनावों में कांग्रेस की बार-बार लौटती “वंदे मातरम्” दुविधा -History
चित्र कीजिए:
बिहार एक बार फिर गरम चुनावी जंग के लिए तैयार है — और तभी एक पुराना सुर फिर गूंज उठता है, जो कांग्रेस के लिए हमेशा असहज सवाल बन जाता है। “वंदे मातरम्” — आज़ादी की लड़ाई का वो जोश भरा गीत — चुनावों के मौसम में जैसे किसी भूत की तरह लौट आता है। यह कांग्रेस की उस पुरानी दुविधा को फिर उजागर करता है: एकता बनाम राष्ट्रीय गौरव की मुखरता, खासकर तब जब हर वोट की कीमत होती है।
यह कोई नया विवाद नहीं। बिहार जैसे संवेदनशील राज्यों में “वंदे मातरम्” बार-बार चुनावी बहस का केंद्र बनता है। कांग्रेस को हर बार यह तय करना पड़ता है कि वह समावेशिता का रास्ता चुने या बहुसंख्यक भावनाओं की धारा में बहे।
History संदर्भ: वंदे मातरम् और राजनीतिक पहचान का विकास
गीत का जन्म और राष्ट्रवादी जुड़ाव
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1876 में “वंदे मातरम्” लिखा, जो उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। तब ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष उभर रहा था।
1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत जन-जन की आवाज़ बन गया। रैलियों में, सभाओं में, गुप्त बैठकों में इसे गाया गया। यह “स्वदेश” और “स्वराज” की भावना का प्रतीक बन गया।
इस गीत ने मातृभूमि को देवी रूप में चित्रित किया — जिससे लोगों में गहरी भावनात्मक एकता पैदा हुई। इस तरह यह कविता और प्रतिरोध दोनों का प्रतीक बन गई।

कांग्रेस की बदलती स्थिति: स्वीकृति से असमंजस तक
शुरुआती कांग्रेस नेताओं ने इसे पूरी तरह अपनाया।
1896 के कलकत्ता अधिवेशन में इसे सार्वजनिक रूप से गाया गया। गांधी और अन्य नेताओं ने इसे आज़ादी की भावना जगाने का औज़ार माना।
लेकिन 1930 के दशक में मतभेद उभरने लगे।
कई मुस्लिम नेताओं को लगा कि इसके कुछ शब्द अत्यधिक धार्मिक (हिंदू) प्रतीकों से जुड़े हैं। तब कांग्रेस ने सिर्फ शुरुआती दो पद ही इस्तेमाल करने का फैसला किया ताकि सभी को साथ रखा जा सके।
आज़ादी के बाद यह सतर्कता और बढ़ी। पंडित नेहरू और अन्य नेताओं ने कहा कि भारत की एकता किसी एक धार्मिक प्रतीक से नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रवाद से बनी रहे।
आधुनिक राजनीतिक रणभूमि: बिहार चुनाव एक उदाहरण
भाजपा की रणनीति: प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद को हथियार बनाना
भाजपा वंदे मातरम् को चुनावी नारों में तब्दील करने में माहिर है।
2015 के बिहार चुनावों में भाजपा नेताओं ने इसे स्कूलों में रोज़ गाने की मांग उठाई — ताकि विरोधियों को “कमज़ोर राष्ट्रवादी” दिखाया जा सके।
2025 के चुनावों से पहले भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।
सोशल मीडिया पर भाजपा रैलियों में इस गीत के वीडियो वायरल किए जा रहे हैं।
यह भावनात्मक कार्ड swing voters को प्रभावित करता है और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला देता है।
कांग्रेस की मुश्किल: धर्मनिरपेक्षता की परीक्षा
कांग्रेस के लिए यह रस्साकशी कठिन है।
पुराने नेता इसकी सेक्युलर पहचान पर जोर देते हैं, जबकि युवा नेता भाजपा जैसी प्रखर राष्ट्रवादी छवि चाहते हैं।
बिहार में राहुल गांधी जैसे नेता इससे जुड़े सवालों से बचते रहे हैं।
2020 की एक रैली में स्थानीय कांग्रेस नेता ने कहा था — “हम गीत का सम्मान करते हैं, पर किसी पर इसे थोपना सही नहीं।”
यह बयान दोनों ओर से आलोचना का कारण बना।

कांग्रेस के भीतर भी मतभेद हैं —
कुछ चाहते हैं कि पार्टी खुलकर इसे अपनाए ताकि हिंदू वोटरों से जुड़ाव बढ़े, जबकि अन्य कहते हैं इससे मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है और सहयोगी दल नाराज़ हो सकते हैं।
कानूनी और संवैधानिक पहलू-History
भारत का राष्ट्रीय गान “जन गण मन” है, जिसे 1950 में अपनाया गया।
“वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा 2009 में मिला, पर दोनों का संवैधानिक दर्जा अलग है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि किसी को राष्ट्रीय गान या गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
2009 के एक फैसले में कहा गया कि “वंदे मातरम्” का गायन केवल विशेष अवसरों पर किया जाए, पर यह वैकल्पिक है।
इस कानूनी अस्पष्टता का राजनीतिक फायदा सभी पार्टियां उठाती हैं —
हर कोई इसे अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है।
प्रतीकात्मक राजनीति पर विद्वानों की राय-History
राजनीति विज्ञानियों जैसे अशुतोष वर्श्नेय बताते हैं कि “वंदे मातरम्” जैसे गीत चुनावी भावनाओं को तुरंत जगाते हैं — ये नीति से नहीं, भावना से वोट दिलाते हैं।
जेपी विश्वविद्यालय और जेएनयू के अध्ययनों के अनुसार,
ऐसे प्रतीकों का उपयोग हर बड़े चुनाव में बढ़ जाता है, खासकर जब विकास मुद्दों पर चर्चा कमजोर पड़ जाती है।
बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ सामाजिक समीकरण जटिल हैं,
ऐसे सांस्कृतिक प्रतीक 5–7% तक वोटों में बदलाव ला सकते हैं।
गठबंधन राजनीति और मतदाता धारणा-History
धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक पर असर
बिहार में मुस्लिम आबादी लगभग 17% है।
कांग्रेस का कोई भी “झुकाव” उन्हें असहज कर सकता है।
राजद जैसे सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर सतर्क रहते हैं।
2019 के एक सर्वे में पाया गया कि 60% धर्मनिरपेक्ष मतदाता चाहते हैं कि कांग्रेस “जबरन राष्ट्रवाद” के खिलाफ स्पष्ट रुख ले।
यदि कांग्रेस डगमगाती है, तो भाजपा को केंद्र में जगह मिल जाती है।

बहुसंख्यक मतदाताओं पर प्रभाव
दूसरी ओर, ग्रामीण हिंदू मतदाताओं के बीच “वंदे मातरम्” का भावनात्मक असर गहरा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, जहाँ भाजपा ने इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया, वहाँ मतदान प्रतिशत लगभग 10% बढ़ा।
हालाँकि, सर्वे बताते हैं कि रोज़मर्रा की समस्याएँ (रोज़गार, कीमतें) अभी भी शीर्ष मुद्दे हैं —
लेकिन करीबी मुकाबलों में ऐसे भावनात्मक प्रतीक निर्णायक बन जाते हैं।
दोहराती दुविधा से सबक-History
बिहार चुनावों में “वंदे मातरम्” का विवाद बार-बार लौटता है।
यह कांग्रेस की उस पुरानी चुनौती को उजागर करता है —
क्या पार्टी अपनी समावेशी पहचान बनाए रखे या राष्ट्रवादी भावनाओं की लहर में बह जाए?
इतिहास दिखाता है कि भारत में प्रतीक और भावनाएँ नीति से अधिक असर डालती हैं।
कांग्रेस के लिए असली कसौटी यही है —
क्या वह इस भावनात्मक जाल से निकलकर स्पष्ट संदेश दे पाएगी?
मुख्य बातें:
“वंदे मातरम्” अब भी भावनात्मक रूप से वोटों को प्रभावित करता है।
कांग्रेस को “सेक्युलर एकता” और “राष्ट्रवादी आकर्षण” के बीच संतुलन खोजना होगा।
बिहार जैसे राज्यों में यह प्रतीकात्मक राजनीति अब भी निर्णायक बन सकती है।
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